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रविवार, 16 नवंबर 2025

795. जश्न जारी है

जश्न जारी है

***


तिनके के लिए भी राह न बची
उम्मीद के दरवाज़े बंद हो गए 
खिड़की ने अपने पल्ले ठेलकर
निश्चित किया कि प्रवेश निषिद्ध  रहे।

दरवाज़े व खिड़की की झिरी से
ठण्डी-स्वच्छ हवा आती है
यहाँ की ऊबन से घबराकर  
थकी-उदास लौट जाती है।

उम्मीद की राहें बंद हुईं
पर फ़रियाद दिल की मिटी नहीं
साँसों की गिनती घटती रही
पर ख़्वाहिशें कभी मिटी नहीं।

प्रारब्ध अटल है चुकाना ही होगा
नियम तय है चलना ही होगा
समझना-समझाना सब फ़िज़ूल
हर कर्म यहाँ भुगतना ही होगा।

जीवन और साँसों का बोझ भारी है
उम्मीद हारी है पर जीवन जारी है
जाने जीने की ये कैसी लाचारी है
साँसें घटीं पर दुःख का जश्न जारी है।

बंद दरवाज़े व खिड़की के पीछे
आह की नदी एक बहती है
जब भी मन हो आकर डूब जाना
मुझसे बार-बार यह कहती है।

बंद दरवाज़े व खिड़की के पीछे
मेरी प्यासी रूह भटकती है 
उम्मीद हारी है अब जीवन की बारी है  
आह की नदी से हुई अब यारी है।

-जेन्नी शबनम (16.11.2025)
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गुरुवार, 16 नवंबर 2023

768. जीकर देखना है

जीकर देखना है   

***


जीवन तो जी लिया 

कभी अपने लिए जीकर देखा क्या? 

सच ही है 

जीते-जीते जीना कब कोई भूल जाता है

कुछ पता नहीं चलता

तभी तो कोई पूछता है- 

कभी अपने लिए जीकर देखा है?

यह तो यूँ है जैसे कोई नदी से पूछे- तुमने बहकर देखा है 

बादलों से पूछे- तुमने बारिश में नहाकर देखा है 

आग से पूछे- तुमने जलकर देखा है 

सूरज से पूछे- तुमने उगकर-डूबकर देखा है 

सबकी फ़ितरत एक जैसी है 

अनवरत नियमों के साथ रहना

पर मैं क्यों प्रकृति के विरुद्ध? 

साँसें का चलना, दिल का धड़कना

यही तो नियम है

पर मैं प्रफुल्लित क्यों नहीं?

नदी-बादल-आग-सूरज 

वे तल्लीन हैं अपने बहाव में

अकेले होकर भी ख़ुश 

प्रकृति के नियमों से बँधे, सिर्फ़ अपने साथ

 कोई हड़बड़ी,  घबराहट

 कुछ छूटने का डर,  कुछ पाने की लालसा 

शायद यही जीवन है

फ़लसफ़ा भले कुछ भी हो

पर सत्य तो यही है

ये प्रवाहमय होकर दूसरों को सुख पहुँचाते हैं 

स्वयं भी आह्लादित रहते हैं। 

प्रवाहमान तो मैं भी हूँ 

पर  मैं ख़ुश हूँ,  कोई मुझसे

यह कैसा जीवन?

 अपने लिए है,  किसी के लिए

मैंने कभी जीकर क्यों  देखा?

शायद जीकर देखा होता

सिर्फ़ अपने लिए जीकर देखा होता

तो बात ही कुछ और होती 

प्रकृति ने हँसने को कहा 

मैंने जबरन हँसी ओढ़ी 

मुझसे कहा गया कि नाचूँ-गाऊँ

मैंने सिनेमा का कोई दृश्य चला दिया

सबने कहा फ़र्ज़ निभाओ

ख़ामोशी से फ़र्ज़ निभा दिया

इन सब में मैं कहाँ?

यह यायावर मन  अपना,  किसी का

शहर के बियाबान में भटककर

आकाश में एक चिनगारी ढूँढता। 

अब भी समय है

आस है तो प्राण है

प्राण है तो जीवन है

भले कुछ भी अपना नहीं 

 सगा  सखा

पर जीवन तो है

एक बार अपने लिए जीकर देखना है


-जेन्नी शबनम (16.11.2023)
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बुधवार, 16 नवंबर 2022

754. मेरा पर्स : मेरी ज़िन्दगी

मेरा पर्स : मेरी ज़िन्दगी  

***

मेरा पर्स मानो भानुमति का पिटारा है
उसमें मेरी ज़रूरत की सभी चीज़ें हैं। 
 
अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों में
सब कुछ बेधड़क निकल आता है
मेरी दवाओं से लेकर
बिस्किट, चॉकलेट, पानी
काग़ज़, कलम, रूमाल
और जो काग़ज़ पर आज तक उतरे नहीं 
ऐसी कई ख़याल
कुछ मास्क, सैनिटाइजर, मेट्रो कार्ड
अचानक ख़रीददारी के लिए थैले
हाँ! मुझे क्रेडिट-डेबिट कार्ड का 
इस्तेमाल करना नहीं आता
तो कुछ कैश रुपये, जिससे मेरा काम चल जाए
मेरा पहचान पत्र और देह-दान कार्ड भी है
आकस्मिक दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुँच सकूँ
देह-दान का कार्ड 
जिसपर दो मोबाइल नम्बर लिखे हुए हैं
ताकि दान-प्रक्रिया की अनुमति देने में देर न हो। 

