Monday, 17 April 2017

543. एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में...

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में...

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तन्हा रहे ताउम्र अपनों की भीड़ में  
एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में!

वक्त के आइने में दिखा ये तमाशा
ख़ुद को निहारा पर दिखे न भीड़ में!

एक अनदेखी ज़ंजीर से बँधा है मन
तड़पे है पर लहू रिसता नहीं पीर में!

शानों शौक़त की लम्बी फ़ेहरिस्त है
साँस-साँस क़र्ज़दार गिनती मगर अमीर में!

रूबरू होने से कतराता है मन
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में!

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में!

बसर तो हुई मगर कैसी ये ज़िन्दगी
हँसते रहे डूब के आँखों के नीर में!

सफर की नादानियाँ कहती किसे 'शब'
कमबख़्त उलझी ज़िन्दगी अपने शरीर में!

- जेन्नी शबनम (17. 4. 2017)

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7 comments:

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 19 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

'एकलव्य' said...

बहुत ही मार्मिक वर्णन,जीवन का सुन्दर ! आदरणीय, इन्हीं ख़्यालों से जुड़ी मेरी रचना "ख़ाली माटी की जमीं" के लिए आपको आमंत्रित करता हूँ।

RAKESH KUMAR SRIVASTAVA 'RAHI' said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना जेन्नी साहिबा जी।

सुशील कुमार जोशी said...

वाह।

Sweta sinha said...

लाज़वाब रचना आपकी👌👌

शुभा said...

वाह !!!बहुत खूब ।

Onkar said...

बहुत सुन्दर