Thursday, 18 July 2013

412. जादूगर...

जादूगर...

*******

ओ जादूगर,
तुम्हारा सबसे ख़ास
मेरा प्रिय जादू
दिखाओ न !
जानती हूँ
तुम्हारी काया जीर्ण हो चुकी है 
और अब मैं 
ज़िन्दगी और जादू को समझने लगी हूँ 
फिर भी...
मेरा मन है 
एक बार और 
तुम मेरे जादूगर बन जाओ 
और मैं
तुम्हारे जादू में 
अपना रोना भूल 
एक आखिरी बार खिल जाऊँ ।
तुम्हें याद है 
जब तुम 
मेरे बालों से 
टॉफ़ी निकाल कर  
मेरी हथेली पर रख देते थे 
मैं झट से 
खा लेती थी 
कहीं जादू की टॉफ़ी 
गायब न हो जाए,
कभी तुम   
मेरी जेब से  
कुछ सिक्के निकाल देते थे 
मैं हतप्रभ 
झट मुट्ठी बंद कर लेती थी 
कहीं जादू के सिक्के
गायब न हो जाए 
और मैं ढ़ेर सारे गुब्बारे न खरीद पाऊँ,
मेरे मन के ख़िलाफ़
जब भी कोई बात हो 
मैं रोने लगती 
और तुम पुचकारते हुए 
मेरी आँखें बंद कर जादू करते 
जाने क्या-क्या बोलते 
सुन कर हँसी आ ही जाती थी 
और मैं खिसिया कर 
तुम्हें मुक्के मारने लगती, 
तुम कहते 
बिल्ली झपट्टा मारी 
बिल्ली झपट्टा मारी 
मैं कहती
तुम चूहा हो 
तुम कहते
तुम बिल्ली हो 
एक घमासान 
फिर तुम्हारा जादू 
वही टॉफ़ी 
वही सिक्के !
जानती हूँ 
तुम्हारा जादू 
सिर्फ मेरे लिए था 
तुम सिर्फ मेरे जादूगर थे 
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी 
यही तो था तुम्हारा जादू !
ओ जादूगर,
एक आखिरी जादू दिखाओ न ! 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2013)
(पिता की स्मृति में...)
______________________________ 

22 comments:

अनुपमा पाठक said...

पिता की स्मृति को समर्पित बेहद भावुक कर देने वाली अभिव्यक्ति...!

जादू सी... जादूगर की स्मृति को पूर्णता से रेखांकित कर गयी!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत प्यारी कविता ,... सच ही लिखा है आपने पिता एक जादूगर ही तो है ओने बच्चों के लिए तमाम खुशियों का छुग्गा इधर उधर से एकत्र कर लाते है... और वह बड़े हो जाते है तो कमजोर पढ़ जाते है.. आप की यह कविता बच्चों को अपने माँ पिता के प्रति स्नेह भाव रखना बताएगी ..

ANULATA RAJ NAIR said...

काश के कोई जादू हो जाए और जादूगर सामने आ जाए....
काश....
मुझे भी अपने पापा की याद आ गयी :-(

सादर
अनु

Maheshwari kaneri said...

भाव पूर्ण सुन्दर प्रस्तुति..आभार

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

यादों का बहुत उम्दा,सुंदर सृजन,,,वाह !!!
RECENT POST : अभी भी आशा है,

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पिता सच में ही जादूगर से कम नहीं होता .... सुंदर प्रस्तुति

PRAN SHARMA said...

PITA KEE SMRITI MEIN LIKHEE EK
HRIDAYSPARSHEE AUR YAADGAR KAVITA KE LIYE AAPKO BADHAAEE .

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

बहुत ही प्यारी रचना.... दिल भर आया...!
~पिता का स्नेह
अथाह सागर जैसा...
पुत्री के लिए....~

हर पिता को नमन!

~सादर!!!

Saras said...

बहोत खूबसूरत...दिल के बहोत करीब....

Naveen Mani Tripathi said...

तुम्हारा जादू
सिर्फ मेरे लिए था
तुम सिर्फ मेरे जादूगर थे
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी
यही तो था तुम्हारा जादू !
ओ जादूगर,

lajbab prstuti ....bahut hi sundar rachana ...aabhar .

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर रचना
कभी कभी ही ऐसी रचनाएं और विचार पढ़ने को मिलती है।
बढिया



मेरी कोशिश होती है कि टीवी की दुनिया की असल तस्वीर आपके सामने रहे। मेरे ब्लाग TV स्टेशन पर जरूर पढिए।
MEDIA : अब तो हद हो गई !
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/media.html#comment-form

Ranjana verma said...

पिता की स्मृति बहुत ही भावुककर देने वाली रचना.

kshama said...

जानती हूँ
तुम्हारा जादू
सिर्फ मेरे लिए था
तुम सिर्फ मेरे जादूगर थे
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी
यही तो था तुम्हारा जादू !
ओ जादूगर,
एक आखिरी जादू दिखाओ न !
Kaash! Zindagee aisa jadu dikhala sake!Bada bhavuk kar diya aapne!
Mere blogpe comment ke liye shukriya...Beti ma banna nahi chahti to wo maa banneka ehsaas uske sukh dukh kahan jaan payegi? Uske byah ko to 10 saal ho gaye!

Unknown said...

बेहतरीन यादों संग ज़िन्दगी से शिकायत भी और अनुरोध खुबसूरत *******

Neeraj Neer said...

वाह बहुत उम्दा एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (22.07.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी. कृपया पधारें .

सहज साहित्य said...

इस कविता में से जो भोलापन झाँक रहा है , वह जेन्नी शबनम की अभिव्यक्ति का जादू है कि किसी छोटे से प्रसंग से लिपटी स्मृतियाँ पाठक को भिगो सकती हैं । मैं जब जेन्नी जी की कविता पढ़ता हूँ तो हर बात का नयापन भाव-विमुग्ध कर देता है। जादूगर के रूप में पिता का वात्सल्य पूरी कविता का प्राण है। बहुत बधाई !

Udan Tashtari said...

ओ जादूगर,
एक आखिरी जादू दिखाओ न !


-मार्मिक...बहुत उम्दा

Jyoti khare said...

यह रचना नहीं मन के अंदर की सच्ची अनकही और सार्थक अनुभूति है
ऐसी अनुभूति कभी कभार पढ़ने मिलती है----
अदभुत
सादर

वाणी गीत said...

वाकई पिता जादूगर ही होते हैं !
उनकी स्मृतियों को नमन !

Aparna Bose said...

और अब मैं
ज़िन्दगी और जादू को समझने लगी हूँ
फिर भी...
मेरा मन है
एक बार और
तुम मेरे जादूगर बन जाओ
और मैं
तुम्हारे जादू में
अपना रोना भूल
एक आखिरी बार खिल जाऊँ ।.....marmsparshi abhivyakti.... excellent

Unknown said...

बहुत सुंदर,

यहाँ भी पधारे
गुरु को समर्पित
http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_22.html

Dayanand Arya said...

भावनात्मक प्रस्तुती