सोचती हूँ कि मेरी ज़रूरतें कितनी कम हैं
कफ़न और साँसें, जो मेरे पर्स में नहीं हैं
बाक़ी जीवन से मृत्यु तक के सफ़र का सामान है। 

पर्स तो बदलती हूँ पर सामान नहीं
इन सामानों के बिना जीना मुश्किल है
और मरना भी आसान नहीं
जाने कब ज़रूरत पड़ जाए
मेरे पर्स में मेरी ज़िन्दगी पड़ी है
और मृत्यु के बाद की मेरी इच्छा भी। 

-जेन्नी शबनम (16.11.2022)
(जन्मदिन)
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मंगलवार, 16 नवंबर 2021

735. हाँ! मैं बुरी हूँ

हाँ! मैं बुरी हूँ 

***

मैं बुरी हूँ   
कुछ लोगों के लिए बुरी हूँ   
वे कहते हैं-   
मैं सदियों से मान्य रीति-रिवाजों का 
पालन नहीं करती   
मैं अपने सोच से दुनिया समझती हूँ   
अपनी मनमर्ज़ी करती हूँ, बड़ी ज़िद्दी हूँ।
   
हाँ! मैं बुरी हूँ   
मुझे हर मानव एक समान दिखता है   
चाहे वह शूद्र हो या ब्राह्मण   
चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान   
मैं तथाकथित धर्म का पालन नहीं करती   
मुझे किसी धर्म पर न विश्वास है, न आस्था   
मुझे महज़ एक ही धर्म दिखता है- 
इन्सानी प्यार।  
 
मैं स्त्री होकर वह सब करती हूँ 
जो पुरुषों के लिए जायज़ है   
मगर स्त्रियों के लिए नाजायज़   
जाने क्यों मुझे मित्रता में स्त्री-पुरुष अलग नहीं दिखते   
किसी काम में स्त्री-पुरुष के दायित्व का 
बँटवारा उचित नहीं लगता। 
  
मैं अपने मन का करती हूँ   
घर परिवार को छोड़कर अकेले सिनेमा देखती हूँ   
अकेले कॉफ़ी पीने चाली जाती हूँ   
अपने साथ के लिए किसी से गुज़ारिश नहीं करती।  
 
भाग-दौड़ में मेरा दुपट्टा सरक जाता है   
मैं दुपट्टे को सही से ओढ़ने की तहज़ीब नहीं जानती   
दुपट्टे या आँचल में शर्म क़ैद है, यह सोचती ही नहीं। 
  
समय-चक्र के साथ मैं घूमती रही   
न चाहकर भी वह काम करती रही 
जो समाज के लिए सही है   
भले इसे मानने में हज़ारों बार मैं टूटती रही। 
  
स्त्रियाँ तो अन्तरिक्ष तक जाती हैं   
मैं घर-बच्चों को जीवन मान बैठी   
ये ही मेरे अन्तरिक्ष, मेरे ब्रह्माण्ड, मेरी दुनिया   
यही मेरा जीवन और यही हूँ मैं। 
  
जीवन में कभी कुछ किया नहीं   
सिर्फ़ अपने लिए कभी जिया नहीं   
धन उपार्जन किया नहीं   
किसी से कुछ लिया नहीं।  
 
जीवन से जो खोया-पाया लिखती हूँ   
अपनी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोती हूँ   
जो हूँ, बस यही हूँ   
यही मेरी धरोहर है और यही मेरा सरमाया है।  
 
मैं भले बुरी हूँ   
पर रिश्ते या ग़ैर, जो प्रेम दें, वही अपने लगते हैं   
मुझे कोई स्वीकार करे या इन्कार    
मैं ऐसी ही हूँ। 
  
जानती हूँ 
मेरे अपने मुझसे बदलने की उम्मीद नहीं करते   
जो चाहते हैं कि मैं ख़ुद को पूरा बदल लूँ   
वे मेरे अपने हो नहीं सकते   
जिसके लिए मैं बुरी हूँ, तों हूँ  
अपने और अपनों के लिए अच्छी हूँ, तो हूँ।  
 
मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मेरे अपने हज़ारों हैं   
उन्हीं के लिए शायद मैं इस जग में आई   
बस उन्हीं के लिए मेरी यह सालगिरह है। 

-जेन्नी शबनम (16.11.2021)
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मंगलवार, 17 नवंबर 2020

697. वसीयत

वसीयत   

*** 

ज़ीस्त के ज़ख़्मों की कहानी तुम्हें सुनाती हूँ   
मेरी उदासियों की यही है वसीयत   
तुम्हारे सिवा कौन इसको सँभाले   
मेरी यह वसीयत अब तुम्हारे हवाले   
हर लफ़्ज़ जो मैंने कहे, हर्फ़-हर्फ़ याद रखना   
इन लफ़्ज़ों को ज़िन्दा, मेरे बाद रखना   
किसी से कुछ न कभी तुम बताना   
मेरी यह वसीयत, मगर मत भूलाना   
तुम्हारी मोहब्बत ही है मेरी दौलत   
मेरे लफ़्ज़ ज़िन्दा हैं इसकी बदौलत।     

