शनिवार, 3 सितंबर 2011

279. दर्द की मियाद और कितनी है (क्षणिका)

दर्द की मियाद और कितनी है

*******

कोई भी दर्द उम्र से पहले ख़त्म नहीं होता
किससे पूछूँ कि
दर्द की मियाद और कितनी है। 

- जेन्नी शबनम (2. 9. 2011)
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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

278. फ़िज़ूल हैं अब (क्षणिका)

फ़िज़ूल हैं अब

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फ़िज़ूल हैं अब
इसलिए नहीं कि सब जान लिया
इसलिए कि जीवन बेमक़सद लगता है
जैसे चलती हुई साँसें या फिर बहती हुई हवा
रात की तन्हाई या फिर दिन का उजाला
दरकार नहीं, पर ये रहते हैं अनवरत मेरे साथ चलते हैं
मैं और ये सब, फ़िज़ूल हैं अब। 

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2011)
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सोमवार, 29 अगस्त 2011

277. शेष न हो (क्षणिका)

शेष न हो

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सवाल भी ख़त्म और जवाब भी
शायद ऐसे ही ख़त्म होते हैं रिश्ते
जब सामने कोई हो
और कहने को कुछ भी शेष न हो। 

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2011)
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रविवार, 28 अगस्त 2011

276. इन्द्रधनुष खिला (बरसात पर 10 हाइकु) (पुस्तक - 19)

इन्द्रधनुष खिला 
(बरसात पर 10 हाइकु)

******* 

1.
आकाश दिखा
इन्द्रधनुष खिला
मचले जिया।

2.
हुलसे जिया
घिर आए बदरा
जल्दी बरसे।

3.
धरती गीली
चहुँ ओर है पानी
हिम पिघला।

4.
भीगा अनाज
कुलबुलाए पेट
छत टपकी।

5.
बिजली कौंधी
कहीं जब है गिरी
खेत झुलसे।

6.
धरती ओढ़े
बादलों की छतरी
सूरज छुपा।

7.
मेघ गरजा
रिमझिम बरसा
मन हरसा।

8.
कारे बदरा
टिप-टिप बरसे
मन हरसे।

9.
इन्द्र देवता
हुए धरा से रुष्ट
लोग पुकारें।

10.
ठिठके खेत
कर जोड़ पुकारे
बरसो मेघ।

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2011)
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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

275. राखी के धागे (राखी पर 11 हाइकु) (पुस्तक - 18)

राखी के धागे
(राखी पर 11 हाइकु)

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1.   
राखी का पर्व   
पूर्णमासी का दिन   
सावन माह   

2.   
राखी-त्योहार   
सब हों ख़ुशहाल   
भाई-बहन   

3.   
बहना आई   
राखी लेकर प्यारी   
भाई को बाँधी   

4.   
रक्षा बंधन   
प्यार का है बंधन   
पवित्र धागा   

5.   
रक्षा का वादा   
है भाई का वचन   
बहन ख़ुश   

6.   
भैया विदेश   
राखी किसको बाँधे   
राह निहारे  

7.   
राह अगोरे   
भइया नहीं आए   
राखी का दिन   

8.   
सजेगी राखी   
भैया की कलाई पे   
रंग-बिरंगी   

9.   
राखी की धूम   
दिखे जो चहुँ ओर   
मनवा झूमे   

10.   
रक्षा-बंधन   
याद रखना भैया   
प्यारी बहना   

11.   
अटूट रिश्ता   
जोड़े भाई-बहन   
रक्षा बंधन   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2011)   
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सोमवार, 22 अगस्त 2011

274. दुनिया बहुत रुलाती है (क्षणिका)

दुनिया बहुत रुलाती है

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प्रेम की चाहत कभी कम नहीं होती
ज़िन्दगी बस दुनियादारी में कटती है
कमबख़्त ये दुनिया बहुत रुलाती है। 

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2011 )
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

273. फिर से मात (तुकांत)

फिर से मात

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बेअख़्तियार-सी हैं करवटें, बहुत भारी है आज की रात
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने, तन्हाई है ज़िन्दगी की बात। 

साथ रहने की वो गुज़ारिश, बन चली आँखों में बरसात
ख़त्म होने को है ज़िन्दगानी, पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात।  

सपने पलते रहे आसमान के, छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात
वक़्त से करते रहे थे शिकवा, वक़्त ही था बैठा लगाए घात। 

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी, मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौग़ात
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों, आना कभी फिर होगी मुलाक़ात। 

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी, क़दम-क़दम पर खड़ा आघात
देखो सब हँस पड़े क़िस्मत पर, 'शब' ने खाई है फिर से मात। 

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011 )
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सोमवार, 15 अगस्त 2011

272. राम नाम सत्य है

राम नाम सत्य है

***

कोई तो पुकार सुनो
कोई तो साहस करो
चीख नहीं निकलती
पर दम निकल रहा है उनका

वे अपने दर्द में ऐसे टूटे हैं
कि ज़ख़्म दिखाने से भी कतराते हैं
उनकी सिसकी मुँह तक नहीं आती
गले में ही अटक जाती है
करुणा नहीं चाहते
मेहनत से जीने का अधिकार चाहते हैं
जो उन्हें मिलता नहीं
और छीन लेने का साहस नहीं
क्योंकि बहुत तोड़ा गया वर्षों-वर्ष उनको
दम टूट जाए, पर ज़ुबान चुप रहे
इसी कोशिश में रोज़-रोज़ मरते हैं

चिथड़ों में लिपटे बच्चों की ज़ुबान भी चुप हो गई है
रोने के लिए पेट में अनाज तो हो
देह में जान तो हो
लहलहाती फ़सलें, प्रकृति लील गई
देह की ताक़त, ख़ाली पेट की मजूरी तोड़ गई।   

हाथ अकेला, भँवर बड़ा
उफ़! इससे तो अच्छा है जीवन का अन्त 
एक साथ सब बोलो-
''राम नाम सत्य है!''

