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शनिवार, 15 अगस्त 2026

808. आज़ादी मिले

आज़ादी मिले  

*** 

जन्म से मिलती है
मृत्यु तक मिलती है
साँस लेने की आज़ादी
पलक झपकाने की आज़ादी
सोचने की आज़ादी
वैसे ही हर इंसान को मिले
समान शिक्षा और स्वास्थ्य की आज़ादी
धार्मिक पाखण्ड और कुरीतियों से आज़ादी
अपने अस्तित्व, अधिकार और आत्मसम्मान को 
बनाए रखने की आज़ादी
देश का हर नागरिक बराबर हो!
स्वतंत्रता दिवस मुबारक हो!

-जेन्नी शबनम (15.8.2026)
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सोमवार, 15 अगस्त 2022

747. आज़ादी का अमृत महोत्सव

आज़ादी का अमृत महोत्सव 

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नहीं चलना ऐसे   
जब किसी की परछाईं पीछा करे   
नहीं देखना उसे   
जो तुम्हारी नज़रों की तलाश को ख़ुद तक रोके   
नहीं सुनना उसे   
जो तुम्हारी न सुने, सिर्फ़ अपनी कहे   
नहीं निभाना साथ उसके   
जिसका फ़रेब तुम्हें सताता रहे   
नहीं करना प्रेम उससे   
जो बदले में तुम्हारी आज़ादी छीने   
नहीं उलझना उससे, जो साँसों की पहरेदारी करे   
आज़ादी की बात कर साँसें लेना मुहाल करे। 
  
ज़िन्दगी एक बार ही मिलती है   
आज़ादी बड़े-बड़े संघर्षों से मिलती है   
ठोकर मारकर शातिरों को   
जीवन का जश्न जीभरकर मनाओ   
अपनी धरती, अपना आसमाँ, अपना जहाँ   
बेबाक बनकर आज़ादी का लुत्फ़ उठाओ। 
  
आज़ादी की साँसें दिल से दिल तक हो   
आज़ादी की बातें मन से मन तक हो   
जीकर देखो कि कितनी मिली आज़ादी   
किससे कब-कब मिली आज़ादी   
लेनी नहीं है भीख में आज़ादी   
हक़ है, जबरन छीननी है आज़ादी।
   
आज़ादी का यह अमृत महोत्सव   
सबके लिए है, तो तुम्हारे लिए भी है। 

-जेन्नी शबनम (15.8.22) 
(स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगाँठ) 
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बुधवार, 15 अगस्त 2018

582. सिंहनाद करो

सिंहनाद करो  
 
***   

व्यर्थ लगता है   
शब्दों में समेटकर 
हिम्मत में लपेटकर 
अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करना। 
 
हम जिसे अपनी आज़ादी कहते हैं 
हम जिसे अपना अधिकार मानते हैं 
सुकून से दरवाज़े के भीतर 
देश की दुर्व्यवस्था पर 
देश और सरकार को कोसते हैं 
अपनी ख़ुशनसीबी पर 
अभिमान करते हैं कि हम सकुशल हैं। 
 
यह भ्रम जाने किस वक़्त टूटे   
असंवेदनशीलता का क़हर   
जाने कब धड़धड़ाता हुआ आए   
हमारे शरीर और आत्मा को छिन्न-भिन्न कर जाए। 

ज्ञानी-महात्मा कहते हैं  
सब व्यर्थ है 
जग मोह है, माया है, क्षणभंगुर है  
फिर तो व्यर्थ है हमारी सोच 
व्यर्थ है हमारी अभिलाषाएँ 
जो हो रहा है, होने दो 
नदी के साथ बहते जाओ 
आज़ादी हमारा अधिकार नहीं 
बस जीते जाओ, जीते जाओ। 
   
यही वक़्त है   
ख़ुद से अब साक्षात्कार करो 
सारे क़हर आत्मसात करो 
या फिर सिंहनाद करो।

-जेन्नी शबनम (15.8.2018)   
(स्वतंत्रता दिवस)
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मंगलवार, 15 अगस्त 2017

555. कैसी आज़ादी पाई (स्वतंत्रता दिवस पर 4 हाइकु) पुस्तक - 91, 92

कैसी आज़ादी पाई  

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1.  
मन है क़ैदी,  
कैसी आज़ादी पाई?  
नहीं है भायी।   

2.  
मन ग़ुलाम  
सर्वत्र कोहराम,  
देश आज़ाद।   

3.  
मरता बच्चा  
मज़दूर, किसान,  
कैसी आज़ादी?  

4.  
हूक उठती,  
अपने ही देश में  
हम ग़ुलाम।   

- जेन्नी शबनम (15. 8. 2017)  
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शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

464. आज़ादी की बात

आज़ादी की बात

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आज़ादी की बाबत पूछते हो 
मानो सीने के ज़ख़्म कुरेदते हो 
लौ ही नहीं जलती 
तो उजाले की लकीर कहाँ दिखेगी 
अँधेरों की सरपरस्ती में 
दीये की थरथराहट गुम हो जाएगी। 
 
पंछी के पर उगने ही कब दिए 
जो न उगने पर सवाल करते हो
तमाम पहर, तमाम उम्र इबादत की  
पर ख़ुदा तो तेरे शहर में नज़रबन्द है 
गुहार के लिए देवता कहाँ से लाऊँ? 

बदन के हर हिस्से में नंगी तलवारें घुसती हैं 
लहू के कारोबार में ज़िन्दगी मिटती है 
फिर भी आज़ादी की बाबत पूछते हो?
 
सदियों से सब सोए हैं 
अपनी-अपनी तक़दीर के भरोसे   
जाओ तुम सब सो जाओ, अपने-अपने महलों में 
ताकि किसी का मिटना देख न सको
किसी का सिसकना सुन न सको। 

हमें इन्तिज़ार है 
जाने कब दबे पाँव आ जाए आज़ादी 
और हुंकार के साथ छुड़ा दे उस ज़ंजीर से 
जिसने जकड़ रखा है हमारा मन 
काट डाले उस ग़ुलामी को  
जिससे हमारी साँसें धीरे-धीरे सिमट रही हैं। 
 
हर रोज़ मन में एक किरण उगती है  
जो आज़ादी की राह ताकती है 
फिर धीरे-धीरे दम तोड़ती है 
पर एक उम्मीद है, जो हारती नहीं 
हर रोज़ कहती है
वह किरण ज़रूर उगेगी 
जो आज़ादी को पकड़ लाएगी    
फिर आज़ादी की बाबत पूछना 
आज़ादी का रंग क्या और सूरत है क्या
रोटी और छत की जंग है क्या
अस्मत और क़िस्मत की आज़ादी है क्या। 

एक दिन सब बताऊँगी  
जब ज़रा-सी आज़ादी जिऊँगी   
फिर आज़ादी की बात करूँगी।

-जेन्नी शबनम (15.8.2014)
(स्वतंत्रता दिवस)
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