उस दौलत ने दिल को धड़कना सिखाया   
हर साँस पर था जो क़र्ज़ा चुकाया   
मेरे ज़ख़्मों की अब मुझको परवाह नहीं है   
लबों पे मेरे अब कोई आह नहीं है   
अगर्चे अभी भी कोई सुख नहीं है   
ग़म तुमने समझा, तो अब दुःख नहीं है।  

ग़ैरों की भीड़ में मुझको कई अपने मिले थे   
मगर जैसे सारे ही सपने मिले थे   
मुझसे किसी ने कहाँ प्यार किया था   
वार अपनों ने खंजर से सौ बार किया था   
मन ज़ख़्मी हुआ, ताउम्र आँखों से रक्त रिसता रहा   
किसे मैं बताती कि दोष इसमें किसका रहा   
क़िस्मत ने जो दर्द दिया, तोहफ़ा मान सब सहेजा   
मैंने क़दमों को टोका, क़िस्मत को दिया न धोखा   
जीवन में नाकामियों की हज़ारों दास्तान है   
हर पग के साथ बढ़ता छल का अम्बार है   
मेरी हर साँस में मेरी एक हार है।     

जीकर तो किसी के काम न आ सकी   
मेरे जीवन की किसी को कभी भी न दरकार थी   
मेरे शरीर का हर एक अंग मैंने दुनिया को दान किया   
पर कभी यह न सोचा, मैंने कोई अहसान किया   
मैं जब न रहूँ, कइयों के बदन को नया जीवन दिलाना   
बिजली की भट्टी में इसे तुम जलाना   
भट्टी में जब मेरा बदन राख बन जाएगा   
आधे राख को गंगा में वहाँ लेकर जाना 
वहीं पर बहाना   
जहाँ मेरे अपनों का जिस्म राख में था बदला   
आधे को मिट्टी में गाड़कर 
रात की रानी का पौधा लगाना   
मुझे रात में कोई ख़ुशबू बनाना   
जीवन बेनूर था, मरकर बहक लूँ   
वसीयत में यह एक ख़्वाहिश भी रख लूँ   
रात की रानी बन खिलूँगी और रात में बरसूँगी   
न साँस मैं माँगूँगी, न प्यार को तरसूँगी   
भोर में ओस की बूँदों से लिपटी मैं दमकूँगी   
दिन में बुझी भी, तो रात में चमकूँगी।     

क़ज़ा की बाहों में  
जब मेरी सुकून भरी मुस्कुराहट दिखे   
समझना मेरे ज़ीस्त की कुछ हसीन कहानी 
उसने मुझे सुनाई है   
शब के लिए रात की रानी खिलाई है   
जीवन में बस एक प्रेम कमाया, वह भी तुम्हारे सहारे   
इतना करो कि यह प्रेम कभी न हारे   
तुम्हें कसम है, एक वादा तुम करना   
मेरी यह वसीयत तुम ज़रूर पूरी करना   
तुम्हारे सिवा कौन इसको सँभाले   
मेरी यह वसीयत अब तुम्हारे हवाले।    

-जेन्नी शबनम (16.11.2020)
(मेरे बच्चों के लिए) 
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बुधवार, 1 जनवरी 2020

640. जो देखा जो सुना

जो देखा जो सुना   

*******   

जो देखा-सुना जो जिया-गुना   
वह लिखा वह सब लिखा   
जो मन ने कहा जो मन में पला   
वह लिखा बस वही लिखा   
कब कौन सी विधा हुई   
किस तराजू पे परखी गई   
किस नियम में सजी लेखनी   
वो त्रिभुज हुई या वृत्ताकार बनी   
समीप रही या समानांतर चली   
नहीं मालूम यह क्या हुआ   
नहीं मालूम यह क्यों हुआ   
बस हुआ और इतना हुआ   
जो समझा जो पहचाना   
वह लिखा वह सब लिखा।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2020)   
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शनिवार, 18 जुलाई 2015

496. वो कोठरी

वो कोठरी

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वो कोठरी   
मेरे नाम की
जहाँ रहती थी मैं, सिर्फ़ मैं 
मेरे अपने पूरे संसार के साथ
इस संसार को छूने की छूट
या इस्तेमाल की इजाज़त किसी को नही थी,
ताखे पर क़रीने से रखा एक टेपरिकार्डर
अनगिनत पुस्तकें और सैकड़ों कैसेट
जिस पर अंकित मेरा नाम
ट्रिन-ट्रिन अलार्म वाली घड़ी
खादी के खोल वाली रज़ाई
सफ़ेद मच्छरदानी
सिरहाने में टॉर्च
लालटेन और दियासलाई 
जाने कब कौन मेरे काम आ जाए,
लकड़ी का एक पलंग और मेज़ 
जो पापा इस्तेमाल करते थे 
अब मेरे अधिकार में था 
ताखे में ज़ीरो पावर का लाल-हरा बल्ब
जिसकी रोशनी में कैमरे का रील साफ़ कर
पापा अपना शौक़ पूरा करते थे
वह लाल-हरी बत्ती सारी रात
मेरी निगहबानी करती थी
दिवार वाली एक आलमारी
जिसमें कभी पापा की किताबें आराम करती थीं
बाद में मेरी चीज़ों को सँभालकर रखती थी,
लोहे का दो रैक
जिसने दीवारों पर टँगे-टँगे  
पापा की किताबों को हटते
और मेरे सामानों को भरते हुए देखा था
लोहे का एक बक्सा
जो मेरी माँ के विवाह की निशानी है  
मेरे अनमोल ख़ज़ाने से भरा
टेबल बन बैठा रहता था,
वह छोटी-सी कोठरी धीरे-धीरे
पापा के नाम से मेरे नाम चढ़ गई
मैं पराई हुई मगर
वह कोठरी मेरे नाम से रह गई,  
अब भी वो कोठरी मुझे सपनों मे बुलाती है
जहाँ मेरी ज़िन्दगी की निशानी है
पापा की कोठरी जो बनी थी कभी मेरी    
अब मेरे नाम की भी न रही 
वो कोठरी
    