- जेन्नी शबनम (15.8.2011)
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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

271. अलविदा कहती हूँ

अलविदा कहती हूँ

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ख़्वाहिशें ऐसे ही दम तोड़ेंगी
जानते हुए भी नए-नए ख़्वाब देखती हूँ
दामन से छूटते जाते  
जाने कितने पल
फिर भी वक़्त को समेटती हूँ
शमा फिर भी जलेगी
रातें फिर भी होंगी
साथ तुम्हारे बस एक रात आख़िरी चाहती हूँ
चाहकर टूटना या टूटकर चाहना
दोनों हाल में 
मैं ही तो हारती हूँ
दूरियाँ और भी बढ़ जाती है
मैं जब-जब पास आती हूँ
पास आऊँ या दूर जाऊँ
सिर्फ़ मैं ही 
मात खाती हूँ
न आए कोई आँच तुम पर
तुमसे दूर चली जाती हूँ
एक वचन देती हूँ प्रिय
ख़ुद से नाता तोड़ती हूँ
'शब' की हँसी गूँज रही
महफ़िल में सन्नाटा है
रूख़सत होने की बारी है
अब मैं
अलविदा कहती हूँ

- जेन्नी शबनम (अगस्त 10, 2011)
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रविवार, 7 अगस्त 2011

270. तुम मेरे दोस्त जो हो

तुम मेरे दोस्त जो हो

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से ऊब गई हूँ'',
जानती हूँ, तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे 
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है
पर हर बार जब-जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा तुम ही तो देते हो
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी ग़लती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फ़ा होती हूँ तुम पर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुम पर
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो 
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ
पर न जाने क्यों
किस्त-किस्त में सब कह जाती हूँ तुमसे 
शायद यह भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं पर जन्मों का रिश्ता है
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती 
कभी नज़र माँगती
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात के लिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं ख़रीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो

- जेन्नी शबनम (7. 8. 2011)
(मित्रता दिवस पर)
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शनिवार, 6 अगस्त 2011

269. उन्हीं दिनों की तरह (पुस्तक - 37)

उन्हीं दिनों की तरह

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चौंककर उसने कहा-
''जाओ लौट जाओ 
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ़ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्! निरुत्तर!
फिर भी कह उठी-
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम
जीवन की दशा और दिशा को, तुमने ही तो बदला था
सब जानते तो थे तुम, तब भी और अब भी
सच है, तुम भी बदल गए हो
वो न रहे, जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं
एक भूलभुलैया या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही
आस है, शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक, सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र, ज़िन्दगी के नये रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी
सब कुछ बदल गया है, वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ
फ़र्क़ सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो, फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी, तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो-
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो-
''शब, तुम वही हो, मैं भी वही
फिर आना, कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से, उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2011)
(20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर)
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बुधवार, 3 अगस्त 2011

268. कह न पाऊँगी कभी

कह न पाऊँगी कभी

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी किसी से कभी
अपने पराए का भेद समझती हूँ
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी

न जाने कब कौन अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है
पराए से अपना कोई नहीं 
मन जानता है
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी। 

- जेन्नी शबनम (19. 7. 2011)
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सोमवार, 1 अगस्त 2011

267. कुछ तो था मेरा अपना

कुछ तो था मेरा अपना

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जी चाहता है
सब कुछ छोड़कर
लौट जाऊँ, अपने उसी अँधेरे कोने में
जहाँ कभी किसी दिन
दुबकी हुई, मैं मिली थी तुम्हें
और तुम खींच लाए थे उजाले में
चहकने के लिए
। 

खिली-खिली मैं
जाने कैसे सब भूल गई
वो सब यादें विस्मृत कर दी
जो टीस देती थी मुझे
और मैं तुम्हारे साथ
सतरंगी सपने देखने लगी थी
जानते हुए कि
बीते हुए कल के अँधेरे साथ नहीं छोड़ेंगे
और एक दिन तुम भी छोड़ जाओगे
मैंने एक भ्रम लपेट लिया था कि
सब कुछ अच्छा है
जो बीता वो कल था
आज का सपना सब सच्चा है

अब तो जो शेष है
बस मेरे साथ
मेरा ही अवशेष है
जी चाहता है
लौट जाऊँ अपने उसी अँधेरे कोने में
अपने सच के साथ
जहाँ कुछ तो था
मेरा अपना...!

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2011)
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बुधवार, 20 जुलाई 2011

266. एक चूक मेरी

एक चूक मेरी

***

रास्ते पर चलते हुए मैं उससे टकरा गई
उसके हाथ में पड़े सभी फ़लसफ़े गिर पड़े
जो मेरे लिए ही थे
सभी टूट गए और मैं देखती रही।   

उसने कहा 
ज़रा-सी चूक
तमाम जीवन की सज़ा बन गई तुम्हारी
तुम जानती हो कि उचित क्या है
क्योंकि तुमने देखे हैं उचित फ़लसफ़े
जो जन्म के साथ तुम्हें मिलने थे
जिनके साथ तुम्हें जीना था। 

अडिग रहने का साहस, अब तुममें न होगा
जाओ और जियो, उन सभी की तरह
जो किसी फ़लसफ़ा के बिना जीते और मर जाते हैं
बस एक फ़र्क़ होगा 
तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए सही क्या है
यह जानते हुए भी तुम्हें बेबस जीना होगा
अपनी आत्मा को मारना होगा।  

मेरे पास मेरे तर्क थे
कि यह अनजाने में हुआ
एक मौका और...!
इतने न सही, थोड़े से...!

पर उसने कहा 
यह सबक़ है, इस जीवन के लिए
ज़रा-सी चूक
और सब ऐसे ही ख़त्म हो जाता है
कोई मौक़ा दुबारा नहीं मिलता है।  

आज तक मैं जी रही
मेरे फ़लसफ़ों के टूटे टुकड़ों में
अपनी ज़िन्दगी को बिखरते देख रही
रोज़-रोज़ मेरी आत्मा मर रही। 
  
वह वापस कभी नहीं आया
न दुबारा मिला
एक चूक मेरी और...!

