शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

587. मीठी-सी बोली (हिन्दी दिवस पर 10 हाइकु)

मीठी-सी बोली 

***   

1.   
मीठी-सी बोली   
मातृभाषा हमारी   
ज्यों मिश्री घुली।    

2.   
हिन्दी है रोती   
बेबस व लाचार   
बेघर होती।    

3.   
प्यार चाहती   
अपमानित हिन्दी   
दुखड़ा रोती।    

4.   
अँग्रेज़ी भाषा   
सर चढ़के बोले   
हिन्दी ग़ुलाम।    

5.   
विजय-गीत   
कभी गाएगी हिन्दी   
आस न टूटी।    

6.   
भाषा लड़ती   
अँग्रेज़ी और हिन्दी   
कोई न जीती।    

7.   
जन्मी दो जात   
अँग्रेज़ी और हिन्दी   
भारत देश।    

8.   
मन की पीर   
किससे कहे हिन्दी   
है बेवतन।    

9.   
हिन्दी से नाता   
नौकरी मिले कैसे   
बड़ी है बाधा।    

10.   
हमारी हिन्दी   
पहचान मिलेगी   
आस में बैठी।    

-जेन्नी शबनम (14.9.2018)   
(हिन्दी दिवस)
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सोमवार, 10 सितंबर 2018

586. चाँद रोज़ जलता है (तुकांत)

चाँद रोज़ जलता है   

*******   

तूने ज़ख़्म दिया तूने कूरेदा है   
अब मत कहना क़हर कैसा दिखता है।   

राख में चिंगारी तूने ही दबाई   
अब देख तेरा घर ख़ुद कैसे जलता है।   

तू हँसता है करके बरबादी ग़ैरों की   
ग़ुनाह का हिसाब ख़ुदा रखता है।   

पैसे के परों से तू कब तक उड़ेगा   
तेज़ बारिशों में काग़ज़ कब टिकता है।   

तू न माने 'शब' के दिल को सूरज जाने   
उसके कहे से चाँद रोज़ जलता है।   

- जेन्नी शबनम (10. 9. 2018)   
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शनिवार, 1 सितंबर 2018

585. फ़ॉर्मूला (पुस्तक 65)

फ़ॉर्मूला   

*******   

मत पूछो ऐसे सवाल   
जिसके जवाब से तुम अपरिचित हो   
तुम स्त्री-से नहीं हो   
समझ न सकोगे स्त्री के जवाब   
तुम समझ न पाओगे, स्त्री के जवाब में   
जो मुस्कुराहट है, जो आँसू है   
आख़िर क्यों है,   
पुरूष के जीवन का गणित और विज्ञान   
सीधा और सहज है   
जिसका एक निर्धारित फ़ॉर्मूला है   
मगर स्त्रियों के जीवन का गणित और विज्ञान   
बिलकुल उलट है   
बिना किसी तर्क का   
बिना किसी फ़ॉर्मूले का,   
उनके आँसुओं के ढेरों विज्ञान हैं    
उनकी मुस्कुराहटों के ढेरों गणित हैं   
माँ, पत्नी, पुत्री या प्रेमिका   
किसी का भी जवाब तुम नहीं समझ सकोगे   
क्योंकि उनके जवाब में अपना फ़ॉर्मूला फिट करोगे,   
तुम्हारे सवाल और जवाब, दोनों सरल हैं   
पर स्त्री का मन, देवताओं के भी समझ से परे है   
तुम तो महज़ मानव हो   
छोड़ दो इन बातों को   
मत विश्लेषण करो स्त्रियों का   
समय और समझ से दूर   
एक अलग दुनिया है स्त्रियों की   
जहाँ किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं, न ही वर्जित है   
परन्तु शर्त एक ही है   
तुम महज़ मानव नहीं, इंसान बनकर प्रवेश करो   
फिर तुम भी जान जाओगे   
स्त्रियों का गणित   
स्त्रियों का विज्ञान   
स्त्रियों के जीवन का फ़ॉर्मूला   
फिर सारे सवाल मिट जाएँगे   
और जवाब तुम्हें मिल जाएगा।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2018)   
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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

