Wednesday, 13 May 2020

663. अलविदा

अलविदा  

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तपती रेत पर  
पाँव के नहीं, जलते पाँव के ज़ख्म के निशान हैं  
मंजिल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पर पाँव थक चुके हैं, पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं  
यह तय है ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँचेगी  
जहाँ पाँव-पाँव चले थे, जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने, बहुत दूर निकल पड़े थे  
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अंतिम क्षण में तालू तर हो सके  
उम्मीद की अंतिम तीली बुझने को है  
आखिरी साँस अब थमने को है  
सलाम उन सबको जिनके पाँव ने साथ दिया  
उन सपनों, उन अपनों, उन यादों को अलविदा। 

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2020) 
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8 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सपने फिर लौटेंगे। हौसला बना रहें। सुन्दर अभिव्यक्ति।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

सपने ही हौसला देते हैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सामंयिक और मार्मिक प्रस्तुति

Onkar said...

बहुत सुन्दर रचना

Onkar said...

बहुत सुन्दर रचना

दिगंबर नासवा said...

होंसले इतने है तभी तो निकल पड़े हैं सपनो को ज़िन्दा रखे ...
समय बदलेगा ...

संजय भास्‍कर said...

मार्मिक प्रस्तुति

Jyoti Singh said...

अति उत्तम रचना ,मार्मिक रचना ,आपका ब्लॉग पर आना अच्छा लगा ,आपकी हृदय से आभारी हूँ ,नमस्कार