- जेन्नी शबनम (20.7.2011)
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

265. मैं भी इंसान हूँ (पुस्तक - 30)

मैं भी इंसान हूँ

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मैं, एक शब्द नही, एहसास हूँ, अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की, मैं भी जीवित इंसान हूँ। 
दर्द में आँसू निकलते हैं, काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है, दग़ा मिले तो दिल तड़पता है। 
कुछ बंधन बन गए, कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में, मैं अब भी जी रही। 
कई चेहरे ओढ़ लिए, कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले, मैं आज भी जी रही। 
मेरे सपने, आज भी मचलते हैं
मेरे जज़्बात, मुझसे अब रिहाई माँगते हैं। 
कब, कहाँ, कैसे-से कुछ प्रश्न
यूँ ही पनपते हैं, और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं। 
हाँ, मैं सिर्फ़ एक शब्द नहीं
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ।   

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2009)
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रविवार, 10 जुलाई 2011

264. आत्मकथा

आत्मकथा

*******

एक सदी तक चहकती फिरी
घर आँगन गलियों में
थी कथा परियों की
और जीवन फुदकती गौरैया-सी।   

दूसरी सदी में आ बसी
हर कोने चौखट चौबारे में
कण-कण में बिछती रही
बगिया में ख़ुशबू-सी।    

तीसरी सदी तक आ पहुँची
घर की गौरैया अब उड़ जाएगी
घर आँगन होगा सूना
याद बहुत आएगी
कोई गौरैया है आने को
अपनी दूसरी सदी में जीने को
कण-कण में समाएगी
घर आँगन वो खिलाएगी।  

ख़ुद को अब समेट रही
बिखरे निशाँ पोंछ रही
यादों में कुछ दिन जीना है
चौथी सदी बिताना है
फिर तस्वीर में सिमट जाना है।   

जाने कैसी ये आत्मकथा
मेरी उसकी सबकी
एक जैसी है
खिलना बिछना सिमटना
ख़त्म होती यूँ
गौरैया की कहानी है।   

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)
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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

263. स्तब्ध खड़ी हूँ

स्तब्ध खड़ी हूँ

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ख़्वाबों के गलियारे में, स्तब्ध मैं हूँ खड़ी
आँखों से ओझल, ख़ामोश पास तुम भी हो खड़े,
साँसे हैं घबराई-सी, वक़्त भी है परेशान खड़ा
जाने कौन सी विवशता है, वक़्त ठिठका है
जाने कौन सा तूफ़ान थामे, वक़्त ठहरा है। 

मेरी सदियों की पुकार तुम तक नहीं पहुँचती
तुम्हारी ख़ामोशी व्यथित कर रही है मुझे, 
अपनी आँखों से अपने बदन का लहू पी रही
और जिस्म को आँसुओं से सहेज रही हूँ। 

मैं, तुम और वक़्त
सदियों से सदियों का तमाशा देख रहे हैं
न हम तीनों थके न सदियाँ थकीं, 
शायद एक और इतिहास रचने वाला है
या शायद एक और बवंडर आने वाला है। 

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2009)
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बुधवार, 6 जुलाई 2011

262. ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती (क्षणिका)

ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती

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ख़ौफ़ के साये में ज़िन्दगी को तलाशती हूँ
ढेरों सवाल हैं पर जवाब नहीं
हर पल हर लम्हा एक इम्तहान से गुज़रती हूँ
ख़्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख़्त, ये ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती। 

- जेन्नी शबनम (24. 1. 2009)
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शनिवार, 2 जुलाई 2011

261. विजयी हो पुत्र (पुस्तक - 52)

विजयी हो पुत्र

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मैं, तुम्हारी माँ, एक गांधारी
मैंने अपनी आँखों पे नहीं
अपनी संवेदनाओं पे पट्टी बाँध रखी है
इसलिए नहीं कि
तुम्हारा शरीर वज्र का कर दूँ
इसलिए कि
अपनी तमाम संवेदनाएँ तुममें भर दूँ। 

यह युद्ध दुर्योधन का नहीं
जिसे माँ गांधारी की समस्त शक्ति मिली
फिर भी हार हुई
क्योंकि उसने मर्यादा को तोड़ा
अधर्म पर चला 
अपनों से छल किया
स्त्री, सत्ता और संपत्ति के कारण युद्ध किया। 

मेरे पुत्र,
तुम्हारा युद्ध धर्म का है
जीवन के सच का है
अंतर्द्वंद्व का है
स्वयं के अस्तित्व का है। 

तुम पांडव नहीं
जो कोई कृष्ण आएगा सारथी बनकर
और युद्ध में विजय दिलाएगा
भले ही तुम धर्म पर चलो
नैतिकता पर चलो
तुम्हें अकेले लड़ना है और सिर्फ़ जीतना है
 
मेरी पट्टी नितांत अकेले में खुलेगी
जब तुम स्वयं को अकेला पाओगे
दुनिया से हारे, अपनों से थके
मेरी संवेदना, प्रेम, विश्वास, शक्ति
तुममें प्रवाहित होगी
और तुम जीवन-युद्ध में डटे रहोगे
जो तुम्हें किसी के विरुद्ध नहीं
बल्कि स्वयं को स्थापित करने के लिए करना है। 

मेरी आस और आकांक्षा
अब बस तुम से ही है
और जीत भी। 

- जेन्नी शबनम (22. 6. 2011)
(पुत्र अभिज्ञान के 18 वें जन्मदिन पर)
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

260. तुम्हारे सवाल

तुम्हारे सवाल

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न तो सवाल बनी तुम्हारे लिए कभी
न ही कोई सवाल किया तुमसे कभी
फिर क्यों हर लम्हों का हिसाब माँगते हो?
फिर क्यों उगते हैं नए-नए सवाल तुममें?

कहाँ से लाऊँ उनके जवाब
जिसे मैंने सोचा ही नहीं
कैसे दूँ उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया ही नहीं।  

मेरे माथे की शिकन की वज़ह पूछते हो
मेरे हर आँसुओं का सबब पूछते हो
अपने साँसों की रफ़्तार का जवाब कैसे दूँ?
अपने हर गुज़रते लम्हों का हिसाब कैसे दूँ?

तुम्हारे बेधते शब्दों से
आहत मन के आँसुओं का क्या जवाब दूँ?
तुम्हारी कुरेदती नज़रों से
छलनी वजूद का क्या जवाब दूँ?