584. कम्फर्ट ज़ोन

कम्फर्ट ज़ोन  
 
***   

कम्फ़र्ट ज़ोन के अन्दर    
तमाम सुविधाओं के बीच   
तमाम विडम्बनाओं के बीच   
सुख का मुखौटा ओढ़े   
शनैः-शनैः बीत जाता है, रसहीन जीवन   
हासिल होता है, महज़ रोटी, कपड़ा, मकान   
बेरंग मौसम और रिश्तों की भरमार। 
   
कम्फर्ट ज़ोन के अन्दर 
नहीं होती है कोई मंज़िल    
अगर है, तो पराई है मंज़िल।
   
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर   
अथाह परेशानियाँ मगर असीम सम्भावनाएँ    
अनेक पराजय मगर स्व-अनुभव   
अबूझ डगर मगर रंगीन मौसम   
असह्य संग्राम मगर अक्षुण्ण आशाएँ   
अपरिचित दुनिया मगर बेपनाह मुहब्बत   
अँधेरी राहें मगर स्पष्ट मंज़िल। 
  
बेहद कठिन है फ़ैसला लेना   
क्या उचित है? 
अपनी मंज़िल या कम्फर्ट ज़ोन। 

-जेन्नी शबनम (28.8.2018)   
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शनिवार, 18 अगस्त 2018

583. खिड़की स्तब्ध है

खिड़की स्तब्ध है

*******   

खिड़की, महज़ एक खिड़की नहीं   
वह एक एहसास है, संभावना है   
भीतर और बाहर के बीच का भेद   
वह बख़ूबी जानती है   
इस पार छुपा हुआ संसार है   
जहाँ की आवोहवा मौन है   
उस पार विस्तृत संसार है   
जहाँ बहुत कुछ मनभावन है   
खिड़की असमंजस में है   
खिड़की सशंकित है   
कैसे पाट सकेगी   
कैसे भाँप सकेगी   
दोनों संसार को   
एक जानदार है   
एक बेजान है,   
खिड़की स्तब्ध है!   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2018)
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बुधवार, 15 अगस्त 2018

582. सिंहनाद करो

सिंहनाद करो  
 
***   

व्यर्थ लगता है   
शब्दों में समेटकर 
हिम्मत में लपेटकर 
अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करना। 
 
हम जिसे अपनी आज़ादी कहते हैं 
हम जिसे अपना अधिकार मानते हैं 
सुकून से दरवाज़े के भीतर 
देश की दुर्व्यवस्था पर 
देश और सरकार को कोसते हैं 
अपनी ख़ुशनसीबी पर 
अभिमान करते हैं कि हम सकुशल हैं। 
 
यह भ्रम जाने किस वक़्त टूटे   
असंवेदनशीलता का क़हर   
जाने कब धड़धड़ाता हुआ आए   
हमारे शरीर और आत्मा को छिन्न-भिन्न कर जाए। 

ज्ञानी-महात्मा कहते हैं  
सब व्यर्थ है 
जग मोह है, माया है, क्षणभंगुर है  
फिर तो व्यर्थ है हमारी सोच 
व्यर्थ है हमारी अभिलाषाएँ 
जो हो रहा है, होने दो 
नदी के साथ बहते जाओ 
आज़ादी हमारा अधिकार नहीं 
बस जीते जाओ, जीते जाओ। 
   
यही वक़्त है   
ख़ुद से अब साक्षात्कार करो 
सारे क़हर आत्मसात करो 
या फिर सिंहनाद करो।

-जेन्नी शबनम (15.8.2018)   
(स्वतंत्रता दिवस)
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रविवार, 5 अगस्त 2018

581. अनछुई-सी नज़्म (क्षणिका)

अनछुई-सी नज़्म   

*******   

कुछ कहो कि सन्नाटा भाग जाए   
चुप्पियों को लाज आ जाए   
अँधेरों की तक़दीर में भर दो रोशनाई से रंग   
कि छप जाए रंगों भरी ग़ज़ल   
और सदके में झुक जाए मेरी अनछुई-सी नज़्म।     

- जेन्नी शबनम (5. 8. 2018)
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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

580. गुमसुम प्रकृति (प्रकृति पर 10 सेदोका)

गुमसुम प्रकृति
(प्रकृति पर 10 सेदोका)   

*******   

1.   
अपनी व्यथा   
गुमसुम प्रकृति   
किससे वो कहती   
बेपरवाह   
कौन समझे दर्द   
सब स्वयं में व्यस्त।   

