शुक्रवार, 8 मार्च 2019

607. पानी और स्त्री

पानी और स्त्री 

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बचपन में पढ़ा -   
पानी होता है रंगहीन गंधहीन   
जिसे जहाँ रखा उस साँचे में ढला    
खूब गर्म किया भाप बन उड़ गया   
खूब ठंडा किया बर्फ बन जम गया   
पानी के साथ उगता है जीवन   
पनपती हैं सभ्यताएँ   
पानी गर हुआ लुप्त   
संसार भी हो जाएगा विलुप्त।   
फिर भी पानी के साथ होता है खिलवाड़   
नहीं होता उसका सम्मान   
नहीं करते उसका बचाव   
न ही करते उसका संरक्षण   
न ही करते उसका प्रबंधन   
जबकि जानते हैं पानी नहीं तो दुनिया नहीं।   
बचपन में जो था पढ़ा   
अब जीवन ने है समझा   
स्त्रियाँ पानी हैं   
वक्त ने जहाँ चाहा उस साँचे में ढाल दिया   
कभी आरोपों से जम गई   
तो व्याकुलता से लिपट कर भाप-सी पिघल गई   
स्त्रियों ने किया सृजन   
नवजीवन का किया पोषण   
फिर भी मानी गई सब पर बोझ   
सभी चाहते नहीं मिले उसको कोख   
पानी-सी न की गई सुरक्षित   
पानी-सी न हुई संरक्षित   
पानी बिन होता अकाल   
स्त्री बिन मिट जाएगा संसार।   
पानी-सी स्त्री है   
स्त्री-सा पानी है   
सीरत अलग मगर   
स्त्री और पानी जीवन है।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2019)   

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4 टिप्‍पणियां:

Nitish Tiwary ने कहा…

स्त्री विमर्श के लिए बहुत सुंदर रचना।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
iwillrocknow.com

Kailash Sharma ने कहा…

लाज़वाब और सटीक अभिव्यक्ति...

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

Kamini Sinha ने कहा…

पानी-सी स्त्री है
स्त्री-सा पानी है
सीरत अलग मगर
स्त्री और पानी जीवन है।
पानी और स्त्री का बड़ा ही सुंदर चित्रण ,बहुत खूब.... ,सादर नमस्कार