बिन जवाबों के तुम मेरी औक़ात बताते हो
बिन जवाबों के तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं अपनाती हूँ
फिर क्या बताऊँ कि कितना चुभता है
तुम्हारा ये अनुत्तरित प्रश्न
फिर क्या बताऊँ कि कितना टूटता है
तुम्हारे सवालिया आँखों से मेरा मन। 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 10, 2008)
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बुधवार, 29 जून 2011

259. आत्मीयता के क्षण

आत्मीयता के क्षण

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आत्मीयता के ये क्षण
अनकहे भले ही रह जाए
अनबूझे नहीं रह सकते। 

नहीं-नहीं, यह भ्रम है
निरा भ्रम, कोरी कल्पना
पर नहीं, उन क्षणों को कैसे भ्रम मान लूँ
जहाँ मौन ही मुखरित होकर
सब कुछ कह गया था।  

शाम का धुँधलका
मन के बोझ को और भी बढ़ा देता है
मंज़िलें खो गई हैं, राहें भटक गई हैं
स्वयं नहीं मालूम, जाना कहाँ है। 

क्या यूँ निरुद्देश्य भटकन ही ज़िन्दगी है?
क्या कोई अंत नहीं?
क्या यही अंत है?
क्या कोई हल नहीं?
क्या यही राह है?
कब तक इन अनबूझ पहेलियों से घिरे रहना है?

काश!
आत्मीयता के ये अनकहे क्षण
अनबूझे ही रहते।  

- जेन्नी शबनम (25. 1. 2009)
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मंगलवार, 28 जून 2011

258. नन्ही भिखारिन (पुस्तक - 84)

नन्ही भिखारिन

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यह उसका दर्द है,
पर मेरे बदन में 
क्यों रिसता है?
या खुदा! 
नन्ही-सी जान, कौन-सा गुनाह था उसका?
शब्दों में खामोशी, आँखों में याचना, पर शर्म नही
हर एक के सामने, हाथ पसारती
सौ में से कोई एक कुछ दे जाता
उतने में ही संतुष्ट!
थोड़ा थमकर, गिनकर   
फिर अगली गाड़ी के पास, बढ़ जाती। 
उफ़! 
उसे पीड़ा नही होती?
पर क्यों नही होती?
कहते हैं पिछले जन्म का इस जन्म में 
भुगतता है जीवन
फिर इस जन्म का भुगतना
कब सुख पाएगा जीवन?
मन का धोखा या सब्र की एक ओट
जीने की विवशता
पर मुनासिब भी तो नही अंत। 
कुछ सिक्कों की खनक में, खोया बचपन
फिर भी शांत, जैसे यही नसीब
जीवित हैं, जीना है, नियति है
ख़ुदा का रहम है।  
उफ़!
उसे खुदा पर रोष नही होता?
पर क्यों नही होता?
उसका दर्द उसका संताप, उसकी नियति है
उसका भविष्य उसका वर्तमान, एक ज़ख़्म है। 
यह उसका दर्द है
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?

- जेन्नी शबनम (10. 1. 2009)
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शनिवार, 25 जून 2011

257. बस धड़कनें चलेंगी

बस धड़कनें चलेंगी

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भला ऐसा भी होता है
न जीते बनता है
न कोई रास्ता मिलता है,
साथ चलते तो हैं लेकिन
कुछ दूरी 
बनाए रहना होता है,
मन में 
बहुत कुछ अनबोला रहता है
बहुत कुछ अनजीया रहता है,
मन तो चाहता है
सब कह दें
जो जी चाहता सब कर लें,
कई शर्तें भी साथ होती हैं
जिन्हें मानना अपरिहार्य है
ऐसा भी हो सकता है
न मानो तो अनर्थ हो जाए,
संसार के दाँव-पेंच
मन बहुत घबराता है
बेहतर है
अपने कुआँ के मेढ़क रहो
या अपने चारों तरफ़
काँटों के बाड़ लगा लो,
न कोई आएगा
न कोई भाव उपजेंगे
न मन में कोई कामना जागेगी,
मृत्यु की प्रतीक्षा में
बस धड़कनें चलेंगी। 

- जेन्नी शबनम (जून 20, 2011)
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बुधवार, 22 जून 2011

256. सूरज ने आज ही देखा है मुझे

सूरज ने आज ही देखा है मुझे

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रोज़ ही तो होती है
नयी सुबह
रोज़ ही तो देखती हूँ
सूरज को उगते हुए
पर मन में उमंगें
आज ही क्यों?
शायद पहली बार सूरज ने
आज ही देखा है मुझे। 

अपनी समस्त ऊर्जा
और ऊष्णता से
मुझमें जीवन भर रहा है
अपनी धूप की सेंक से
मेरी नम ज़िन्दगी को
ताज़ा कर रहा है। 

जाने कितने सागर हैं
समाये मुझमें
समस्त संभावनाएँ और सृष्टी की पहचान
दे रहा है
ज़िन्दगी अवसाद नहीं न विरोध है
अद्भूत है
अपनी तेज किरणों से
ज्ञान दे रहा है। 

बस एक अनुकूल पल
और तरंगित हो गया
समस्त जीवन-सत्य
बस एक अनोखा संचार
और उतर गया
सम्पूर्ण शाश्वत-सत्य। 

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2009)
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मंगलवार, 21 जून 2011

255. मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है / meri zindagi palaayan kar rahi hai

मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है

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मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है
या मैं स्व-रचित संसार में सिमट रही हूँ
शायद मैंने भ्रम-जाल रच लिया है
और ख़ुद ही उससे लिपट झुँझला रही हूँ
मेरे हिस्से में प्रेम और जीवन भी है
पर अपना हिस्सा मैं ही गुम कर रही हूँ
वज़ह नहीं न तो कोई इल्ज़ाम है
बस स्वप्नलोक-सी एक दुनिया तलाश रही हूँ
मेरे कई सवाल मुझे बरगलाते हैं
अब सवाल नहीं ख़ुद को ही ख़त्म कर रही हूँ। 

- जेन्नी शबनम (अगस्त 11, 2010)
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meri zindagi palaayan kar rahi hai

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meri zindagi palaayan kar rahi hai
ya main swa-rachit sansaar men simat rahi hun
shaayad maine bhram-jaal rach liya hai
aur khud hi usase lipat jhunjhala rahi hun
mere hisse men prem aur jivan bhi hai
par apna hissa main hi gum kar rahi hun
vazah nahin na to koi ilzaam hai
bas swapnlok-si ek duniya talaash rahi hun
mere kai sawaal mujhe bargaalate hain
ab sawaal nahin khud ko hi khatm kar rahi hun.

