Friday, 15 May 2020

664. लॉकडाउन

लॉकडाउन 

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लॉकडाउन से जब शहर हुए हैं वीरान  
बढ़ चुकी है मन के लॉकडाउन की भी मियाद  
अनजाने भय से मन वैसे ही भयभीत रहता है  
जैसे आज महामारी से पूरी दुनिया डरी हुई है  
मन को हजारों सवाल बेहिसाब तंग करते हैं  
जैसे टी वी पर चीखते खबरनवीसों के कुतर्क असहनीय लगते हैं  
कितना कुछ बदल दिया इस नन्हे-से विषाणु ने  
मानव को उसकी औकात बता दी, इस अनजान शत्रु ने,  
आज ताकत के भूखे नरभक्षी, अपने बनाए गढ्ढे में दफन हो रहे हैं  
भात-छत के मसले, वोटों की गिनती में जुट रहे हैं  
सैकड़ों कोस चल-चल कर, कोई बेदम हो टूट रहा है  
बदहवास लोगों के ज़ख्मों पर, कोई अपनी रोटी सेंक रहा है  
पेट-पाँव झुलस रहे हैं, आत्माएँ सड़कों पर बिलख रही हैं  
रूह कँपाती खबरें हैं, पर अधिपतियों को व्याकुल नहीं कर रही हैं  
अफवाहों के शोर में, घर-घर पक रहे हैं तोहमतों के पकवान  
दिल दिमाग दोनों त्रस्त हैं, चारों तरफ है त्राहि-त्राहि कोहराम,  
मन की धारणाएँ लगातार चहल कदमी कर रही है  
मंदिर-मस्जिद के देवता लम्बी छुट्टी पर विश्राम कर रहे हैं  
इस लॉकडाउन में मन को सुकून देती पक्षियों की चहचहाहट है  
जो सदियों से दब गई थी मानव की चिल्ला-चिल्ली में  
खुला-खुला आसमान, खिली-खिली धरती है  
सन्न-सन्न दौड़ती हवा की लहरें हैं  
आकाश को पी-पीकर ये नदियाँ नीली हो गई हैं  
संवेदनाएँ चौक-चौराहों पर भूखे का पेट भर रही हैं  
ढ़ेरों ख़ुदा आसमान से धरती पर उतर आए हैं अस्पतालों में  
खाकी अपने स्वभाव के विपरीत मानवीय हो रही है  
सालों से बंद घर फिर से चहक रहा है  
अपनी-अपनी माटी का नशा नसों में बहक रहा है,  
बहुत कुछ भला-भला-सा है, फिर भी मन बुझा-बुझा-सा है  
आँखे सब देख रहीं हैं, पर मन अपनी ही परछाइयों से घबरा रहा है  
आसमाँ में कहकशाँ हँस रही है, पर मन है कि अँधेरों से निकलता नहीं  
जाने यह उदासियों का मौसम कभी जाएगा कि नहीं,  
तय है, शहर का लॉकडाउन टूटेगा  
साथ ही लौटेंगी बेकाबू भीड़, बदहवास चीखें  
लौटेगा प्रदूषण, आसमान फिर ओझल होगा  
फिर से कैद होंगी पशु-पक्षियों की जमातें,  
हाँ, लॉकडाउन तो टूटेगा, पर अब नहीं लौटेगी पुरानी बहार  
नहीं लौटेंगे वे जिन्होंने खो दिया अपना संसार  
सन्नाटों के शहर में अब सब कुछ बदल जाएगा  
शहर का सारा तिलिस्म मिट जाएगा  
जीने का हर तरीका बदल जाएगा  
रिश्ते, नाते, प्रेम, मोहब्बत का सलीका बदल जाएगा,  
यह लॉकडाउन बहुत-बहुत बुरा है  
पर थोड़ा-थोड़ा अच्छा है  
यह भाग-दौड़ से कुछ दिन आराम दे रहा है  
चिन्ताओं को ज़रा-सा विश्राम दे रहा है,  
यह समय कुदरत के स्कूल का एक पाठ्यक्रम है  
जीवन और संवेदनाओं को समझने का पाठ पढ़ा रहा है। 

- जेन्नी शबनम (15. 5. 2020) 
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12 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

काश कि व्यक्ति समझ जाए

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

वाकई दुखद स्थिति है।
लाकडाउन करने में यदि 4 घंटे का नहीं बल्कि 4 दिन का समय दिया होता तो यह हालत नहीं होती।

रेखा श्रीवास्तव said...

यह कल पाठ्यक्रम में शामिल होगा लेकिन क्या इतिहास लिखने वाले सारी तस्वीरें भी शामिँ करेंगे ।

दिगंबर नासवा said...

बिलकुल कुदरत जो कहना चाह रही है शायद हम अब भी नहीं सीखे हैं ... गहरी रचना ..

संगीता पुरी said...

बहुत खराब स्थिति है !

Onkar said...

बहुत बढ़िया

Ravindra Singh Yadav said...

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (04 मई 2020) को 'गरमी में जीना हुआ मुहाल' (चर्चा अंक 3705) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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रवीन्द्र सिंह यादव

Ravindra Singh Yadav said...

संशोधन-
आमंत्रण की सूचना में पिछले सोमवार की तारीख़ उल्लेखित है। कृपया ध्यान रहे यह सूचना आज यानी 18 मई 2020 के लिए है।
असुविधा के लिए खेद है।
-रवीन्द्र सिंह यादव

Anuradha chauhan said...

बहुत सुंदर

अनीता सैनी said...

ज़िंदगी में दौड़ रही कश्मकश को बड़ी संजीदगी से शब्दों में पिरोया है.
बेहतरीन सृजन आदरणीया दीदी.
सादर

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर सृजन

प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया है कुदरत ने,इन्सान को सावधान रह कर हृदयंगम करना है.