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2015)
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

484. मन! तुम आज़ाद हो जाओगे

मन! तुम आज़ाद हो जाओगे  

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अक्स मेरा मन मुझसे उलझता है  
कहता है- 
वो सारे सच जिसे मन की तलहटी में  
जाने कब से छुपाया है मैंने  
जगज़ाहिर कर दूँ।  
चैन से सो नहीं पाता है वो
सारी चीख़ें, हर रात उसे रुलाती हैं
सारी पीड़ा भरभराकर  
हर रात उसके सीने पर गिर जाती हैं  
सारे रहस्य हर रात कुलबुलाते हैं
और बाहर आने को धक्का मारतें हैं    
इस जद्दोज़हद में गुज़रती हर रात  
यूँ लगता है 
मानो आज आख़िरी है।  
लेकिन सहर की धुन जब बजती है  
मेरा मन ख़ुद को ढाढ़स देता है
बस ज़रा-सा सब्र और कर लो
मुमकिन है एक रोज़ 
जीवन से शब बिदा हो जाएगी  
उस आख़िरी सहर में  
मन! तुम आज़ाद हो जाओगे।  

- जेन्नी शबनम (10. 2. 2015)
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सोमवार, 17 नवंबर 2014

474. कोई तो दिन होगा

कोई तो दिन होगा

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कोई तो दिन होगा 
जब गीत आज़ादी के गाऊँगी 
बीन बजाते भौंरे नाचेंगे 
मैं पराग-सी बिखर जाऊँगी  
आसमाँ में सूरज दमकेगा 
मैं चन्दा-सी सँवर जाऊँगी।  

कोई तो दिन होगा 
जब गीत ख़ुशी के गाऊँगी 
चिड़िया फुदकेगी डाल-डाल 
मैं तितली-सी उड़ जाऊँगी 
फूलों से बगिया महकेगी 
मैं शबनम-सी बिछ जाऊँगी। 

कोई तो दिन होगा 
जब गीत प्रीत के गाऊँगी 
प्रेम प्यार के पौध उपजेंगे 
मैं ज़र्रे-ज़र्रे में खिल जाऊँगी 
भोर सुहानी अगुवा होगी 
मैं आसमाँ पर चढ़ जाऊँगी। 

कोई तो दिन होगा 
जब गीत आनन्द के गाऊँगी 
यम बुलाने जब आएगा 
मैं हँसती-हँसती जाऊँगी 
कथा-कहानी जीवित रहेगी 
मैं अमर होकर मर जाऊँगी।

-जेन्नी शबनम (16.11.2014)
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बुधवार, 13 मार्च 2013

390. क्यों नहीं आते

क्यों नहीं आते

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अकसर सोचती हूँ  
इतने भारी-भारी-से 
ख़याल क्यों आते हैं
जिनको पकड़ना 
मुमकिन नहीं होता 
और अगर पकड़ भी लूँ
तो उसके बोझ से 
मेरी साँसे घुटने लगती हैं  
हल्के-फुल्के तितली-से 
ख़याल क्यों नहीं आते 
जिन्हें जब चाहे उछलकर पकड़ लूँ 
भागे तो उसके पीछे दौड़ सकूँ
और लपककर मुट्ठी में भर लूँ 
इतने हल्के कि अपनी जेब में भर लूँ 
या फिर कहीं भी छुपा कर रख सकूँ।  

- जेन्नी शबनम (13. 3. 13)
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

305. जाने कहाँ गई वो लड़की (पुस्तक - 31)

जाने कहाँ गई वो लड़की

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सफ़ेद झालर वाली फ्रॉक पहने
जिसपे लाल-लाल फूल सजे
उछलती-कूदती, जाने कहाँ गई वो लड़की। 
बकरी का पगहा थामे, खेतों के डरेर पर भागती
जाने क्या-क्या सपने बुनती, एक अलग दुनिया उसकी।  
भक्तराज को भकराज कहती
क्योंकि क-त संयुक्त में उसे 'क' दिखता है
उसके अपने तर्क, अजब जिद्दी लड़की। 
बात बनाती ख़ूब, पालथी लगाकर बैठती
क़लम दवात से लिखती रहती, निराली दुनिया उसकी। 
एक रोज़ सुना शहर चली गई, गाँव की ख़ुशबू साथ ले गई
उसके सपने उसकी दुनिया, कहीं खो गई लड़की। 
साँकल की आवाज़, किवाड़ी की चरचराहट
जानती हूँ वो नहीं, पर इंतज़ार रहता अब भी। 
शायद किसी रोज़ धमक पड़े, रस्सी कूदती-कूदती
दही-भात खाने को मचल पड़े, वो चुलबुली लड़की। 
जाने कहाँ गई, वो मानिनी मतवाली
शायद शहर के पत्थरों में चुन दी गई
उछलती-कूदती वो लड़की। 

