शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

551. उदासी...

उदासी...  

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ज़बरन प्रेम ज़बरन रिश्ते  
ज़बरन साँसों की आवाजाही  
काश! कोई ज़बरन उदासी भी छीन ले!  

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2017)  

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10 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

बाकी सब अपने कहाँ होते हैं एक उदासी ही तो अपनी होती है फिर क्यों दूसरा जबरन उसे छीनने चला
सटीक

'एकलव्य' ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति आभार "एकलव्य"

Kailash Sharma ने कहा…

कोई किसी की उदासी नहीं बांटता, शायद यही इंसानी फितरत है ...बहुत सुन्दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखे गोय
सुनि इठलैहैं लोग सब बाँट न लैहें कोय

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-07-2017) को 'पाठक का रोजनामचा' (चर्चा अंक-2661) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

बहुत खूब

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ख़याल अच्छा है(दिल को बहलानाे के लिये).

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ख़याल अच्छा है -दिल को बहलाने के लिए .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

खुद ही जीना होता है उदासी को ...
कोई नहीं ले जाता इसे ... बहुत खूब लिखा है ...