रविवार, 8 मार्च 2015

490. क्या हुक्म है मेरे आका...

क्या हुक्म है मेरे आका...

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अक्सर सोचती हूँ 
किस ग्रह से मैं आई हूँ 
जिसका ठिकाना 
न कोख़ में 
न घर में 
न गाँव शहर में  
मुमकिन है 
उस ख़ुदा के घर में भी नहीं 
अन्यथा क्रूरता के इस जंगल में 
बार-बार मुझे भेजा न गया होता 
चाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होऊँ 
चाहे जियूँ चाहे मरूँ 
चाहे तमाम दर्द के साथ हँसूँ 
पग-पग पर एक कटार है 
परम्परा का 
नातों का 
नियति का 
जो कभी कोख में 
झटके से घुसता है 
कभी बदन में 
ज़बरन ठेला जाता है 
कभी कच्ची उम्र के मन को 
हल्के-हल्के चीरता है 
जरा-ज़रा सीने में घुसता है 
घाव हर वक़्त ताज़ा 
तन से मन तक रिसता रहता है  
जाने ये कौन सा वक़्त है 
कभी बढ़ता नहीं 
दिन महीना साल सदी 
कुछ बदलता नहीं 
हर रोज़ उगना डूबना 
शायद सूरज ने अपना शाप 
मुझे दे दिया है 
तन का पीर 
तन से ज़्यादा 
मन का पीर है 
मैं बुझना चाहती हूँ 
मैं मिटना चाहती हूँ 
बेघरबार हूँ 
चाहे उस स्वर्ग में जाऊँ 
चाहे इस नरक में टिकूँ 
अब बहुत हुआ 
अपने उस ग्रह पर 
लौटना चाहती हूँ 
जहाँ से इस जंगल में 
निहत्था मुझे भेजा गया 
शिकार होने के लिए 
जाकर शीघ्र लौटूँगी अपने ग्रह से 
अपने हथियार के साथ 
फिर करूँगी 
उन जंगली जानवरों पर वार
जिन्होंने मुझे अधमरा कर दिया है
अपने शौक के लिए
मेरी साँसों को बंधक बना कर रखा है
बोतल के जिन की तरह
जो कहे -
''क्या हुक्म है मेरे आका'' !

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)

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7 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

कडुवा सच ... आक्रोश है रचना में जो शायद जायज है ...

RAMESHWAR KAMBOJ HIMANSHU ने कहा…

इस कविता का एक -एक शब्द नश्तर की तरह चीरता है । ये पंक्तियाँ बहुत कुछ बयान कर देती हैं-पग-पग पर एक कटार है
परम्परा का
नातों का
नियति का
जो कभी कोख में
झटके से घुसता है
कभी बदन में
ज़बरन ठेला जाता है
कभी कच्ची उम्र के मन को
हल्के-हल्के चीरता है
जरा-ज़रा सीने में घुसता है
घाव हर वक़्त ताज़ा
तन से मन तक रिसता रहता है
जाने ये कौन सा वक़्त है
कभी बढ़ता नहीं
दिन महीना साल सदी
कुछ बदलता नहीं

PRAN SHARMA ने कहा…

Aakee kavita ne man dravit kar diya hai .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-03-2015) को "सपना अधूरा ही रह जायेगा ?" {चर्चा अंक-1913} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Reena Maurya ने कहा…

नारी जीवन पर बेहद भावपूर्ण रचना..

Rakesh Kumar ने कहा…

अंतस्थल के दर्द को साक्षात् प्रस्तुत किया है आपने

सादर प्रणाम आपको

abhishek shukla ने कहा…

व्यथित मन, व्यथित तन और व्यथित जीवन
तीन अवस्था....फिर मृत्यु.......अजीब सी है न कहानी जीवन की।