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2011)
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शनिवार, 6 अगस्त 2011

269. उन्हीं दिनों की तरह (पुस्तक - 37)

उन्हीं दिनों की तरह

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चौंककर उसने कहा-
''जाओ लौट जाओ 
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ़ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्! निरुत्तर!
फिर भी कह उठी-
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम
जीवन की दशा और दिशा को, तुमने ही तो बदला था
सब जानते तो थे तुम, तब भी और अब भी
सच है, तुम भी बदल गए हो
वो न रहे, जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं
एक भूलभुलैया या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही
आस है, शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक, सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र, ज़िन्दगी के नये रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी
सब कुछ बदल गया है, वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ
फ़र्क़ सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो, फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी, तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो-
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो-
''शब, तुम वही हो, मैं भी वही
फिर आना, कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से, उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2011)
(20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर)
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

265. मैं भी इंसान हूँ (पुस्तक - 30)

मैं भी इंसान हूँ

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मैं, एक शब्द नही, एहसास हूँ, अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की, मैं भी जीवित इंसान हूँ। 
दर्द में आँसू निकलते हैं, काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है, दग़ा मिले तो दिल तड़पता है। 
कुछ बंधन बन गए, कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में, मैं अब भी जी रही। 
कई चेहरे ओढ़ लिए, कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले, मैं आज भी जी रही। 
मेरे सपने, आज भी मचलते हैं
मेरे जज़्बात, मुझसे अब रिहाई माँगते हैं। 
कब, कहाँ, कैसे-से कुछ प्रश्न
यूँ ही पनपते हैं, और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं। 
हाँ, मैं सिर्फ़ एक शब्द नहीं
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ।   

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2009)
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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

180. अपने पाँव / apne paanv

अपने पाँव

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क्या बस इतना ही
और सब ख़त्म!
एक क़दम भी नहीं
और सफ़र का अंत!

उम्मीद नहीं अब चल पाऊँगी
पहुँच पाऊँगी दुनिया के उस
अंतिम छोर तक
जिसे निहारती रही अनवरत वर्षों
सोचती थी
कभी तो फ़ुर्सत मिलेगी
और जा पहुँचूँगी अपने पाँव से
वहाँ उस छोर पर
जहाँ सीमा समाप्त होती है
दुनिया की

अब नहीं जा सकूँगी कभी
बस निहारती रहूँगी
धुँधली नज़रों से
जहाँ तक भी जाए निगाह
चाहे समतल ज़मीन हो
या फिर स्वप्निल आकाश

क़दम तो न बढ़ेंगे
पर नज़र थम-थमकर
साफ़ हो जायेगी,
फिर शायद निहारूँ
उस जहाँ को
जहाँ कभी नहीं पहुँच सकूँगी
न चल सकूँगी कभी
अपने पाँव

- जेन्नी शबनम (8. 10. 2010)
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apne paanv

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kya bas itna hi
aur sab khatm!
ek kadam bhi nahin
aur safar ka ant!

ummid nahin ab chal paaungi
pahunch paaungi duniya ke us
antim chhor tak
jise niharati rahi anavarat varshon
sochti thee
kabhi to fursat milegi
aur ja pahunchungi apne paanv se
vahaan us chhor par
jahaan seema samaapt hotee hai
duniya kee.

ab nahin ja sakungi kabhi
bas nihaarti rahungi
dhundhli nazron se
jahaan tak bhi jaaye nigaah
chaahe samtal zameen ho
ya phir swapnil aakaash.

kadam to na badhenge
par nazar tham-tham kar
saaf ho jaayegi
fir shaayad nihaaroon
us jahaan ko
jahan kabhi nahi pahunch sakungi
na chal sakungi kabhi
apne paanv.

- Jenny Shabnam (8. 10. 2010)
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रविवार, 22 अगस्त 2010

166. इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं / ikanni duanni aur main chalan mein nahin (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 43)

इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं

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वो गुल्लक फोड़ दी
जिसमें एक पैसे दो पैसे, मैं भरती थी,
तीन पैसे और पाँच पैसे भी थे, थोड़े उसमें
दस पैसे भी कुछ, बचाकर रखी थी उसमें,
सोचती थी, ख़ूब सारे सपने ख़रीदूँगी इससे
इत्ते ढेर सारे पैसों में तो, ढेरों सपने मिल जाएँगे 

बचपन की ये अनमोल पूँजी
क्या यादों से भी चली जाएगी?
अपनी उसी चुनरी में बाँध दी
जिसे ओढ़ पराये देश आई थी,
अपने इस कुबेर के ख़जाने को टीन की पेटी 
जो मेरी माँ से मिली थी, उसमें छुपा लाई थी,
साथ में उन यादगार लम्हों को भी
जब एक-एक पैसे, गुल्लक में डालती थी,
सोचती थी, ख़ूब सारा सपना खरीदूँगी
जब इस घर से उस घर चली जाऊँगी।

