Saturday, 26 January 2019

602. प्रजातंत्र

प्रजातंत्र...   

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मुझपर इल्जाम है उनकी ही तरह   
जो कहते हैं कि   
देश के माहौल से डर लगता है   
हाँ ! मैं मानती हूँ मुझे भी अब डर लगता है   
सिर्फ अपने लिए नहीं   
अपनों के लिए डर लगता है।   
उन्हें मेरे कहे पर आपत्ति है   
उनके कहे पर आपत्ति है   
वे कहते हैं चार सालों से   
न कहीं बम विस्फोट हो रहे हैं   
न उन दिनों की तरह इमरजेंसी है   
जब बेकसूरों को पकड़ कर जेल भेजा जाता था   
न इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद का   
सिख विरोधी दंगा है   
जब हर एक सिख असुरक्षित था और डरा हुआ कि   
न जाने कब उनकी हत्या कर दी जाए।   
वे कहते है   
यह डर उन्हें क्यों   
जिनके पास धन भरपूर है   
जो जब चाहे देश छोड़ कर   
कहीं और बस सकते हैं   
यह डर उन्हें क्यों   
जो 1975 और 1984 में खामोश रहे   
तब क्यों नहीं कुछ कहा   
तब क्यों नहीं डर लगा?   
मैं स्वीकार करती हूँ कि   
यह सब दुर्भाग्यपूर्ण था   
परन्तु सिर्फ इन वजहों से   
1989 का भागलपुर दंगा   
2002 का गुजरात दंगा   
या अन्य दंगा-फसाद   
जायज नहीं हो सकता।   
मॉब लिंचिग   
बलात्कार   
एसिड अटैक   
हत्या   
और न जाने कितने अपराध   
हर रोज़ कुछ नए अपराध   
क्या इसके खिलाफ बोलना गुनाह है?   
डर और खौफ़ के साये में जी रही है प्रजा   
क्या यही प्रजातंत्र है?   
जुर्म के खिलाफ बोलना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ   
समाज में शांति चाहना   
अगर गुनाह है   
तो मैं गुनाह कर रही हूँ।   
मैं खुलेआम कबूल कर रही हूँ   
हाँ ! मुझे डर लगता है   
मुझे आज के माहौल से डर लगता है !   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2019)   
(गणतंत्र दिवस पर)
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3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-01-2019) को "सिलसिला नहीं होता" (चर्चा अंक-3230) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

सटीक प्रस्तुति

दिगंबर नासवा said...

जुस्म के खिलाफ बोलना कभी भी गुनाह नहीं है ... और जुर्म एक दिन नहीं ... पीढ़ी के अन्याय की उपज होते हैं विशेष कर समाज में उत्पन जुर्म ... कई बार लगता है यदि सन ४७ में नीव अच्छी रखी गई होती तो ऐसा शायद न होता पर काश ऐसा हुआ होता ...