मंगलवार, 18 सितंबर 2012

371. फ़र्ज़ की किश्त...

फ़र्ज़ की किश्त...

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लाल पीले गुलाबी 
सपने बोना चाहती थी
जिन्हें तुम्हारे साथ 
उन पलों में तोडूँगी 
जब सारे सपने खिल जाएँ 
और ज़िन्दगी से हारे हुए हम 
इसके बेहद ज़रूरतमंद हों !
पल-पल ज़िन्दगी बाँटना चाहती थी
सिर्फ तुम्हारे साथ
जिन्हें तब जियूँगी   
जब सारे फ़र्ज़ पूरे कर 
हम थक चुके हों
और हम दूसरों के लिए 
बेकाम हो चुके हों !

हर तजुर्बे बतलाना चाहती थी
ताकि समझ सकूँ दुनिया को 
तुम्हारी नज़रों से 
जब मुश्किल घड़ी में 
कोई राह न सूझे 
हार से पहले एक कोशिश कर सकूँ
जिससे जीत न पाने का मलाल न हो !

जानती हूँ 
चाहने से कुछ नहीं होता 
तकदीर में विफलता हो तो 
न सपने पलते हैं 
न ज़िन्दगी सँवरती है 
न ही तजुर्बे काम आते हैं !

निढ़ाल होती मेरी ज़िन्दगी    
फ़र्ज़ अदा करने के क़र्ज़ में 
डूबती जा रही है
और अपनी सारी चाहतों से 
फ़र्ज़ की किश्त 
मैं तन्हा चुका रही हूँ !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 18, 2012)

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20 टिप्‍पणियां:

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

काफी हद तक सही हैं आप...मगर तकदीर बदलते देर कहाँ लगती हैं...
संजोये रखना चाहिए सपनों को....जाने कब डूबती ज़िन्दगी किनारे लग जाए.....नाव खेते रहें बस..

सादर
अनु

PRAN SHARMA ने कहा…

LAJAWAAB KAVITA KE LIYE AAPKO BADHAAEE.

Vinay ने कहा…

हृदयस्पर्शी उत्कृष्ट

--- शायद आपको पसंद आये ---
1. अपने ब्लॉग पर फोटो स्लाइडर लगायें

सहज साहित्य ने कहा…

'फ़र्ज़ की किश्त' कविता मन को पूरी तरह भिगो गई । हर पंक्ति में सरसता , जीवन का गहरा अनुभव , वह भी अवसाद से परिपूर्ण । इतना सुन्दर और सार्थक लिखने के लिए बहुत बधाई जेन्नी जी । ये पंक्तियाँ तो बहुत ही मार्मिक हैं
-निढ़ाल होती मेरी ज़िंदगी
फ़र्ज़ अदा करने के क़र्ज़ में
डूबती जा रही है
और अपनी सारी चाहतों से
फ़र्ज़ की किश्त
मैं तन्हा चुका रही हूँ !

Maheshwari kaneri ने कहा…

वाह बहुत भावपूर्ण रचना..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

निढ़ाल होती मेरी ज़िंदगी
फ़र्ज़ अदा करने के क़र्ज़ में
डूबती जा रही है
और अपनी सारी चाहतों से
फ़र्ज़ की किश्त
मैं तन्हा चुका रही हूँ,,,,

अहसासों की लाजबाब प्रस्तुति......
RECENT P0ST फिर मिलने का

virendra sharma ने कहा…

रचना बहुत आवेग लिए है सुन्दर है लेकिन भाग्यवादी दर्शन और अवसाद से संसिक्त भी है .कर्तव्य तो भावना से भी बड़ा होता है .फर्ज़ अंजाम दिया फिर मलाल कैसा ,कर्ज़ कैसा ....

जानती हूँ
चाहने से कुछ नहीं होता
तकदीर में विफलता हो तो
न सपने पलते हैं
न ज़िंदगी सँवरती है
न ही तजुर्बे काम आते हैं !

निढ़ाल होती मेरी ज़िंदगी
फ़र्ज़ अदा करने के क़र्ज़ में
डूबती जा रही है
और अपनी सारी चाहतों से
फ़र्ज़ की किश्त
मैं तन्हा चुका रही हूँ !

vikram7 ने कहा…

Ati sundar

vikram7 ने कहा…

Ati sundar

Arshia Ali ने कहा…

बहुत ही सुंदर भाव।
बधाई।

............
हिन्‍दी की सबसे दुर्भाग्‍यशाली पुस्‍तक!

रविकर ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति आज बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

Shah Nawaz ने कहा…

काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया इस रचना ने... बहुत ही भावपूर्ण रचना!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जानती हूँ
चाहने से कुछ नहीं होता
तकदीर में विफलता हो तो
न सपने पलते हैं
न ज़िंदगी सँवरती है
न ही तजुर्बे काम आते हैं !...सच है

सदा ने कहा…

अंतिम पंक्तियां मन को छूती हुई ... उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

Unknown ने कहा…

सपनों को उगायेंगे हम क्यूँ ज़िन्दगी से हारें
हर फ़र्ज़ निभाएंगे पल पल ज़िन्दगी को वारें

ये मुश्किल घडी हों फिर भी हम हौसला रखेंगे
तन्हा कहाँ तनहाइयाँ लिखा तकदीर बदल देंगे

आपको पढ़ना सदा अच्छा लगता लेकिन आप पर लिखना बड़ा कठिन लगता है इसीलिए विचार करना पड़ता है . आप जीवन के बहुत करीब लिखती हैं .

Anupama Tripathi ने कहा…

I slept and dreamt that life was beauty ..
I woke and found that life was duty ...
aise hii jeevan beet jata hai ..
bahut sundar likha hai ..!!

Pallavi saxena ने कहा…

जानती हूँ चाहने से कुछ नहीं होता तकदीर में विफलता हो तो न सपने पलते हैं न ज़िंदगी सँवरती है न ही तजुर्बे काम आते हैं !
निढ़ाल होती मेरी ज़िंदगी फ़र्ज़ अदा करने के क़र्ज़ में डूबती जा रही है और अपनी सारी चाहतों से फ़र्ज़ की किश्त मैं तन्हा चुका रही हूँ !
शायद जीना इसी का नाम है बहुत ही सुंदर सार्थक एवं गहन भाव अभिव्यक्ति .....

virendra sharma ने कहा…


लाल पीले गुलाबी
सपने बोना चाहती थी
जिन्हें तुम्हारे साथ
उन पलों में तोडूँगी
जब सारे सपने खिल जाएँ
और जिन्दगी से हारे हुए हम
इसके बेहद ज़रूरतमंद हों !

जो सोचता है ,सोचता रह जाता है ,अवसाद में चला जाता है ,यहाँ तो बहुत एक्शन है ,सोच के लिए अवकाश कैसा .भाग्यवादी दर्शन कैसा ,फर्ज़ तो सुख से भरता है ,भावना से बड़ा होता है कर्तव्य फिर ये अवसाद क्यों इस रचना का प्रति पाद्य क्यों ?
ram ram bhai
मंगलवार, 18 सितम्बर 2012
कमर के बीच वाले भाग और पसली की हड्डियों (पर्शुका )की तकलीफें :काइरोप्रेक्टिक समाधान

mridula pradhan ने कहा…

wah....bahot khoobsurat....

Madhuresh ने कहा…

यही आलम सबका है... एक और सुन्दर अभिव्यक्ति पढने को मिली..
सादर
मधुरेश