2.   
वन, पर्वत   
सूरज, नदी, पवन   
सब हुए बेहाल   
लड़खड़ाती   
साँसें सबकी डरी   
प्रकृति है लाचार।   

3.   
कौन है दोषी?   
काट दिए हैं वन   
उगा कंक्रीट-वन   
मानव दोषी   
मगर है कहता -   
प्रकृति अपराधी।   

4.   
दोषारोपण   
जग की यही रीत   
कोई न जाने प्रीत   
प्रकृति तन्हा   
किस-किस से लड़े   
कैसे ज़खम सिले।   

5.   
नदियाँ प्यासी   
दुनिया ने छीनी है   
उसका मीठा पानी,   
करो विचार   
प्रकृति है लाचार   
कैसे बुझाए प्यास।   

6.   
बाँझ निगोड़ी   
कुम्हलाई धरती   
नि:संतान मरती   
सूखा व बाढ़   
प्रकृति का प्रकोप   
धरा बेचारी।   

7.   
सब रोएँगे   
साँसें जब घुटेंगी   
प्रकृति भी रोएगी,   
वक्त है अभी   
प्रकृति को बचा लो   
दुनिया को बसा लो।   

8.   
विषैले नाग   
ये कल कारखाना   
ज़हर उगलते   
साँसें उखड़ी   
ज़हर पी-पी कर   
प्रकृति है मरती।   

9.   
लहूलुहान   
खेत व खलिहान   
माँगता बलिदान   
रक्त पिपासु   
खुद मानव बना   
धरा का खून पिया।   

10.   
प्यासी नदियाँ   
प्यासी तड़पे धरा   
प्रकृति भी है प्यासी,   
छाई उदासी,   
अभिमानी मानव   
विध्वंस को आतूर।   

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2018)

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रविवार, 22 जुलाई 2018

579. तपता ये जीवन (10 ताँका)

तपता ये जीवन 

***   

1.   
अँजुरी भर   
सुख की छाँव मिली   
वह भी छूटी   
बच गया है अब   
तपता ये जीवन।   

2.   
किसे पुकारूँ   
सुनसान जीवन   
फैला सन्नाटा,   
आवाज़ घुट गई   
मन की मौत हुई।   

3.   
घरौंदा बसा   
एक-एक तिनका   
मुश्किल जुड़ा,   
हर रिश्ता विफल   
ये मन असफल।   

4.   
क्यों नहीं बनी   
किस्मत की लकीरें   
मन है रोता,   
पग-पग पे काँटे   
आजीवन चुभते।   

5.   
सावन आया   
पतझर-सा मन   
नहीं हर्षाया,   
जीवन होता, काश!    
गुलमोहर-गाछ।   

6.   
नहीं विवाद   
मालूम है, जीवन   
क्षणभंगुर   
कैसे न दिखे स्वप्न   
मन नहीं विपन्न।   

7.   
हवा के संग   
उड़ता ही रहता   
मन-तितली   
मुर्झाए सभी फूल   
कहीं मिला न ठौर।   

8.   
तड़प रहा   
प्रेम की चाहत में   
मीन-सा मन,   
प्रेम लुप्त हुआ, ज्यों   
अमावस का चाँद।   

9.   
जो न मिलता   
सिरफिरा ये मन   
वही चाहता   
हाथ पैर मारता   
अंतत: हार जाता।   

10.   
स्वप्न-संसार   
मन पहरेदार   
टोकता रहा,   
जीवन से खेलता 
दिमाग अलबेला।   

-जेन्नी शबनम (25.5.2018) 
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बुधवार, 18 जुलाई 2018

578. उनकी निशानी (पुस्तक - 49)