- jenny shabnam (august11, 2010)
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सोमवार, 20 जून 2011

254. मेरे मीत

मेरे मीत

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देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूँ तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर। 

तुम मेरे हो और मेरे ईश भी
तुम मेरे हो और मेरे मीत भी
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया। 

कभी चाँद के दामन से
कुछ रौशनी उधार माँग लाई थी
और उससे तुम्हारी तस्वीर
उकेर दी थी चाँद पर
जब जी चाहता है मिलूँ तुमसे
देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर। 

- जेन्नी शबनम (8 फ़रवरी, 2009)
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बुधवार, 15 जून 2011

253. वो दोषी है

वो दोषी है

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कच्ची उम्र
कच्ची सड़क पर
अपनी समस्त पूँजी
घसीट रही
उसे जाना है सीमा के पार
अकेले रहने
क्योंकि
वो पापी है
वो दोषी है!
छुपा रही है लूटा धन
लपेट रही है अपना बदन
शब्द-वाणों से है छलनी मन
नरभक्षियों ने किया है घायल तन
सगे-संबंधी विवश
मूक ताक रहे सभी निस्तब्ध!
नोच खाया जिसने
उसी ने ठराया दोषी उसे
अब न मिलेगी छाँव
भले कितने ही थके हों पाँव
कोई नहीं है साथ
जिसे कहे मन की बात
हार गई स्वयं अपने से
झुकी आँखें शर्म से!

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2011)
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शनिवार, 11 जून 2011

252. हो ही नहीं (क्षणिका)

हो ही नहीं

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कौन जाने सफ़र कब शुरू हो
या कि हो ही नहीं
रास्ते तो कहीं जाते नहीं
चलना मेरे नसीब में हो ही नहीं। 

- जेन्नी शबनम (1. 2. 2011)
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गुरुवार, 9 जून 2011

251. ग्रीष्म (ग्रीष्म के 10 हाइकु) पुस्तक - 17, 18

ग्रीष्म
(ग्रीष्म के 10 हाइकु)

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1.
तपती गर्मी
अब तो बरस जा
ओ रे बदरा।

2.
उसका ताप
जल उठे जो हम
सूरज हँसा।

3.
सह न सके
उड़ चले पखेरू
बावड़ी सूखी।

4.
गगरी खाली
सूख गई धरती
प्यासी तड़पूँ।

5.
सूर्य कठोर
अगन बरसाए
कहीं न छाँव।

6.
झुलस गई
धधकती धूप में
मेरी बगिया।

7.
खेलते बच्चे
बरगद की छाँव
कभी था गाँव।

8.
सूर्य उगले
आग का है दरिया
तन झुलसा।

9.
सूरज जला
तपता जेठ मास
आ जा आषाढ़।

10.
तपता जेठ
मन को अलसाए
पौधे मुर्झाए।

- जेन्नी शबनम (2. 4. 2011)
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रविवार, 5 जून 2011

250. कविता के पात्र हो

कविता के पात्र हो

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मेरी कविता पढ़ते हुए
अचानक रुक गए तुम
उसमें ख़ुद को तलाशते हुए
पूछ बैठे तुम
कौन है इस कविता में?
मैं तुम्हें देखती रही अपलक
ख़ुद को कैसे न देख पाते हो तुम?
जब हवाएँ नहीं गुज़रती
बिना तुमसे होकर
मेरी कविता कैसे रचेगी
बिना तुमसे मिलकर
हर बार तुमको बताती हूँ
कि कौन है इस कविता का पात्र
और किस कविता में हो सिर्फ़ तुम
फिर भी कहते हो
क्या मैं सिर्फ कविता का एक पात्र हूँ?
क्या तुम्हारी ज़िन्दगी का नहीं?
प्रश्न स्वयं से भी करती हूँ
और उत्तर वही आता है
हाँ, तुम केवल मेरी कविता के पात्र हो!
मगर कविता क्या है?
मेरी ज़िन्दगी
मेरी पूरी ज़िन्दगी। 

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2011)
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शनिवार, 4 जून 2011

249. कोई और लिख गया (तुकांत)

कोई और लिख गया

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वक़्त के साथ मैं तो चलती रही
वक़्त ने जब जो कहा करती रही। 

क्या जानूँ क्या है जीने का फ़लसफ़ा
बेवजह-सी हवाओं में साँस लेती रही। 

मरघट-सी वीरानी थी हर जगह
और मैं ज़िन्दगी को तलाशती रही। 

जाने कौन दे रहा आवाज़ मुझको
मैं तो बेगानों के बीच जीती रही। 

कोई मिला राह में गुज़रते हुए कल
डरती झिझकती मैं साथ बढ़ती रही। 

कोई और लिख गया कहानी मेरी
मैं जाने क्या समझी और पढ़ती रही। 

जिसने चाहा मढ़ दिया गुनाह बेदर्दी से
'शब' हँसकर गुनाह क़ुबूल करती रही। 

- जेन्नी शबनम (4. 06. 2011)
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सोमवार, 30 मई 2011

248. न मंज़िल न ठिकाना है (तुकांत)

न मंज़िल न ठिकाना है

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बड़ा अजब अफ़साना है, ज़माने से छुपाना है
है बेनाम-सा कोई नाता, यूँ ही अनाम निभाना है।  

सफ़र है बहुत कठिन, रस्ता भी अनजाना है
चलती रही तन्हा-तन्हा, न मंज़िल न ठिकाना है।  

धुँधला है अक्स पर, उसे आँखों में बसाना है
जो भी कह दे ये दुनिया, अब नहीं घबराना है।  

शमा से लिपटकर अब, बिगड़ा नसीब बनाना है
पलभर जल के शिद्दत से, परवाने-सा मर जाना है।  

इश्क़ में गुमनाम होकर, नया इतिहास रचाना है
रोज़ जन्म लेती है 'शब', क़िस्मत का खेल पुराना है।  

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)
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शुक्रवार, 27 मई 2011

247. बच्चे (5 ताँका)

पहली बार ताँका लिखने का प्रयास किया है, प्रतिक्रिया अपेक्षित है। 

बच्चे
(5 ताँका)

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1.
नन्ही-सी परी
लिए जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफ़ी 
फिर उड़ वो चली। 

2.
उनके हाथ
माँझा और पतंग
बच्चे चहके
सब ख़ूब मचले
उड़ी जब पतंग।  

3.
उछले कूदे
बड़ा शोर मचाएँ
ये नन्हें बच्चे
राजदुलारे बच्चे
ये प्यारे-प्यारे बच्चे। 

