Saturday, 16 November 2019

639. धरोहर

धरोहर   

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मेरी धरोहरों में कई ऐसी चीज़ें हैं   
जो मुझे बयान करती हैं   
मेरी पहचान करती हैं   
कुछ पुस्तकें जिनमें लेखकों के हस्ताक्षर   
और मेरे लिए कुछ संदेश है   
कुछ यादगार कपड़े जिसे मैंने   
किसी ख़ास वक़्त पर लिए या पहने हैं   
कुछ छोटी-छोटी परची जिनपर   
मेरे बच्चों की आड़ी तिरछी लकीरों में   
मेरा बचपन छुपा हुआ है   
अनलिखे में गुज़रा कल लिखा हुआ है   
कुछ नाते जिसे किस्मत ने छीने   
उनकी यादों का दिल में ठिकाना है   
कुछ अपनों का छल भी है   
जिससे मेरा सीना छलनी है   
कुछ रिश्ते जो मेरे साथ तब भी होते हैं   
जब हार कर मेरा दम टूटने को होता है   
साँसों से हाथ छूटने को होता है   
कुछ वक़्त जब मैंने जीभर कर जिया है   
बहुत शिद्दत से प्रेम किया है   
यूँ तब भी अँधेरों का राज था   
पर ख़ुद पर यक़ीन किया था   
ये धरोहरें मेरे साथ विदा होंगी जब कजा आएगी   
मेरे बाद न इनका संरक्षक होगा   
न कोई इनका ख़्वाहिशमंद होगा   
मेरे सिवा किसी को इन से मुहब्बत नहीं होगी   
मेरी किसी धरोहर की वसीयत नहीं होगी   
मेरी धरोहरें मेरी हैं बस मेरी   
मेरे साथ ही विदा होंगी।   

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2019)   

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2 comments:

Sagar said...

मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।
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Onkar said...

सुंदर रचना