शनिवार, 27 जून 2026

807. बनूँ गुलमोहर (8 सेदोका)

बनूँ गुलमोहर 

***

1.
ज़िन्दगी हँसी
लिपटके रंगों से
खिले फूल हसीन,
मन चाहता
ओढ़कर रंगीनी
बनूँ गुलमोहर।

2.
पसरा हुआ
उदासी का मंज़र 
रेगिस्तानी है फ़िज़ा 
मन सहमा
हर शय ग़ुलाम
कैसा वक़्त है आया।

3. 
लगती भारी
मन में जो है बंद    
सपनों की गठरी
मन चाहता
खोलकर गठरी
सपनों को उड़ाती।

4.
सुनता नहीं 
बेपरवाह मन
करता मनमानी
जग से टूटा
पर नाता न छूटा
ये जगत् मोह-माया। 

5.

हे सूर्य देव!

ज़रा रहम करो 

धरती को बचाओ 

मेघ को भेजो  

तपते जीव-जन्तु

करुणा दिखलाओ। 


6.

बाण व बात
हैं तीव्र हथियार

छूटे तो लौटे नहीं

माने न हार 

करें क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी। 


7.
भले अबेर
मिलती है मंज़िल 
देर हो या सबेर
जीवन-पथ 
सूर्य-सा या चाँद-सा 
चलना निरन्तर।

8.
जीवन-तप 
राह में लाखों काँटे
कठिन है चलना 
यही कर्त्तव्य   
न कभी घबराना    
न कभी ठहरना

-जेन्नी शबनम (26.6.2026)
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बुधवार, 17 जून 2026

806. क्षणभंगुर जीवन

क्षणभंगुर जीवन 

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कितने बहाने
कितने दलील
सब फ़िज़ूल
ठगाया जीवन। 

सोचा समझा
सब बिखरा
आघात मिला
व्यर्थ जीवन। 

उपाय नहीं
समझौता सही
नासमझ नहीं
यही जीवन। 

सोच बदलो
जीवन समझो
अमर नहीं
क्षणभंगुर जीवन।

-जेन्नी शबनम (17.6.2026)
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गुरुवार, 11 जून 2026

805. वृद्ध का दुःख (10 हाइकु)

वृद्ध का दुःख 


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1.
वृद्ध की आस
कोई तो हो पास
बाँटें वे दुःख।

2.
वृद्ध का दुःख
मन में समाहित
सोचके हित।

3.
वृद्ध का कोना
रिश्तों की राह ताके
रहता सूना।

4.
वृद्ध जीवन
अनुभवों का कोष
लो निःसंकोच।

5.
कोई न सुने
विलाप और रोना,
वृद्ध अकेला।

6.
वृद्ध बेचारा
कोई न सहारा
आँखें सजल।

7.
जवानी पूनो
वृद्ध जीवन अमा
मन बेचैन।

8.
बहते लोर
पोंछे न कोई और
वृद्ध अकेला।

9.
वृद्ध जीवन
अनुभव की आँखें
रखते मूँदे।

10.
जीवनभर
कर्मयोगी था वृद्ध,
अब बेकार।

-जेन्नी शबनम (26.9.2024)
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शुक्रवार, 5 जून 2026

804. नौतपा दैत्य (10 ताँका)

नौतपा दैत्य


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1.
नौतपा दैत्य
किसी को न छोड़ेगा
बचके रहो
घर में छुप जाओ
पानी पी के भगाओ।

2.
होगा बचना
सूरज बना आग
सब हैं डरे
कैसे करें उपाय
ग़रीब असहाय।

3.
जीव बेचैन
गर्मी से हैं बेहाल
बिजली गुल
घमण्डी बना सूर्य
रौद्र रूप दिखाए।

4.
हवा है शांत
बैठी है समाधिस्थ
धूप से जली
समाधि नहीं टूटी
हवा बनी है संत।

5.
हरता प्राण
सूर्य है मृत्यु-देव
नहीं बख़्शता
जीव-जंतु या नदी
पोखर या बावड़ी।

6.
जेठ महीना
बड़ा है तड़पाता
वह निगोड़ा
खुलेआम घूमता
जीव-जंतु छुपता।

7.
सूर्य बेशर्म
ज़रा नहीं है शर्म
लू का गोला
फेंकके ख़ुश होता
चोटिल है दुनिया।

8.
नौतपा शत्रु
लू लेकर दौड़ता
चुनौती देता,
छाता-पानी हारते 
जीव-जंतु हाँफते।

9.
ओह गरमी
ज़रा करो नरमी
जीव बेहाल
जिसका नहीं घर
उसकी पीड़ा हर।

10.
आषाढ़ आओ
जेठ है तड़पाए
नीर बहाओ
सूर्य को समझाओ
ठण्डक को लौटाओ।

-जेन्नी शबनम (4.6.2026)
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मंगलवार, 2 जून 2026

803. यात्री सूरज (चोका- 20)

यात्री सूरज


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यात्री सूरज 

करके रोज़ यात्रा 

थकता होगा 

चलना ही है धर्म 

कोई हो ऋतु

कहीं  पहुँचता,

उसके पाँव

ज़ख़्मी तो होते होंगे

कौन लगाये 

मरहम  पट्टी

दर्द छुपाके

जीवन का सन्देश  

रोज़ ही देता

पर कौन सुनता

जल-जल के

उजाला पसारता,

बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता

एक दिन लो तुम   

सोने का मज़ा

फिर चल पड़ना

बिन ठहरे

हँसते व जलते,

घुमंतू सूर्य!

बात सुन रहा 

 साथ बैठ

ज़रा तो गप्पे लड़ा     

चाय भी पी ले

फिर तू निकलना     

अपनी यात्रा पर।


-जेन्नी शबनम (18.10.2022)

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