4.
दुनिया खिले
आसमान चमके
चाँद-तारों से
घर अँगना सजे
छोटे-छोटे बच्चों से। 

5.
प्यारी बिटिया
रुनझुन नाचती
खेल दिखाती
घर-आँगन गूँजे
अम्मा-बाबा हँसते। 

-जेन्नी शबनम (10.5.2011)
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सोमवार, 23 मई 2011

246. चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं

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मिलती नहीं मनचाही फ़िज़ा
सभी आशाएँ दम तोड़ती हैं
तन्हा-तन्हा बहुत हुआ सफ़र
चलो नयी फ़िज़ा हम सजाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं। 

आसान नहीं हर इल्ज़ाम सहना
बेगुनाही जतलाना भी मुमकिन कब होता है
बहुत दूर ठिठका है आसमान
चलो कुछ आसमान अपने लिए तोड़ लाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं। 

बेसबब तो नहीं होता यूँ मुँह मोड़ना
ज़मीन को चाहता है कौन छोड़ना
धुँधली-धुँधली नज़र आती है ज़मीन
चलो आसमान पे घर बसाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं। 

दुनिया के रिवाजों से थक गए
हर दौर से हम गुज़र गए
सब कहते दुनिया के क़ाएदे हम नहीं निभाते हैं
चलो एक और गुनाह कर आते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं। 

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2011)
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शुक्रवार, 20 मई 2011

245. अधरों की बातें

अधरों की बातें

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तुम्हारे अधरों की बातें
तुम क्या जानो
मेरे अधरों को बहुत भाते हैं
न समझे तुम मन की बातें
कैसे कहें तुमको
तुम्हें देख हम खिल जाते हैं
तुम भी देख लो मेरे सनम
प्रीत की रीत
यूँ ही नहीं निभाते हैं
शाख पे बैठी कोई चिरैया
गीत प्यार का जब गाती है
सुनकर गीत मधुर
साथी उसके उड़ आते हैं
ऐसे तुम भी आ जाओ
मेरे अधरों पे गीत रच जाओ
अब तुम बिन हम रह नहीं पाते हैं
जाने कब आएँगे वो दिन
जादू-सी रातें बीते हुए दिन
वो दिन बड़ा सताते हैं
हर पल तुमको बुलाते हैं
अब हम रह नहीं पाते हैं। 

- जेन्नी शबनम (18. 5. 2011)
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सोमवार, 16 मई 2011

244. तीर वापस नहीं होते

तीर वापस नहीं होते

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जानते हुए कि हर बार और दूर हो जाती हूँ
तल्ख़ी से कहते हो मुझे कि मैं गुनहगार हूँ
मुमकिन है कि मन में न सोचते होओ
महज़ आक्रोश व्यक्त करते होओ
या फिर मुझे बाँधे रखने का ये कोई हथियार हो
या मेरे आत्मबल को तोड़ने की ये तरक़ीब हो
लेकिन मेरे मन में ये बात समा जाती है
हर बार ज़िन्दगी चौराहे पर नज़र आती है। 
हर बार लगाए गए आरोपों से उलझते हुए
धीरे-धीरे तुमसे दूर होते हुए
मेरी अपनी एक अलग दुनिया है
जहाँ अब तक बहुत कुछ सबसे छुपा है
वहाँ की वीरानगी में सिमटती जा रही हूँ
ख़ामोशियों से लिपटती जा रही हूँ
भले तुम न समझ पाओ कि
मैं कितनी अकेली होती जा रही हूँ
न सिर्फ़ तुमसे बल्कि
अपनी ज़िन्दगी से भी नाता तोड़ती जा रही हूँ। 
तुम्हारी ये कैसी ज़िद है
या कि अहम् है
क्यों कटघरे में अक्सर खड़ा कर देते हो
जाने किस बात की सज़ा देते हो
जानते हो न
जैसे कमान से निकले तीर वापस नहीं होते
वैसे ही
ज़बान से किए वार वापस नहीं होते। 

- जेन्नी शबनम (11. 5. 2011)
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बुधवार, 11 मई 2011

243. सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं (पुस्तक - 99)

सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं

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कामनाओं की एक फ़ेहरिस्त, बना ली हमने
कई छोटी-छोटी चाह, पाल ली हमने
छोटे-छोटे सपने, एक साथ सजा लिए हमने।  
आँखें मूँद बग़ल की सीट पर बैठी मैं
तेज़ रफ़्तार गाड़ी, जिसे तुम चलाते हुए
मेरे बालों को सहलाते भी रहो और
मेरे लिए कोई गीत गाते भी रहो
बहुत लम्बी दूरी तय करें, बेमक़सद
बस एक दूसरे का साथ
और बहुत सारी ख़ुशियाँ,
तुम्हारे हाथों बना कोई खाना
जिसे कौर-कौर मुझे खिलाओ
और फिर साथ बैठकर
बस मैं और तुम, खेलें कोई खेल,
हाथों में हाथ थामे
कहीं कोई, ऐतिहासिक धरोहर
जिसके क़दम-क़दम पर छोड़ आएँ, अपने निशाँ
कोई एक सम्पूर्ण दिन, जहाँ बातों में, वक़्त में
सिर्फ हम और तुम हों। 
तुम्हारी फ़ेहरिस्त में महज़ पाँच-छः सपने थे और
मैंने हज़ारों जोड़ रखे थे,
जानते हुए कि एक-एक कर सपने टूटेंगे और
ध्वस्त सपनों के मज़ार पर, मैं अकेली बैठी
उन यादों को जीयूँगी,
जो अनायास, बिना सोचे
मिलने पर हमने जिए थे, मसलन -
नेहरु प्लेस पर यूँ ही घूमना
मॉल में पिक्चर देखते हुए कहीं और खोए रहना
हुमायूँ का मक़बरा जाते-जाते
क़ुतुब मीनार देखने चल देना। 
तुमको याद है न
तुम्हारा बनाया आलू का पराठा
जिसका अंतिम निवाला मुझे खिलाया तुमने,
अस्पताल का चिली पोटैटो
जिसे बड़ी चाव से खाया हमने
और उस दिन फिर कहा तुमने
कि चलो वहीं चलते हैं,
हँसकर मैंने कहा था -
धत्त! अस्पताल कोई घूमने की जगह है
या खाने की!
जब भी मिले हम
फ़ेहरिस्त में कुछ नए सपने और जोड़ लिए,
पुराने सपने वहीं रहे
जो पूरे होने के लिए शायद थे ही नहीं,
जब भी मिले, पुराने सपने भूल
एक अलग कहानी लिख गए। 
अचानक कैसे सब कुछ ख़त्म हो जाता है
क्यों देख लिए जाते हैं ऐसे सपने
जिनमें एक भी पूरे नहीं होने होते हैं,
फ़ेहरिस्त आज भी, मेरे मन पर गुदी हुई है,
जब भी मिलना, चुपचाप पढ़ लेना
कोई इसरार न करना,
फ़ेहरिस्त के सपने, सपने हैं
सिर्फ़ पलने के लिए, जीने के लिए नहीं। 

