रविवार, 13 फ़रवरी 2011

212. एक स्वप्न की तरह...

एक स्वप्न की तरह...

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बनते-बनते जाने कैसे
कई सवाल बन गई हूँ मैं,
जिनके जवाब
सिर्फ तुम्हारे पास है
पर तुम बताओगे नहीं
यह भी जानती हूँ मैं !
शिकस्त खाना तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना मेरी फितरत नहीं,
फिर भी
जाने क्यों
तुम ख़ामोश होते हो
शायद ख़ुद को रोके रखते हो
कहीं मेरी आवारगी
मेरी यायावरी
तुम्हे डगमगा न दे
या फिर तुम्हारी दिशा बदल न दे !
नहीं, मेरे हमदर्द !
फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
मैं यूँ ही सवाल बन कर
रह जाऊँगी
जवाब तुमसे पुछूँगी भी नहीं,
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ ही दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह !

- जेन्नी शबनम (11. 2. 2011)

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10 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,
फिर भी...bejod

अनाम ने कहा…

रचना में मनोबावों का सुन्दर चित्रण किया है आपने!

अमिताभ मीत ने कहा…

Khoob.

Kailash Sharma ने कहा…

शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,

...बहुत खूब ! शब्दों और भावों का बहुत सुन्दर संयोजन..

Unknown ने कहा…

बेहतरीन

mridula pradhan ने कहा…

फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
bahut sunder kavita.

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति!

vandan gupta ने कहा…

ज़िन्दगी की एक हकीकत ये भी है…………सुन्दर रचना।

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
जवाब तुमसे पूछूंगी भी नहीं,
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ हीं दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह...

bahut khub...:)
lekin aisa kyon??:)

***Punam*** ने कहा…

mere ehsaas shabd aapke......kuch rachnaaye aisi hi lagti hai.!!!
hamre zehan main dheron sawaal rahte hain par javaab denewala khud bhi ek sawaal ban jaaye to......?????