उनकी निशानी  

*******  

आज भी रखी हैं, बहुत सहेजकर  
अतीत की कुछ यादें  
कुछ निशानियाँ  
कुछ सामान  
टेबल, कुर्सी, पलंग, बक्सा  
फ़ुल पैंट, बुशर्ट और घड़ी  
टीन की पेटी   
एक पुराना बैग, जिसमें कई जगह मरम्मत है  
और एक डायरी, जिसमें काफ़ी कुछ है  
हस्तलिखित, जिसे लिखते हुए  
उन्होंने सोचा भी न होगा कि  
यह निशानी बन जाएगी  
हमलोगों के लिए बच जाएगा  
बहुत कुछ थोड़ा-थोड़ा  
जिसमें पिता हैं पूरे के पूरे  
और हमारी यादों में आधे-अधूरे  
कुछ चिट्ठियाँ भी हैं  
जिनमें रिश्तों की लड़ी है  
जीवन-मृत्यु की छटपटाहट है  
संवेदनशीलता है, रूदन है, क्रंदन है  
जीवन का बंधन है  
उस काले बैग में  
उनके सुनहरे सपने हैं  
उनके मिज़ाज हैं  
उनकी बुद्धिमता है  
उनके बोए हुए फूल हैं  
जो अब बोन्जाई बन गए  
सब स्थिर है, कोई कोहराम नहीं  
बहुत कुछ अनकहा है  
जिसे अब हमने पूरा-पूरा जाना है  
उनकी निशानियों में  
उनको तलाशते-तलाशते  
अब समझ आया  
मैं ही उनकी यादें हूँ  
मैं ही उनके सपने हूँ  
मेरा पूरा-का-पूरा वजूद  
उनकी ही तो निशानी है  
मैं उनकी निशानी हूँ।  

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2018)  
(पापा की 40 वीं पुण्यतिथि पर)
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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

577. रंगरेज हमारा (चोका - 2)

रंगरेज हमारा   

*******   

सुहानी संध्या   
डूबने को सूरज   
देखो नभ को 
नारंगी रंग फैला   
मानो सूरज   
एक बड़ा संतरा   
साँझ की वेला   
दीया-बाती जलाओ   
गोधूली-वेला 
देवता को जगाओ,   
ऋचा सुनाओ,   
अपनी संस्कृति को   
मत बिसराओ,   
शाम होते ही जब   
लौटते घर   
विचरते परिंदे   
गलियाँ सूनी   
जगमग रोशनी   
वो देखो चन्दा   
हौले-हौले मुस्काए   
साँझ ढले तो   
सूरज सोने जाए   
तारे चमके   
टिम-टिम झलके   
काली स्याही से   
गगन रंग देता   
बड़ा सयाना   
रंगरेज हमारा   
सबका प्यारा   
अनोखी ये दुनिया   
किसने रची!   
हर्षित हुआ मन   
घर-आँगन   
देख सुन्दर रूप   
चकित निहारते !   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2012)

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

576. भाव और भाषा (चोका - 4)

भाव और भाषा   

******* 

भाषा-भाव का   
आपसी नाता ऐसे   
शरीर-आत्मा   
पूरक होते जैसे,   
भाषा व भाव   
ज्यों धरती-गगन   
चाँद-चाँदनी   
सूरज की किरणें   
फूल-खूशबू   
दीया और बाती   
तन व आत्मा   
एक दूजे के बिना   
सब अधूरे,   
भाव का ज्ञान   
भाव की अभिव्यक्ति   
दूरी मिटाता   
निकटता बढ़ाता,   
भाव के बिना   
सम्बन्ध हैं अधूरे   
बोझिल रिश्ते   
सदा कसक देते   
फिर भी जीते   
शब्द होते पत्थर   
लगती चोट   
घुटते ही रहते,   
भाषा के भाव   
हृदय का स्पंदन   
होते हैं प्राण   
बिन भाषा भी जीता   
मधुर रिश्ता   
हों भावप्रवण तो   
बिन कहे ही   
सब कह सकता   
गुन सकता,   
भाव-भाषा संग जो   
प्रेम पगता   
हृदय भी जुड़ता   
गरिमा पाता   
नज़दीकी बढ़ती   
अनकहा भी   
मन समझ जाता   
रिश्ता अटूट होता !  