- जेन्नी शबनम (9. 5. 2011)
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मंगलवार, 10 मई 2011

242. तनहा-तनहा हम रह जाएँगे (तुकान्त)

तनहा-तनहा हम रह जाएँगे

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सब छोड़ जाएँगे जब हमको
तनहा-तनहा हम रह जाएँगे
किसे बताएँगे ग़म औ खुशियाँ
सदमा कैसे हम सह पाएँगे।  

किसकी तक़दीर में क्यों हुए वो शामिल
कभी नहीं हम कह पाएँगे
अपनी हाथ की फिसलती लकीरों में
उनको सँभाल हम कब पाएँगे। 

हर तरफ़ फैला सन्नाटा
यूँ ही पुकारते हम रह जाएँगे 
है अजब पहेली ज़िन्दगी
उलझन सुलझा कैसे हम पाएँगे। 

हर रोज़ तकरार करते हैं
और कहते कि वो चले जाएँगे
अपनी शिकायत किससे करें
ग़ैरों से नहीं हम कह पाएँगे। 

जाने कैसे कोई रहता तनहा
मगर नहीं हम रह पाएँगे
ज़िन्दगी की बाबत बोली 'शब'
तन्हाई नहीं हम सह पाएँगे। 

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2011)
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रविवार, 8 मई 2011

241. माँ (माँ पर 11 हाइकु) पुस्तक - 16, 17

माँ
(माँ पर 11 हाइकु)

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1.
तौल सके जो
नहीं कोई तराजू
माँ की ममता। 

2.
समझ आई
जब ख़ुद ने पाई
माँ की वेदना। 

3.
माँ का दुलार
नहीं है कोई मोल
है अनमोल। 

4.
असहाय माँ
कह न पाई व्यथा
कोख उजड़ी। 

5.
जो लुट गई
लाड़ में मिट गई
वो होती है माँ। 

6.
प्यारी बिटिया,
बन गई वो माँ-सी
पी-घर गई। 

7.
पराई हुई
घर-आँगन सूना
माँ की बिटिया। 

8.
सारा हुनर
माँ से बिटिया पाए
घर बसाए। 

9.
माँ का अँचरा
सारे जहाँ का प्यार
घर-संसार। 

10.
माँ का कहना
कभी नहीं टालना
माँ होती दुआ। 

11.
माँ की दुनिया
अँगना में बहार
घर-संसार। 

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2011)
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बुधवार, 4 मई 2011

240. हवा ख़ून-ख़ून कहती है

हवा ख़ून-ख़ून कहती है

***

जाने कैसी हवा चल रही है
न ठण्डक देती है, न साँसें देती है
बदन को छूती है 
तो जैसे सीने में बरछी-सी चुभती है। 

हवा अब बदल गई है
यूँ चीखती-चिल्लाती है मानो
किसी नवजात शिशु का दम अभी-अभी टूटा हो
किसी नवब्याहता का सुहाग अभी-अभी उजड़ा हो
भूख से कुलबुलाता बच्चा भूख-भूख चिल्लाता हो
बीच चौराहे किसी का अस्तित्व लुट रहा हो और
उसकी गुहार पर अट्टहास गूँजता हो। 

हवा अब बदल गई है
ऐसे वीभत्स दृश्य दिखाती है 
मानो विस्फोट की तेज लपटों के साथ 
बेगुनाह इन्सानी चिथड़े जल रहे हों
ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए 
लोग घर में क़ैदी हो गए हों
पलायन की विवशता से आहत 
कोई परिवार अन्तिम साँसें ले रहा हो
खेत-खलिहान, जंगल-पहाड़ निर्वस्त्र झुलस रहे हों। 

जाने कैसी हवा है
न नाचती है, न गाती है
तड़पती, कराहती ख़ून उगलती है। 

हवा अब बदल गई है
लाल लहू से खेलती है
बिखेरती है इन्सानी बदन का लहू गाँव-शहर में
और छिड़क देती है 
मन्दिर-मस्जिद की दीवारों पर
फिर आयतें और श्लोक सुनाती है। 

हवा अब बदल गई है 
अब साँय-साँय नहीं कहती
अपनी प्रकृति के विरुद्ध ख़ून-ख़ून कहती है
हवा बदल गई है 
ख़ून-ख़ून कहती है। 

- जेन्नी शबनम (20.4.2011)
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सोमवार, 2 मई 2011

239. ज़िन्दगी ऐसी ही होती है

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है

***

सुनसान राहों से गुज़रते हुए
ज़िन्दगी ख़ामोश हो गई है
कविता भी अब मौन हो गई है। 

शब्द तो बहुत उपजते हैं
और यों ही विलीन हो जाते हैं
बिना कहे शब्द भी खो जाते हैं। 

मेरे शब्द चुप हो रहे हैं
और एक चुप्पी मुझमें भी उग रही है
कविता जन्म लेने से पहले ही मर रही है। 

किसे ढूँढकर कहें कि साथ चलो
मेरी अनकही सुन लो
न सुनो, मेरे लिए कुछ तो कह दो। 

सफ़र की वीरानगी जब दिल में उतर जाती है
मानो कि बहुत चले, मगर ज़िन्दगी वहीं ठहरी होती है
अब जाना कि ज़िन्दगी ऐसी ही होती है  

- जेन्नी शबनम (2.5.2011)
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रविवार, 1 मई 2011

238.तुम अपना ख़याल रखना

तुम अपना ख़याल रखना

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उस सफ़र की दास्तान
तुम बता भी न पाओगे
न मैं पूछ सकूँगी
जहाँ चल दिए तुम अकेले-अकेले
यूँ मुझे छोड़कर
जानते हुए कि तुम्हारे बिना जीना
नहीं आता है मुझको
कठिन डगर को पार करने का
सलीका भी नहीं आता है मुझको
तन्हा जीना 
न मुझे सिखाया न सीखा तुमने
और चल दिए तुम बिना कुछ बताए
जबकि वादा था तुम्हारा
हमसफ़र रहोगे सदा
अंतिम सफ़र में हाथ थामे
बेख़ौफ़ पार करेंगे रास्ता। 

बहुत शिकायत है तुमसे
पर कहूँ भी अब तुमसे कैसे?
जाने तुम मुझे सुन पाते हो कि नहीं?
उस जहाँ में मैं तुम्हारे साथ हूँ कि नहीं?

