गुरुवार, 17 सितंबर 2026

812. हमारी आत्मा (चोका - 21)

हमारी आत्मा   

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हमारी आत्मा   
करती जल्दबाज़ी  
ज्यों हो अतिथि 
वापसी को बेकल
रोके न रुके 
चाहे सिर नवाएँ,
किया स्वागत 
किया ख़ूब सत्कार 
जीभर प्यार 
ताकि वापसी भूले 
रुकी ही रहे  
सदा मुझमें बसे,
ज़िद्दी ये आत्मा    
मुझसे है कहती-
''मैं हूँ अतिथि 
रोको नहीं मुझको 
मैं हूँ प्रवासी 
दूजे जग की वासी 
अल्प विराम  
शरीर में विश्राम 
मन जो भरा 
फिर काया से मुक्ति
है मेरा काम'', 
आत्मा कहाँ से आई
कहाँ था वास?
वक़्त पूरा करके 
छोड़ती जिस्म 
सब हो जाता ख़त्म,
आत्मा अतिथि 
जिसे लौटना ही है 
तय वक़्त पे 
परमात्मा के पास 
आत्मा अमर 
मरता है बदन,
बुलबुला-सा  
क्षणभंगुर प्राण 
मोह अपार 
जीवन का दस्तूर 
जन्म व मृत्यु 
होना है बारम्बार, 
कभी न रुके 
जीवन-मृत्यु-चक्र  
हँसो या रोओ 
कितना भी हो प्रीत 
प्रकृति की ये रीत। 

-जेन्नी शबनम (14.9.2026)
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