यात्री सूरज
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यात्री सूरज
करके रोज़ यात्रा
थकता होगा
चलना ही है धर्म
कोई हो ऋतु
कहीं न पहुँचता,
उसके पाँव
ज़ख़्मी तो होते होंगे
कौन लगाये
मरहम व पट्टी
दर्द छुपाके
जीवन का सन्देश
रोज़ ही देता
पर कौन सुनता
जल-जल के
उजाला पसारता,
बिन बैटरी
रोबोट बना सूर्य
रात व दिन
चकरघिन्नी बन
मन न चाहे
चलता ही रहता,
हे यायावर!
एक दिन तो करो
ज़रा विश्राम
तुमसे ही तो जग
सोता-जागता
एक दिन लो तुम
सोने का मज़ा
फिर चल पड़ना
बिन ठहरे
हँसते व जलते,
घुमंतू सूर्य!
बात सुन रहा न
आ साथ बैठ
ज़रा तो गप्पे लड़ा
चाय भी पी ले
फिर तू निकलना
अपनी यात्रा पर।
-जेन्नी शबनम (18.10.2022)
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