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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

780. कुछ ताँका (28 ताँका)

बच्चे 

1.
बच्चों के बिना 
फीका है पकवान 
सूना घर-संसार,
लौटते ही बच्चों के 
होता पर्व-त्योहार।
  
2. 
तोतली बोली
माँ-बाबा को पुकारे
वो नौनिहाल,
बोली सुन-सुनके 
माँ-बाबा हैं निहाल।   

3. 
नींद से जाग 
मचाते हर भोर
बहुत शोर,
तूफ़ान साथ जाए
जाते जब वे स्कूल। 

4. 
गुंजित घर  
बच्चे की किलकारी
माँ जाती वारी
नित सुबह-शाम
बिना लिए विराम। 

5. 
सुबह-शाम
होता बड़ा उधम,
ढेरों हैं बच्चे
संयुक्त परिवार
रौशन घर-बार। 

6. 
बच्चों की अम्मा
व्यस्त रहती सदा
काम का टीला 
धीरे-धीरे ढाहती 
ज़रा भी न थकती।  

7. 
जीव या जन्तु 
सबकी माँ करती 
बच्चों की चिन्ता,  
प्रकृति की रचना  
स्त्री अद्भुत स्वरूपा।  
-0-

बेटियाँ

1. 
नन्ही-सी परी
खेले आँख-मिचौली,
माँ-बाबा हँसे
देखे थे जो सपने
हुए वे सब पूरे। 

2. 
छोटी-सी कली
अम्मा छोड़ जो चली
हो गई बड़ी,
अब बिटिया नन्हीं
सबकी अम्मा बनी। 

3. 
नाज़ुक प्यारी
माँ-बाबा की दुलारी
होती है बेटी,
जाए पिया के घर
कर सूना आँगन। 

4. 
आँखों का तारा
होती सब बिटिया,
माँ-बाबा रोए 
विदा हुई बिटिया  
जाए पी के अँगना। 

5. 
घर का दर्जा 
देती सब बेटियाँ
दरो-दीवार,
जाएँ कहीं, सृजन 
करती हैं बेटियाँ। 

6. 
बेटी की अम्मा
रहती घबराई
बेटी जो जन्मी,
किस घर वो जाए
हर सुख वो पाए। 

7. 
रौशन घर
करती हैं बेटियाँ
जहाँ भी जाए,
मायका होता सूना
चहके वर-अँगना। 
-0-

ईश्वर

1. 
हूँ पुजारिन
नाथ सिर्फ़ तुम्हारी
तू बिसराया
सुध न ली हमारी
क्यों समझा पराया?

2. 
ओ रे विधाता!
तू क्यों न समझता
जग की पीर,
आस जब से टूटा
सब हुए अधीर। 

3. 
गर तू थामे
जो मेरी पतवार
देखे संसार,
भव सागर पार
पहुँचूँ तेरे पास। 

4. 
हे मेरे नाथ!
कुछ करो निदान
हो जाऊँ पार
जीवन है सागर
कोई न खेवनहार।  

5. 
तू साथ नहीं
डगर अँधियारा
अब मैं हारी,
तू है पालनहारा
फैला दे उजियारा। 

6. 
मैं हूँ अकेली
साथ देना ईश्वर
दुर्गम पथ
चल-चलके हारी
अन्तहीन सफ़र। 

7. 
भाग्य-विधाता
तू जग का निर्माता 
पालनहारा,
सुन ले, हे ईश्वर!
तेरे भक्तों की व्यथा। 
-0-

कृष्ण

1. 
रोई है आत्मा
तू ही है परमात्मा
कर विचार,
तेरी जोगन हारी
मेरे कृष्ण मुरारी। 

2. 
चीर-हरण
हर स्त्री की कहानी
बनी द्रौपदी,
कृष्ण! लो अवतार
करो स्त्री का उद्धार। 

3. 
माखन चोरी
करते सीनाजोरी
कृष्ण कन्हाई,
डाँटे यशोदा मैया
फिर करे बड़ाई। 

4. 
कर्म-ही-कर्म
बस यही है धर्म
तेरा सन्देश,
फ़ैल रहा अधर्म
आके दो उपदेश। 

5. 
तू हरजाई
की मुझसे ढिठाई,
ओ मोरे कान्हा!
गोपियों संग रास
मुझे माना पराई। 

6. 
रास रचाया
सबको भरमाया
नन्हा मोहन,
देके गीता का ज्ञान
किया जग-कल्याण। 

7. 
तेरी जोगन
तुझमें ही समाई,
बड़ी बावरी
सहके सब पीर
बनी मीरा दीवानी।

-जेन्नी शबनम (27.9.2024)
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शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