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 18, 2012)

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शुक्रवार, 22 जून 2018

575. परवरिश

परवरिश  

***  

कहीं पथरीली, कहीं कँटीली  
यथार्थ की ज़मीन बंजर होती है  
जहाँ ख़्वाहिशों के फूल उगाना  
न सहज होता है, न सरल  
परन्तु फूल उगाना लाज़िमी है  
और उसकी ख़ुशबू का बसना भी  
यही जीवन का नियम है  
और इसी में जीवन की सुन्दरता है। 
 
वक़्त आ चुका है  
जब तुम अपनी ज़मीन पर  
सपनों से सींचकर  
ख़्वाहिशों के फूल खिलाओ  
अपनी दुनिया सँवारो  
और अपनी पहचान बनाओ।  

मुझे नहीं मालूम  
वक़्त के कैनवस पर  
हमारे सम्बन्ध की तस्वीर कैसी बनेगी  
मेरी तक़दीर कैसी होगी।
  
आशंकाओं के बादल घुमड़ते रहते हैं मुझमें  
बढ़ती उम्र के साथ अशक्त होने का डर सताता है मुझे  
अकेलेपन का ख़ौफ़ अभी से डराता है मुझे  
यों जबकि साथ ही तो रहते हैं हम।  

वह भी तो मेरी ही तरह माँ थी  
जिसने हर वह जतन किए होंगे  
जो संतान की परवरिश के लिए लाज़िमी है  
पर कुछ तो कमी रह गई  
जाने क्यों संवेदनशून्यता आ गई  
तमाम आरज़ुओं के साथ  
दरवाज़े को पथराई आँखों से देखती  
अपनों की राह अगोरती वह माँ  
छह माह की मृत कंकाल बन गई।
  
मुमकिन है तुम भी मुझे बिसरा दो  
वक़्त के साथ हमारे रिश्ते भूल जाओ  
वे सारे पल भी भूल जाओ  
जब उँगली पकड़कर, तुम्हें चलना सिखाया  
हाथ पकड़कर, तुम्हें लिखना सिखाया  
शब्द-शब्द जोड़कर, तुम्हें बोलना सिखाया।  

तुम्हें तो याद ही है  
मैंने बहुत बार बेवजह तुम्हें मारा है  
दूसरों का ग़ुस्सा तुम पर निकाला है  
लेकिन तुम यह नहीं जानते  
जब-जब तुम्हें मारा मैंने  
हर उस रात तुम्हें पकड़कर, रोकर गुज़ारी मैंने। 
  
कई बार तुम्हारे हाथों को ज़ोर से झटका है  
जब एक ही शब्द को बार-बार लिखना सिखाती थी  
और तुम सही-सही लिख नहीं पाते थे  
हर उस रात तुम्हारी नन्ही हथेली को लेकर  
तमाम रात रोकर गुज़ारी मैंने। 
  
काम की भीड़ में तुम्हें खिलाना  
उफ़! कितना बड़ा काम था  
कई बार तुम्हें खाने के लिए मारा है मैंने  
और हर उस दिन मेरे मुँह में निवाला न जा सका  
भले सारा काम निपटा लिया मैंने। 
  
तुम्हारी हर एक ज़िद  
कम में ही सही, पर पूरी की मैंने  
एक पल को भी कभी  
तुम्हें अकेला न छोड़ा मैंने  
हाँ! यह ज़रूर है  
मेरे पास उन सभी लम्हों का  
कोई सुबूत नहीं है  
न मेरे प्यार का, न मेरे व्यवहार का  
न उस वक़्त का, न उन हालातों का।  

तुम अपनी कचहरी में  
चाहो तो मुझ पर मुक़दमा करो  
चाहो तो सज़ा दो  
मुझ पर इल्ज़ाम है-  
पाप किया मैंने  
तुम्हें क्यों मारा मैंने  
तुम्हें ठीक से न पाला मैंने।
  
पाप-पुण्य का फ़ैसला 
तुम ही करो  
मैं बस ख़ामोश हूँ।  

वक़्त की कोख में  
मेरे अन्त की तस्वीर बन रही होगी  
आत्मा के लिए राह बिछ रही होगी  
नहीं मालूम सिर्फ़ काँटे ही मिलेंगे या फूल भी  
पर जिस राह से भी गुज़रूँगी  
जहाँ भी पहुँचूँगी   
बस दुआ ही करूँगी। 
 
जानते हो न  
माता कभी कुमाता नहीं होती।  

-जेन्नी शबनम (22.6.2018)  
(पुत्र के 25वें जन्मदिन पर)  
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रविवार, 13 मई 2018

