बुधवार, 9 सितंबर 2026

811. जीवन जाल (10 सेदोका)

जीवन जाल 

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1. 
जीवन जाल 
जो सुलझे न कभी  
ऐसा यह जंजाल 
मिलता नहीं 
कोई ओर या छोर 
न रास्ता किसी ओर।

2.
तमाम उम्र 
अभिनय में बीता
सच कोई न जाना, 
मुख पे हँसी 
मन में व्याप्त पीड़ा  
कौन समझ पाया?

3. 
जीवन स्वाँग
पल-पल गँवाया  
जीवन हुआ व्यर्थ 
जी नहीं सकी  
अंत समय आया 
मन है पछताया।  

4.
वक़्त देखता  
टकटकी लगाए 
अपना हर खेल, 
उसे है पता 
किसी का न चलता 
उसपे कोई ज़ोर।    

5. 
चौसठ कला 
लगे चौसठ दिन  
गुरु संदीपनी ने 
सिखाई कला 
कृष्ण और सुदामा 
बलराम भी साथ।  
  
6.
मेरी सहेली  
नहीं है तू अकेली 
साथ है छाया तेरी  
साहस रख  
मत छोड़ना आस 
रखना तू विश्वास।  

7. 
सुन्दर जग 
बेजोड़ शिल्पकारी 
किसने कब की थी? 
धरा-गगन 
नदिया व पहाड़ 
अजब कलाकारी। 

8.
वक़्त प्रहरी 
चौकीदारी करता 
रात हो या दिन हो, 
पर झेलता 
सबका रंजो-ग़म 
मगर न थकता। 

9.
भेष बदले  
वक़्त बहुरूपिया  
सबको भय दिखा 
ठठाके हँसे 
ये नहीं नादानी  
उसकी मनमानी। 

10. 
सब्र के फल 
दुःख के पकवान 
मैंने जीभर खाए 
अंततः हारी  
जीवन बना ख़ार  
मन है तार-तार। 

-जेन्नी शबनम (8.9.2026)
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