Sunday, 26 April 2020

658. झरोखा

झरोखा  

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समय का यह दौर  
जीवन की अहमियत, जीवन की ज़रुरत सिखा रहा है  
मुश्किल के इस रंगमहल में  
आशाओं का एक झरोखा जिसे, पत्थर का महल बनाने में  
सदियों पहले बंद किया था हमने  
अब खोलने का वक्त आ गया है  
ताकि एक बार फिर लौट सके, सपनों का सुन्दर संसार  
सूरज की किरणों की बौछार  
बारिश की बूंदों की फुहार  
हो सके चाँदनी की आवाजाही  
आ सके हवाएँ झूमती नाचती गाती  
हम ताक सकें आसमान में चाँद तारों की बैठक  
आकृतियाँ गढ़ती बादलों की जमात  
पक्षियों का कलरव  
रास्ते से गुजरता इंसानी रेला  
हमारी ज़रूरतों के सामानों का ठेला  
हम सुन सकें हवाओं का नशीला राग  
बादलों की गड़गड़ाहट  
धूल मिट्टी की थाप  
प्रार्थना की गुहार  
पड़ोसी की पुकार  
रँभाते मवेशियों की तान  
गोधूलि में पशुओं के खुरों और घंटियों की धुन  
हम मिला सकें कोयल के साथ कूउउ-कूउउ  
हम चिढ़ा सके कौओं को काँव-काँव  
हम कर सकें कोई ऐसी चित्रकारी  
जिसमें खूबसूरत नीला आसमान, गेरुआ रंग धारण कर लेता है  
पौधों की हरियाली में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं  
कोई बच्चा लाड़ दुलार से माँ की गोद में जा सिमटता है  
हम बसा सकें सपनों के बड़े-बड़े चौबारे पर  
कोई अचम्भित करने वाली कामनाएँ  
ओह! कितना कुछ था जिसे खोया है हमने  
मन के झरोखों को बंद कर  
कृत्रिमता से लिपट कर, पत्थर के आशियाने में सिमट कर  
अब समझ आ गया है  
जीवन की क्षणभंगुरता, कायनात की शिक्षा  
खोल ही दो सबको  
आने दो झरोखे से वह सब  
जिसे हमने खुद ही गँवाया था  
खोल दो झरोखा।  

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2020)  

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10 comments:

rameshwar kamboj said...

"झरोखा" कविता ने मन को छू लिया। हार्दिक बधाई !

राजीव तनेजा said...

सार्थक रचना

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar said...

समय बहुत कुछ सिखा देता है.

अजय कुमार झा said...

वक्त का ये दौर पूरी दुनिया पूरी इंसानियत के लिए युगों में मिलने वाला बहुत महत्वपूर्ण सबक है । प्रभावित करने वाले शब्द । जारी रहिए

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

जब आयेगा हवा का झोका।
नहीं रहेगा कुछ भी धोखा,
खुल जायेगा
खुद ही झरोखा।
--
सुन्दर रचना।

vandan gupta said...

खोलना ही होगा झरोखा

दिगंबर नासवा said...

बहुग जरूरी है मन के इस झरोखे को खोल कर नै नज़र से दुनिया को देखने की ...
ये सच में बहुत खूबसूरत है ...

संगीता पुरी said...

आने दो झरोखे से वह सब
जिसे हमने खुद ही गँवाया था
खोल दो झरोखा।
बिलकुल.....

रेखा श्रीवास्तव said...

बेहतरीन रचना!

Shah Nawaz said...

वाकई जीवन के झरोखे खोलने को प्रकृति ने अहसास दिलाने की कोशिश की है, सबकुछ बर्बाद होने से पहले प्रकृति की तरफ लौटना होगा, जीवन की तरफ लौटना होगा।