557. सूरज की पार्टी (11 बाल हाइकु) पुस्तक 93,94

सूरज की पार्टी  

*******

1.  
आम है आया  
सूरज की पार्टी में  
जश्न मनाया   

2.  
फलों का राजा  
शान से मुस्कुराता  
रंग बिरंगा   

3.  
चुभती गर्मी  
तरबूज़ का रस  
हरता गर्मी   

4.  
खीरा-ककड़ी  
लत्तर पे लटके  
गर्मी के दोस्त   

5.  
आम व लीची  
कौन हैं ज़्यादा मीठे  
करते रार   

6.  
मुस्कुराता है  
कँटीला अनानास  
बहुत ख़ास   

7.  
पानी से भरा  
कठोर नारियल  
बुझाता प्यास   

8.  
पेड़ से गिरा  
जामुन तरोताज़ा  
गर्मी का दोस्त   

9.  
मानो हो गेंद  
पीला-सा ख़रबूजा   
लुढ़का जाता   

10.  
धम्म से कूदा
अँखियाँ मटकाता  
आम का जोड़ा   

11.  
आम की टोली  
झुरमुट में छुपी  
गप्पें हाँकती

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2017)  
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सोमवार, 30 सितंबर 2013

420. क्या बिगड़ जाएगा

क्या बिगड़ जाएगा

***

गहराती शाम के साथ  
मन में धुक-धुकी समा जाती है 
सब ठीक तो होगा न 
कोई मुसीबत तो न आई होगी 
कहीं कुछ ग़लत-सलत न हो जाए 
इतनी देर, कोई अनहोनी तो नहीं हो गई 
बार-बार कलाई की घड़ी पर नज़र 
फिर दीवार घड़ी पर 
घड़ी ने वक़्त ठीक तो बताया है न  
या घड़ी ख़राब तो नहीं हो गई। 
 
हे प्रभु!
रक्षा करना, किसी संकट में न डालना 
कभी कोई ग़लती हुई हो तो क्षमा करना 
वक़्त पर लौट आने से क्या चला जाता है?
कोई सुनता क्यों नहीं? 
दिन में जितनी मनमर्ज़ी कर लो 
शाम के बाद सीधे घर 
आख़िर यह घर है, कोई होटल नहीं। 

कभी घड़ी पर निगाहें 
कभी मुख्य द्वार पर नज़र 
फिर बालकनी पर चहलक़दमी 
सिर्फ़ मुझे ही फ़िक्र क्यों?
सब तो अपने में मगन हैं 
कमबख़्त टी. वी. देखना भी नहीं सुहाता है 
जब तक सब सकुशल वापस न आ जाए। 

बार-बार टोकना 
किसी को नहीं भाता है 
मगर आदत जो पड़ गई है 
उस ज़माने से ही 
जब हमें टोका जाता था
और हमें भी बड़ी झल्लाहट होती थी 
फिर धीरे-धीरे आदत पड़ी  
और वक़्त की पाबन्दी को अपनाना पड़ा था। 
  
पर कितना तो मन होता था तब 
कि सबकी तरह थोड़ी-सी चकल्लस कर ली जाए 
ज़रा-सी मस्ती
ज़रा-सी अल्हड़ता 
ज़रा-सी दीवानगी 
ज़रा-सी शैतानी    
ज़रा-सी तो शाम हुई है 
क्या बिगड़ जाएगा। 

पर अब 
सब आने लगा समझ में 
फ़िक्रमंद होना भी लत की तरह है 
जानते हुए कि कुछ नहीं कर सकते  
जो होना है होकर ही रहता है 
न घड़ी की सूई, न बालकोनी, न दरवाज़े की घंटी
मेरी हाँ में हाँ मिलाएगी  
फिर भी आदत जो है।

-जेन्नी शबनम (30.9.2013)
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शुक्रवार, 27 मई 2011

247. बच्चे (5 ताँका)

पहली बार ताँका लिखने का प्रयास किया है, प्रतिक्रिया अपेक्षित है। 

बच्चे

***

1.
नन्ही-सी परी
लिए जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफ़ी 
फिर उड़ वो चली। 

2.
उनके हाथ
मंझा और पतंग
बच्चे चहके
सब ख़ूब मचले
उड़ी जब पतंग।  

3.
उछले-कूदे
बड़ा शोर मचाएँ
ये नन्हें बच्चे
राज दुलारे बच्चे
ये प्यारे-प्यारे बच्चे। 

4.
दुनिया खिले
आसमान चमके
चाँद-तारों से
घर-अँगना सजे
छोटे-छोटे बच्चों से। 

5.
प्यारी बिटिया
रुनझुन नाचती
खेल दिखाती
घर-आँगन गूँजे
अम्मा-बाबा हँसते। 

-जेन्नी शबनम (10.5.2011)
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