Tuesday, 14 January 2014

436. पूरा का पूरा (क्षणिका)

पूरा का पूरा (क्षणिका)

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तेरे अधूरेपन को
अपना पूरा दे आई
यूँ लगा 
मानो दुनिया पा गई
पर अब जाना
तेरा आधा भी तेरा नहीं था  
फिर तू कहाँ समेटता 
मेरे पूरे 'मैं' को
तूने जड़ दिया मुझे
मोबाइल के नंबर में
पूरा का पूरा !

- जेन्नी शबनम (14. 1. 2014)

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11 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

सीमा स्‍मृति said...

कमाल है आप की लेखनी और भावों का शब्‍द बंधन

दिगंबर नासवा said...

गहरे शब्द ... जो आधा भी नहीं वो पूरा कैसे समेटेगा ...

Rajendra kumar said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Rakesh Kumar said...

मेरे पूरे 'मैं' को तूने जड़ दिया मुझे मोबाइल के नंबर मेंपूरा का पूरा !

क्या बात है जेन्नी जी.

शुभकामनाएँ

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

:-(

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत सुन्दर प्रसूति !
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएं !
नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
नई पोस्ट बोलती तस्वीरें !

Maheshwari kaneri said...

वाह...बहुत बढिया..

Ankur Jain said...

बहुत खूब..काफी संक्षेप में गहरी बात कह दी।।।

Amrita Tanmay said...

सदियों से यही तो होता रहा है।

Unknown said...

Gambhir rachna