Friday, 8 May 2020

662. अनुभूतियों का सफर

अनुभूतियों का सफर

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अनुभूतियों के सफ़र में   
संभावनाओं को ज़मीन न मिली   
हताश हूँ, परेशान हूँ   
मगर हार की स्वीकृति मन को नहीं सुहाती   
फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए   
पुरज़ोर कोशिश करती हूँ   
कड़वे कसैले से कुछ अल्फ़ाज़ मन को बेधते हैं   
फिर-फिर जीने की तमन्ना में   
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ   
सँभलने और स्थिरता की मियाद   
पूरी नहीं होती, कि सब ध्वस्त हो जाता है।   
जाने कौन सा गुनाह था, या किसी जन्म का शाप   
अनुभूतियों के सफ़र में महज़ कुछ फूल मिले   
शेष काँटें ही काँटें   
जो वक़्त बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।   
पर अब, संभावनाओं को जिलाना होगा   
उसे ज़मीन में उगाना होगा   
थके हों क़दम मगर चलना होगा   
आसमान छिन जाए मगर   
ज़मीन को पकड़ना होगा।   
जीवन की अनुभूतियाँ संबल है और   
जीवन की संभावना भी।  

- जेन्नी शबनम (7. 5. 2020) 
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10 comments:

Onkar said...

प्रेरक रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सशक्त रचना

रेखा श्रीवास्तव said...

सुंदर रचना!

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

अनुभूतियों के साथ ही सफर सहज होता है।
सुन्दर रचना

Jyoti khare said...

प्रभावी और सुंदर रचना
बधाई

सुशील कुमार जोशी said...

हौसला बना रहे। शुभकामनाएं।

Meena Bhardwaj said...

प्रेरक और प्रभावशाली सृजन ।

Akhilesh shukla said...

प्रभावशाली रचना

दिगंबर नासवा said...

संभावनाएं ही तो जीवित रखती हैं ... आशा ण हो तो निराशा ही रहती है ...
प्रभावी रचना ...

Jyoti Singh said...


कड़वे कसैले से कुछ अल्फ़ाज़ मन को बेधते हैं
फिर-फिर जीने की तमन्ना में
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ
सँभलने और स्थिरता की मियाद
पूरी नहीं होती, कि सब ध्वस्त हो जाता है।
जाने कौन सा गुनाह था, या किसी जन्म का शाप
अनुभूतियों के सफ़र में महज़ कुछ फूल मिले
शेष काँटें ही काँटें
जो वक़्त बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।
पर अब, संभावनाओं को जिलाना होगा
उसे ज़मीन में उगाना होगा
थके हों क़दम मगर चलना होगा
आसमान छिन जाए मगर
ज़मीन को पकड़ना होगा।
जीवन की अनुभूतियाँ संबल है और
जीवन की संभावना भी।
वाह बहुत बढ़िया लिखा है, प्रभावशाली सृजन,