Monday, 25 April 2011

235. सब ख़ामोश हैं...

सब ख़ामोश हैं...

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बातें करते-करते
तुम मंदिर तक पहुँच गए,
मैं तुम्हें देखती रही
मेरे लिए तुम्हारी आँखों में
क्या जन्म ले रहा है !
यह तो नहीं मालूम
तुम क्या सोच रहे थे
पर मेरी ज़िद कि मुझे देखो
सिर्फ मुझसे बातें करो !
तुम्हें नहीं पता
उस दिन मैंने क्या हार दिया
तुम तक पहुँचती राह को
छोड़ दिया !
ईश्वर ने कहा था तुमसे
कि मुझको माँग लो,
मैंने उसकी बातें तुमको सुनने न दी
मेरी ज़िद कि सिर्फ मेरी सुनो,
ईश्वर ने मुझे कहा -
आज वक़्त है
तुममें अपना प्रेम भर दूँ,
मैंने अनसुना कर दिया
मेरी जिद थी कि सिर्फ तुमको सुनूँ,
जाने क्यों मन में यकीन था कि
तुममें मेरा प्रेम भरा हुआ है !
अब तो जो है बस
मेरी असफल कोशिश
ख़ुद पर क्रोध भी है और क्षोभ भी
ये मैंने क्या कर लिया,
तुम तक जाने का अंतिम रास्ता
ख़ुद ही बंद कर दिया !
सच है प्रेम ऐसे नहीं होता
यह सब तकदीर की बातें हैं,
और अपनी तकदीर उस दिन
मैं मंदिर में तोड़ आई !
तुम भी हो मंदिर भी और ईश्वर भी
पर अब हम सब ख़ामोश हैं !

- जेन्नी शबनम (19. 4. 2011)

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15 comments:

mridula pradhan said...

bahut achcha likhi hain......

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना।

रश्मि प्रभा... said...

तुम तक जाने का अंतिम रस्ता
ख़ुद हीं बंद कर दिया|
सच है प्रेम ऐसे नहीं होता
ये सब तकदीर की बातें हैं,
और अपनी तकदीर उस दिन
मैं मंदिर में तोड़ आई|... dil ko jhakjhorti rachna

सहज साहित्य said...

यह सब भाग्य की बात है कि जिस समय दरवाज़ा खुला रहता है ,हमारे मन में प्रवेश की बात नहीं आती और जब दरवाजा बन्द हो जाता है तो हम परेशान हो उठते हैं कि हमने अच्छे काम का एक अवसर खो दिया । हर समय हर पल इस तरह की स्थितियाँ निर्मित होती रहती हैं । बाद में हमारी नाकाम कोशिश हमे पश्चात्ताप की अग्नि में जलाती रहती है । आपकी पूरी कविता में गहन चिन्तन होते हुए भी भावुकता और व्याकुलता अनुस्यूत है , और आपकी ये पंक्तियाँ पढ़कर तो मन में उथल-पुथल मच जाती है - ईश्वर ने कहा था तुमसे
कि मुझको मांग लो,
मैंने उसकी बातें तुमको सुनने न दी
मेरी ज़िद कि सिर्फ मेरी सुनो,
ईश्वर ने मुझे कहा कि
आज वक़्त है
तुममें अपना प्रेम भर दूँ,
मैंने अनसुना कर दिया
मेरी जिद्द थी कि सिर्फ तुमको सुनूँ,
जाने क्यों मन में यकीन था कि
तुममें मेरा प्रेम भरा हुआ है|
अब तो जो है बस
मेरी असफल कोशिश| बहन जेन्नी जी सार्थक लेखन के लिए बधाई 1

अरुण चन्द्र रॉय said...

इस कविता में प्रेम, आध्यात्म और मनोविज्ञान तीनो हैं... सुन्दर कविता बन गई है जिसका हर शब्द दिल में उतर रहा है... बहुत सुन्दर

vandan gupta said...

बेहद संवेदनशील रचना।

Rachana said...

तुम तक जाने का अंतिम रस्ता
ख़ुद हीं बंद कर दिया|
सच है प्रेम ऐसे नहीं होता
ये सब तकदीर की बातें हैं,
और अपनी तकदीर उस दिन
SUNDER PANKTIYAN
AANAND AAYA
BADHAI
RACHANA

sushma verma said...

bhut hi gahraayi aur pyar bhari rachna... dil ko chuti hui....

SAJAN.AAWARA said...

MAM YE RACHNA MAN KO ACHCHI LAGI. SUNDAR

Anonymous said...

वाह' डॉ 'जेनी शबनम देख कर अच्छा लगा.पहले 'ये' नही था.पी.एच.डी कर ली बधाई. पेम में हम सिर्फ खुद की कहनी चाहते है और 'उसकी' सुननी.शायद ये ही सही है.प्रेम में परमात्मा का क्या काम अलग से जब प्रेम खुद आत्मा और परमात्मा,धर्म और पूजा सब कुछ खुद हो.फिर क्या हुआ,क्यों हुआ? क्या सोचना? क्या पछताना? प्रेम में डूबना ही उसका उद्दात्त रूप है.
जो लिखा वो अच्छा लगा क्यों कि प्रेम के लिए लिखा गया है. है न? जियो. प्यार.'शब ' नही सहर हो मेरी नन्ही दोस्त बस पलकों सी 'ये' नम हुई और 'ओस' बन गई शब+नम !

दर्शन कौर धनोय said...

सच है प्रेम ऐसे नहीं होता
ये सब तकदीर की बातें हैं,
और अपनी तकदीर उस दिन
मैं मंदिर में तोड़ आई|
तुम भी हो मंदिर भी और ईश्वर भी
पर अब सब ख़ामोश हैं|"

बेहद सुंदर रचना !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

और अपनी तकदीर उस दिन
मैं मंदिर में तोड़ आई|
तुम भी हो मंदिर भी और ईश्वर भी
पर अब सब ख़ामोश हैं|

ओह बहुत संवेदनशील रचना

डॉ. जेन्नी शबनम said...

@mridula ji,
@manoj ji,
@rashmi ji,
@ kamboj bhai sahab,
@arun ji,
@vandana ji,
@rachna ji,
@sushma ji,
@SAJAN.AAWARA ji,
@darshan ji
@sangeeta ji,
aap sabhi ka tahedil se shukriya meri rachna tak aane aur apne vichaaron dwara mujhe sarahne aur hausla badhane keliye. yun hin sahyog ki apeksha rahegi. dhanyawaad aap sabhi ka.

डॉ. जेन्नी शबनम said...

@ indu ji,
ye nanhi shab+nam ab nanhi kahan rahi, prodh mahila hai, aur ph.d kiye hue 6 saal beet chuke. fir bhi shukriya itne dino baad sahi badhai diya kisi ne hahahahhaha. aap aati rahein achha lagta hai. saabhar dhanyawaad.

संजय भास्‍कर said...

सार्थक और भावप्रवण रचना।