अब क्या करूँ इन पैसों का?
मिटटी के गुल्लक के टूटे टुकड़ों का?
पैसों का अम्बार और गुल्लक के छोटे-छोटे लाल टुकड़े
बार-बार अँचरा के गाँठ खोल निहारती हूँ,
इकन्नी-दुअन्नी में भी कहीं सपने बिकते हैं
जब चाह पालती हूँ, ख़ुद से हर बार पूछती हूँ,
नहीं ख़रीद पाई मैं, आज तक एक भी सपना
बचपन का जोगा पैसा
अब चलन में जो नहीं रहा।

चलन में तो, मैं भी न रही अब
पैसों के साथ ख़ुद को, बाँध ही दूँ अब
चलन से मैं भी उठ गई, और ये पैसे भी मेरे
अच्छा है, एक साथ दोनों चलन में न रहे
गुल्लक और पैसे, मेरे सपनों की यादें हैं
एक ही चुनरी में बँधे, सब साथ जीते हैं
उस टीन की पेटी में, हिफ़ाज़त से सब बंद है
मेरे पैसे, मेरे सपने, गुल्लक के टुकड़े और मैं।
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पेटी - बक्सा
जोगा - इकत्रित / संजोया
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- जेन्नी शबनम (20. 08. 2010)
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ikanni-duanni aur main chalan mein nahin

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vo gullak phod di
jismein ek paise do paise, main bhartee thee
teen paise aur paanch paise bhi they, thode usmen
dus paise bhi kuchh, bachaakar rakhi thi usmen,
sochti thi, khoob saare sapne kharidungi isase
itte dher saare paison men to, dheron sapne mil jayenge.

bachpan ki ye anmol punji
kya yaadon se bhi chali jaayegi?
apni usi chunri men baandh di
jise odh paraaye desh aai thi,
apne is kuber ke khajane ko teen kee peti 
jo meri maa se mili thee, usmein chhupa laayee thee,
saath mein un yaadgaar lamhon ko bhi
jab ek-ek paise, gullak mein daalti thee,
sonchti thee, khoob saara sapna kharidungi
jab is ghar se us ghar chali jaaungi.

ab kya karun is paiso ka?
mitti ke gullak ke toote tukdon ka?
paison ka ambaar aur gullak ke chhote chhote laal tukade
baar baar anchraa ke gaanth khol niharati hun,
ikanni-duanni mein bhi kahin sapne bikate hain
jab chaah paalti hun, khud se har baar puchhti hun,
nahin kharid paai main, aaj tak ek bhi sapnaa
bachpan ka joga paisa
ab chalan men jo nahin raha.

chalan mein to, main bhi na rahi ab,
paison ke sath khud ko, baandh hi dun ab
chalan se main bhi uth gaee, aur ye paise bhi mere
achchha hai, ek sath donon chalan mein na rahe
gullak aur paise, mere sapnon ki yaadein hain
ek hin chunri men bandhe, sab saath jite hain
us teen kee peti mein, hifaazat se sab band hai
mere paise, mere sapne, gullak ke tukde aur main.

- Jenny Shabnam (20. 8. 2010)
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रविवार, 18 जुलाई 2010

156. न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल / na beetenge dard ke antaheen pal (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 32)

न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल

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स्मृति की गहरी खाई में, फिर उतर आई हूँ 
न चाहूँ फिर भी, वक़्त बेवक़्त पहुँच जाती हूँ 
कोई गहरी टीस, सीने में उभरती है 
कोई रिसता घाव, रह-रहकर याद दिलाता है

मानस पटल पर अंकित, कोई अभिशापित दृष्य
अतीत के विचलित, वक़्त का हर परिदृष्य
दर्द की अकथ्य दास्तान, जो रहती अदृष्य

दुःस्वप्नों की तमाम परछाइयाँ, पीछा करती हैं 
कैसे हर रिश्ता अचानक, पराया बन बैठा 
सभी की निगाहों में, तरस और दया का बोध 
बिचारी का वो संबोधन, जो अब भी बेध जाता है मन

आज ख़ुद से फिर पूछ बैठी - 
किसे कहते हैं बचपन? क्या किसी के न होने से सब ख़त्म? 
एक और सवाल ख़ुद से - 
क्या सच में कुँवारी बाला मदमस्त चहकती है? 
मैं चहकना क्यों भूली? 
बार-बार पूछती - 
क्यों हमारे ही साथ? कौन बचाएगा गिद्ध दृष्टि से? 
कई सवाल अब भी - 
क्यों उम्र और रिशतों के मायने बदल जाते हैं? 
क्यों मझधार में छोड़ सब पार चले जाते हैं? 

न रुका न माना न परवाह, चाहे संसार हो या वक़्त 
मैं भी नहीं रुकी, हर झंझावत पार कर गई
पर वो टीस और बिचारी के शब्द 
फ़फोले की तरह अक्सर सीने में उभर आते हैं
यूँ बीत तो गए, खौफ़ के वर्ष, पर 
उफ़! न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल!

