Saturday, 4 April 2020

653. शाम

शाम  

*******  

ऐसी कोई शाम हो  
जब थका हारा जीवन  
अपने अंत पर हो  
एक बड़ा चमत्कार हो जाए  
ढ़लता सूरज सब जान जाए  
भेज दे वो अपने रथ से थोड़ा सुकून
और हर ले उदासी  
भले ही वह पल शाम हो  
पर जीवन की सुबह बन जाए  
शाम से रात तक  
जीवन को अर्थ मिल जाए  
काश ऐसी कोई शाम हो  
ढ़लता सूरज देवता बन जाए।

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2020)  

__________________________

9 comments:

विश्वमोहन said...

वाह! बहुत सुंदर।

Onkar said...

सुन्दर रचना

सदा said...

वाह अनुपम भाव ...

Ravindra Singh Yadav said...

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (06 -04-2020) को 'इन दिनों सपने नहीं आते' (चर्चा अंक-3663) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
*****
रवीन्द्र सिंह यादव

RAKESH KUMAR SRIVASTAVA 'RAHI' said...

आशा और विश्वास से भरी रचना.

Meena sharma said...

काश ! कोई ऐसी शाम हो !
बोझिल शामों से मन उकता गया अब....

Sweta sinha said...

सुंदर सृजन।
सादर।

अनीता सैनी said...

वाह !बहुत ही सुंदर सृजन आदरणीया
सादर

Jyoti khare said...

वाह
बहुत सुंदर सृजन