574. प्यारी-प्यारी माँ (माँ पर 10 हाइकु) पुस्तक 96, 97

प्यारी-प्यारी माँ    

*******   

1.   
माँ की ममता   
नाप सके जो कोई   
नहीं क्षमता।   

2.   
अम्मा के बोल   
होते हैं अनमोल   
मत तू भूल।   

3.   
सब मानती   
बिन कहे जानती   
प्यारी-प्यारी माँ।   

4.   
दुआओं भरा   
ख़ज़ानों का भंडार   
माँ का अँचरा।   

5.   
प्रवासी पूत   
एक नज़र देखूँ,   
माँ की कामना।   

6.   
घरौंदा सूना   
पाखी-से उड़े बच्चे   
अम्मा उदास।   

7.   
माँ ने खिलाया   
हर एक निवाला   
नेह से भीगा।   

8.   
हुलसा मन   
लौटा प्रवासी पूत   
माँ का सपूत।   

9.   
प्रवासी पूत   
गुज़र गई अम्मा   
मिला न कंधा।   

10.   
माँ की मुराद   
फूलों-सा मुस्कुराएँ    
हमारे बच्चे!   

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2018)   
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मंगलवार, 1 मई 2018

573. ऐसा क्यों जीवन

ऐसा क्यों जीवन
   
***

ये कैसा सहर है   
ये कैसा सफ़र है   
रात-सा अँधेरा, जीवन का सहर है   
उदासी पसरा, जीवन का सफ़र है।
   
सुबह से शाम बीतता रहा   
जीवन का मौसम रुलाता रहा   
धरती निगोड़ी बाँझ हो गई   
आसमान जो सारी बदली पी गया।
   
अब आँसू है पीना
सपने है खाना    
यही है ज़िन्दगी   
यही हम जैसों की कहानी।
  
न मौसम है सुनता, न हुकूमत ही सुनती   
मिटते जा रहे हम, पर वे हँसते हैं हम पर  
सियासत के खेलों ने बड़ा है तड़पाया   
फाँसी के फँदों की बाँहों में पहुँचाया।
   
हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम   
हम पर ही आया   
पिछले जन्म का पाप   
अब हमने चुकाया।
   
अब आज़ादी का मौसम है   
न भूख है, न सपने हैं   
न आँसू है, न अपने हैं   
न सियासत के धोखे हैं। 
  
हम मर गए, पर मेरे सवाल जीवित हैं  
हम कामगारों का ऐसा जीवन क्यों?  
वे हमसे जीते हैं और हम मरते हैं क्यों?  
हमारे पुरखे भी मरे, हम भी मरते हैं क्यों? 
  
कैसा सहर है, कैसा सफ़र है   
मौत में उजाला ढूँढता, हमारा सहर है 
बेमोल जीवन, यही जीवन का सफ़र है।

-जेन्नी शबनम (1.5.2018) 
(श्रमिक दिवस)  
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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

572. विनती (क्षणिका)

विनती   

*******   

समय की शिला पर   
जाने किस घड़ी लिखी जीवन की इबारत मैंने   
ताउम्र मैं व्याकुल रही और वक़्त तड़प गया   
वक़्त को पकड़ने में 
मेरी मांसपेशियाँ कमज़ोर पड़ गईं   
दूरी बढ़ती गई और वक़्त लड़खड़ा गया   
अब मैं आँखें मूँदे बैठी समय से विनती करती हूँ-   
वक़्त दो या बिन बताए   
सब अपनों की तरह मेरे पास से भाग जाओ।  

- जेन्नी शबनम (18. 4. 2018)
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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

571. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (पुस्तक- 69)