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2010)
(पिता की पुण्यतिथि)
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na beetenge dard ke antaheen pal

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smriti ki gahri khaai mein, fir utar aai hun
na chaahun fir bhi, waqt bewaqt pahunch jaati hun
koi gahri tees, sine mein ubharti hai
koi rista ghaav, rah-rahkar yaad dilaata hai.

maanas patal par ankit, koi abhishaapit drishya
ateet ke vichalit, vaqt ka har paridrishya,
dard ki akathya daastan, jo rahti adrishya. 

duhswapnon ki tamaam parchhaaiyan, pichha karti hain
kaise har rishta achaanak, paraaya ban baitha
sabhi ki nigaahon mein, taras aur daya ka bodh
bichaari ka wo sambodhan, jo ab bhi bedh jata hai mann. 

aaj khud se fir puchh baithi -
kise kahte hain bachpan? kya kisi ke na hone se sab khatm?
ek aur sawaal khud se -
kya sach mein kunwaari baala madmast chahakti hai?
main chahakna kyon bhooli?
baar baar puchhti -
kyon humaare hi saath? koun bachaayega giddh drishti se?
kayee sawaal ab bhi -
kyon umra aur rishton ke maayane badal jaate hain?
kyon majhdhaar mein chhod sab paar chale jaate hain?

na ruka na maana na parawaah, chaahe sansaar ho ya waqt
main bhi nahin ruki, har jhanjhaawat paar kar gai
par wo tees aur bichaari ke shabd
fafole ki tarah aksar sine mein ubhar aate hain
yun beet to gaye, khouf ke varsh, par
uf! na beetenge dard ke antaheen pal!

- jenny shabnam (18. 7. 2010)
(pita kee punyatithi)
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रविवार, 20 जून 2010

149. बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है / baba aao dekho! tumhaari bitiya rotee hai (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 33)

बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है 

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मन में अब भी कहीं, एक नन्ही-सी बच्ची पलती है
जाने क्या-क्या सपने बुनती, दूर आसमान को ताकती है
शायद वहाँ से कोई परी, उसके बाबा को ले आएगी
गोद बाबा के बैठ, वो अपने सारे दुखड़े रोएगी

क्यों चले गए, तुम छोड़ के बाबा
देखो बाप बिन बेटी, कैसे जीती है
बूँद आँसू न बहे, तुमने इतने जतन से पाले थे
देखो आज अपनी बिटिया को, अपने आँसू पीती है

जाना ही था, तो साथ अपने, मुझे और अम्मा को भी ले जाते
मेरे आधे आँसू, अम्मा की आँखों से भी बहते हैं
मेरी उथली हँसी और पनीली आँखें, बिन कहे अम्मा पहचानती है
वे अपने सारे ग़म भूल, मेरे दुःख से रोती है

जाने को तुम चले गए, क़िस्मत हमारी भी ले गए
हम कैसे जिएँ बताओ बाबा, अपना दर्द किसे सुनाएँ बाबा
जानती हूँ, आसमान से न कोई परी आएगी, न तुम आओगे
फिर भी, मन में अब भी एक नन्ही बच्ची पलती है

तुम सितारा बन आसमान में चले गए, बचपन में दादी कहती थी
आँसुओं से तर उसकी आँखें, रोज़ मुझे और भैया को नयी कहानी सुनाती थी
बाबा आओ देखो! तुम्हारे सारे अपने रोते हैं
एक-दूसरे के सामने अपने आँसू छुपाते हैं

सपने में तुम आते हो, जैसे कभी कहीं तुम गए नहीं
सपने में ही कह दो आकर, कब तक यूँ आँसू और बहेंगे
बाबा! इतना तो कह कर जाते, कभी नहीं तुम आओगे
चाहे जितना भी रोएँ हम, वापस नहीं तुम आओगे

बच्ची नहीं औरत हूँ अब, किसी का घर भी बसाना है
कोख जायों को अपने, उनकी मंज़िल तक पहुँचाना है
ज़हर घूँट का पीकर भी, सबकी ख़ातिर जीना है
तुमसे शिकवा कर, पल-पल अपने आँसू पोंछना है

बाबा! जब भी आँसू बहते हैं, मन छोटी बच्ची बन जाता है
जानती हूँ, तुम आसमान में नहीं रहते, न कोई परी रहती है
दूर आसमान से तुम देख रहे, मन को झूठी तसल्ली होती है
बाबा आओ देखो! तुम्हारी प्यारी बिटिया रोती है

(सितम्बर 27, 2008)
(पितृ दिवस)
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baba aao dekho! tumhaari bitiya rotee hai

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mann mein ab bhi kahin, ek nanhi-see bachchee paltee hai
jaane kya-kya sapne buntee, door aasmaan ko taaktee hai
shaayad wahaan se koi paree, uske baba ko le aayegi
goad baba ke baith, wo apne saare dukhde royegi.

kyon chale gaye, tum chhod ke baba
dekho baap bin betee, kaise jeetee hai
boond aansoo na bahe, tumne itne jatan se paale they
dekho aaj apni bitiya ko, apne aansoo pitee hai.

jana hi tha, to saath apne, mujhe aur amma ko bhi le jaate
mere aadhe aansoo, amma kee aankho se bhi bahte hain
meri uthli hansi aur paneelee aankhe, bin kahe amma pahchaantee hai
wo apne saare gham bhool, mere dukh se rotee hai.

