मंगलवार, 24 मार्च 2009

42. दुआ (क्षणिका)

दुआ 

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कोई शख्स ज़ख़्म देता, कुरेदकर नासूर बनाता
फिर कहता- "अल्लाह! उसे जन्नत बख़्श दो!"
क्या कहूँ उस ज़ालिम को 
अज़ीज़ या रक़ीब? 
जिसे जहन्नुम भी जन्नत-सा लगे
जिसे ग़ैरों के दर्द में आराम मिले,  
जाने ये कौन सी दुआ है 
जो दोज़ख़ की आग में झोंकती है
और कहती- ''जाओ जन्नत पाओ, सुकून पाओ!''

- जेन्नी शबनम (23. 3. 2009) 
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