Friday, 8 September 2017

558. हिसाब-किताब के रिश्ते

हिसाब-किताब के रिश्ते  

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दिल की बातों में ये हिसाब-किताब के रिश्ते  
परखते रहे कसौटी पर बेकाम के रिश्ते!

वक़्त के छलावे में जो ज़िन्दगी ने चाह की  
कतरा-कतरा बिखर गए मखमल-से ये रिश्ते!  

दर्द की दीवारों पे हसीन लम्हे टँके थे  
गुलाब संग काँटों के ये बेमेल-से रिश्ते!  

लड़खड़ा कर गिरते फिर थम-थम के उठते रहे  
जैसे समंदर की लहरें व साहिल के रिश्ते!  

नाम की ख्वाहिश ने जाने ये क्या कराया  
गुमनाम सही पर क्यों बदनाम हुए ये रिश्ते!  

चाँदी के तारों से सिले जज़्बात के रिश्ते  
सुबह की ओस व आसमां के आँसू के रिश्ते!  

किराए के मकां में रह के घर को हैं तरसे  
अपनों की आस में 'शब' ने ही निभाए रिश्ते!  


- जेन्नी शबनम (8. 9. 2017)  

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10 comments:

Onkar said...

बहुत सुन्दर

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन - 'फादर ऑफ़ द वाइट रेवोलुशन' “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-09-2017) को "चमन का सिंगार करना चाहिए" (चर्चा अंक 2723) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत खूब

Pammi singh'tripti' said...

आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 13 सितंबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!





......

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।

दिगंबर नासवा said...

रिश्तों का इतिहास और रिश्तों की आड़ी तिरछी रेखाओं में घूमती रचना ... लाजवाब ...

Sudha devrani said...

नाम की ख्वाहिश ने जाने क्या कराया
गुमनाम सही पर क्यों बदनाम हुये ये रिश्ते
वाहवाह...
बहुत सुन्दर..

'एकलव्य' said...

वाह ! ,बेजोड़ पंक्तियाँ ,सुन्दर अभिव्यक्ति ,आभार। "एकलव्य"

Rajesh Kumar Rai said...

वाह ! लाजवाब ! बहुत खूब आदरणीय ।