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ  

*******   

वो कहते हैं-   
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।   
मेरे भी सपने थे, बेटी को पढ़ाने के   
किसी राजकुमार से ब्याहने के   
पर मेरे सपनों का क़त्ल हुआ   
मेरी दुनिया का अंत हुआ,   
पढ़ने ही तो गई थी मेरी लाडली   
ख़ून से लथपथ सड़क पर पड़ी   
जीवन की भीख माँग रही थी   
और वह राक्षस   
कैसे न पसीजा उसका मन   
उस जैसी उसकी भी तो होगी बहन   
वह भी तो किसी माँ का लाडला होगा   
माँ ने उसे भी अरमानों से पाला होगा   
मेरी दुलारी पर न सही   
अपनी अम्मा पर तो तरस खाता   
अपनी अम्मा के सपनों को तो पालता   
पर उस हवसी हैवान ने, मेरे सपनों का ख़ून किया   
मेरी लाडली को मार दिया   
कहीं कोई सुनवाई नहीं   
पुलिस कचहरी सब उसके   
ईश्वर अल्लाह सब उसके।   
आह! मेरी बच्ची!   
कितनी यातनाओं से गुज़री होगी   
अम्मा-अम्मा चीखती होगी   
समझ भी न पाई होगी   
उसके नाज़ुक अंगों को क्यों   
लहूलुहान किया जा रहा है   
क्षण-क्षण कैसे गुज़रे होंगे   
तड़प-तड़पकर प्राण छूटे होंगे।   
कहते हैं पाप-पुण्य का हिसाब इसी जहाँ में होता है   
किसी दूधमुँही मासूम ने कौन-सा पाप किया होगा  
जो कतरे-कतरे में कुतर दिया जाता है उसका जिस्म 
या कोई अशक्त वृद्धा जो जीवन के अंत के निकट है   
उसके बदन को बस स्त्री देह मान   
चिथड़ों में बदल दिया जाता है।   
बेटियों का यही हश्र है   
स्त्रियों का यही अंत है   
तो बेहतर है बेटियाँ कोख में ही मारी जाएँ    
पृथ्वी से स्त्रियों की जाति लुप्त ही हो जाए।   
ओ पापी कपूतों की अम्मा!   
तेरे बेटे की आँखों में जब हवस दिखा था   
क्यों न फोड़ दी थी उसकी आँखें   
क्यों न काट डाले थे उसके उस अंग को   
जिसे वह औज़ार बनाकर स्त्रियों का वध करता है।   
ओ कानून के रखवाले!   
इन राक्षसों का अंत करो   
सरेआम फाँसी पर लटकाओ   
फिर कहो-   
बेटी बचाओ   
बेटी पढाओ।   

- जेन्नी शबनम (12. 4. 2018)   
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शनिवार, 31 मार्च 2018

570. कैक्टस (पुस्तक - 71)

कैक्टस  

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एक कैक्टस मुझमें भी पनप गया है  
जिसके काँटे चुभते हैं मुझको  
और लहू टपकता है  
चाहती हूँ, हँसू खिलखिलाऊँ  
बिन्दास उड़ती फिरूँ  
पर जब भी, उठती हूँ, चलती हूँ  
उड़ने की चेष्टा करती हूँ  
मेरे पाँव और मेरा मन  
लहूलुहान हो जाता है  
उस कैक्टस से  
जिसे मैंने नहीं उगाया  
बल्कि समाज ने मुझमें जबरन रोपा था  
जब मैं कोख में आई थी  
और मेरी जन्मदात्री  
अपने कैक्टस से लहूलुहान थी  
और उसकी जन्मदात्री अपने कैक्टस से।    
देखो! हम सब का लहू रिस रहा है  
अपने-अपने कैक्टस से।  

- जेन्नी शबनम (31. 3. 2018)  
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रविवार, 18 मार्च 2018

569. ज़िद्दी मन (क्षणिका)

ज़िद्दी मन  

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ज़िद्दी मन ज़िद करता है 
जो नहीं मिलता वही चाहता है  
तारों से भी दूर मंज़िल ढूँढता है  
यायावर-सा भटकता है  
ज़ीस्त में जंग ही जंग पर सुकून की बाट जोहता है  
ये मेरा ज़िद्दी मन अल्फ़ाज़ का बंदी मन  
ख़ामोशी ओढ़के जग को ख़ुदा हाफ़िज़ कहता है  
पर्वत-सी ज़िद ठाने, कतरा-कतरा ढहता है  
पल-पल मरता है, पर जीने की ज़िद करता है।  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2018)  
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गुरुवार, 8 मार्च 2018

568. पायदान (क्षणिका)

पायदान  

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सीढ़ी की पहली पायदान हूँ मैं  
जिसपर चढ़कर समय ने छलाँग मारी  
और चढ़ गया आसमान पर  
मैं ठिठककर तब से खड़ी  
काल-चक्र को बदलते देख रही हूँ,  
न जिरह न कोई बात कहना चाहती हूँ  
न हक़ की, न ईमान की, न तब की, न अब की।  
शायद यही प्रारब्ध है मेरा  
मैं, सीढ़ी की पहली पायदान।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2018)  
(महिला दिवस)
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