jane ko tum chale gaye, qismat humari bhi le gaye
hum kaise jiyen batao baba, apna dard kise sunaayen baba,
janti hoon, aasman se, na koi paree aayegi, na tum aaoge
phir bhi, mann mein ab bhi, ek nanhi bachchi paltee hai.

tum sitaara ban aasman mein chale gaye, bachpan mein daadi kahtee thi
aasuon se tar uski aankhen, roz mujhe aur bhaiya ko, nayee kahaani sunaati thi
baba aao dekho! tumhaare saare apne rote hain
ek dusre ke saamne, apne aansoo chhupaate hain.

sapno mein tum aate ho, jaise kabhi kahin tum gaye nahi
sapno mein hi kah do aakar, kab tak yun aansoo aur bahenge
baba! itna to kah kar jate, kabhi nahi tum aaoge
chaahe jitna bhi royen hum, waapas nahi tum aaoge.

bachchi nahi aurat hun ab, kisi ka ghar bhi basaana hai
kokh jaayon ko apne, unki manzil tak pahuchaana hai
zehar ghunt ka pikar bhi, sabki khaatir jina hai,
tumse shikwa kar, pal-pal apne aansoo pochhna hai.

baba! jab bhi aansoo bahte hain, mann chhoti bachchee ban jaata hai
jaanti hun, tum aasman mein nahi rahte, na koi paree rahti hai
door aasman se tum dekh rahe, mann ko jhoothi tasalli hoti hai
baba aao dekho! tumhaari pyaari bitiya rotee hai.

- Jenny Shabnam (September 27,  2008)
(father's day)
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रविवार, 9 मई 2010

141. माँ की अन्तःपीड़ा / maa kee antah peeda (पुस्तक - लम्हों का सफ़र - 51)

(यह रचना मैं तब लिखी थी जब मेरे पिता की मृत्यु के 20 साल पूरे हुए थे और उस समय मेरी उम्र उतनी ही थी जितनी पिता की मृत्यु के समय मेरी माँ की थी)

माँ की अन्तःपीड़ा

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वक़्त के थपेड़ों में, सब कुछ अचानक, ध्वस्त हुआ
न सँभलने का वक़्त मिला, न वक़्त को दर्द हुआ,

ये क्यों हुआ, ख़ुशियाँ लुट गईं, मातम पसर गया
पिता का सँजोया, हर सपना, टूटकर बिखर गया,

बेरहम वक़्त ने, पिता से हमारा नाता, छीन लिया
हम देख सके न पार्थिव शरीर, अग्नि ने जला दिया,

जीवन से पलायन की, माँ ने भी कर ली थी तैयारी
देख बच्चों की मूक व्यथा, वह ख़ुद को थी सँभाली,

बिना ज़वाब माँ थी, मौन सवालों से, हम रोज़ घिरते
कैसे क्या होगा, ये सवाल, हम भी तो किससे पूछते,

कठिन डगर बहुत मगर, माँ थी अदम्य साहस वाली
किया पिता का सपना पूरा, कभी न वो हिम्मत हारी,

कठिनाइयाँ ख़त्म हुईं, पर अब भी, रह-रह दिल है रोता
अब भी सोच मन घबराता, जो दिन था हमने गुज़ारा,

विस्मृत कर अपने सुख, सतत करती पूर्ण, माँ कर्त्तव्य
जिस उम्र के हम हैं अब, हुआ उसी उम्र में, माँ का वैधव्य,

बड़े हुए हम, अब भी नहीं मान सके, छूट गया बचपना
कैसी अन्तःपीड़ा से, गुज़री होगी, उस उम्र में, मेरी माँ!

- जेन्नी शबनम (18. 7. 1998)
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(yeh rachna main tab likhi thee jab mere pita kee mrityu ke 20 saal pure hue they aur us samay meri umrra utni hee thee jitni pita ki mrityu ke samay meri maa ki thee.)

maa kee antah peeda

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waqt ke thapedon mein, sab kuchh achaanak, dhvast hua
na sambhalne ka waqt mila, na waqt ko dard hua,

ye kyon hua, khushiyan lut gayeen, maatam pasar gaya
pita ka sanjoya, har sapna, tootkar bikhar gaya,

beraham waqt ne, pita se hamaara naata, chheen liya
hum dekh sake na paarthiv sharir, agni ne jala diya,

jivan se palaayan ki, maa ne bhi kar li thi taiyaari
dekh bachchon ki mook vyatha, wah kud ko thi sambhaali,

bina jawaab maa thi, maun sawaalon se, hum roz ghirte
kaise kya hoga, ye sawaal, hum bhi to kisase puchhte,

kathin dagar bahut magar, maa thi adamya saahas wali
kiya pita ka sapana pura, kabhi na wo himmat haari,

kathinaaiyaan khatm huin, par ab bhi, rah-rah dil hai rota
ab bhi soch man ghabraata, jo din thaa hamne guzaara,

vismrit kar apne sukh, satat karati purn, maa kartavya
jis umrra ke hum hain ab, hua usi umrra men, maa ka vaidhavya,

bade huye hum, ab bhi nahin maan sake, chhoot gaya bachpanaa
kaisi antah peeda se, guzri hogi, us umra mein, meri maa!

- Jenny Shabnam (18. 7. 1998)
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