सब कहते हैं
तुम अब भी मेरे साथ हो
जानती हूँ यह सच नहीं
तुम महज़ एहसास में हो यथार्थ में नहीं
धीरे-धीरे मेरे बदन से तुम्हारी निशानी कम हो रही
अब मेरे ज़ेहन में रहोगे मगर ज़िन्दगी अधूरी होगी
मेरी यादों में जिओगे
साथ नहीं मगर मेरे साथ-साथ रहोगे
। 

अब चल रही हूँ मैं तन्हा-तन्हा
अँधेरी राहों से घबराई हुई
तुम्हें देखने महसूस करने की तड़प
अपने मन में लिए
तुम तक पहुँच पाने के लिए
अपना सफ़र जारी रखते हुए
तुम्हारे सपने पूरे करने के लिए
कठोर चट्टान बनकर
जिसे सिर्फ़ तुम डिगा सकते हो
नियति नहीं
। 

मेरा इंतज़ार न करना
तुहारा सपना पूरा करके ही
मैं आ सकती हूँ
छोड़ कर तुम गए
अब तुम भी
मेरे बिना सीख लेना वहाँ जीना
थोड़ा वक़्त लगेगा मुझे आने में
तब तक तुम अपना ख़याल रखना
। 

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2011)
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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

237. आग सुलग रही है

आग सुलग रही है

***

एक आग सुलग रही है सदियों से
मन पर बोझ है, सीने में कसक उठती है 
सिसक-सिसककर जीती है 
पर ख़त्म नहीं होती ज़िन्दगी। 

अब आग को हवा मिल रही है
सब भस्म कर देने का मन है
पर ऐसी चाह तो न थी, जो अब दिख रही है 
जीतने का मन था, किसी की हार कब चाही थी 
सीने की जलन का क्या करूँ
क्या इनके साथ होकर शान्त कर लूँ ख़ुद को?

सब तरफ़ आग-आग
सब तरफ हिन्सा-हिन्सा 
कैसे हो जाऊँ इनके साथ?
वे सभी खड़े हैं, साथ देने के लिए
मेरे ज़ख़्म को हवा देने के लिए
अपने लिए दूसरों का हक़ छीन लेने के लिए
नहीं ख़त्म होगी सदियों की पीड़ा
नहीं चल सकती मैं इनके साथ। 

बात तो फिर वही रह गई
अब कोई और शोषित है, पहले कोई और था
एक आग अब उधर भी सुलग रही है 
जाने अब क्या होगा?

- जेन्नी शबनम (19.4.2011)
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

236. लम्बी सदी बीत रही है (क्षणिका)

लम्बी सदी बीत रही है

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सीली-सीली-सी पत्तियाँ सुलग रही हैं
जैसे दर्द की एक लम्बी सदी धीरे-धीरे गुज़र रही है
तपन जेठ की झुलसाती गर्म हवाएँ
फिर भी पत्तियाँ सील गईं
ज़िन्दगी भी ऐसे ही सील गई
धीरे-धीरे सुलगते-सुलगते ज़िन्दगी अब राख बन रही है
दर्द की एक लम्बी सदी जैसे बीत रही है

- जेन्नी शबनम (27. 4. 2011)
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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

235. सब ख़ामोश हैं

सब ख़ामोश हैं

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बातें करते-करते
तुम मंदिर तक पहुँच गए
मैं तुम्हें देखती रही
मेरे लिए तुम्हारी आँखों में
क्या जन्म ले रहा है
यह तो नहीं मालूम
तुम क्या सोच रहे थे
पर मेरी ज़िद कि मुझे देखो
सिर्फ़ मुझसे बातें करो
तुम्हें नहीं पता
उस दिन मैंने क्या हार दिया
तुम तक पहुँचती राह को
छोड़ दिया
ईश्वर ने कहा था तुमसे
कि मुझको माँग लो,
मैंने उसकी बातें तुमको सुनने न दी
मेरी ज़िद कि सिर्फ़ मेरी सुनो
ईश्वर ने मुझे कहा -
आज वक़्त है
तुममें अपना प्रेम भर दूँ,
मैंने अनसुना कर दिया
मेरी ज़िद थी कि सिर्फ़ तुमको सुनूँ
जाने क्यों मन में यकीन था कि
तुममें मेरा प्रेम भरा हुआ है
अब तो जो है बस
मेरी असफल कोशिश
ख़ुद पर क्रोध भी है और क्षोभ भी
ये मैंने क्या कर लिया
तुम तक जाने का अंतिम रास्ता
ख़ुद ही बंद कर दिया
सच है प्रेम ऐसे नहीं होता
यह सब तक़दीर की बातें हैं
और अपनी तक़दीर उस दिन
मैं मंदिर में तोड़ आई
तुम भी हो मंदिर भी और ईश्वर भी
पर अब हम सब ख़ामोश हैं

- जेन्नी शबनम (19. 4. 2011)
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रविवार, 24 अप्रैल 2011

234. चाँद के होठों की कशिश

चाँद के होठों की कशिश

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चाँद के होठों में जाने क्या कशिश है
सम्मोहित हो जाता है मन
एक जादू-सा असर है
मचल जाता है मन
अँधेरी रात में हौले-हौले
क़दम-क़दम चलते हुए
चाँदनी रात में चुपचाप निहारते हुए
जाने कैसा तूफ़ान आ जाता है
समुद्र में ज्वार भाटा उठता है जैसे
ऐसा ही कुछ-कुछ हो जाता है मन 
कहते हैं चाँद की तासीर ठंडी होती है
फिर कहाँ से आती है इतनी ऊष्णता
जो बदन को धीमे-धीमे
पिघलाती है
फिर भी सुकून पाता है मन
उसकी चाँदनी या चुप्पी
जाने कैसे मन में समाती है
नहीं मालूम ज़िन्दगी मिलती है
या कहीं कुछ भस्म होता है
फिर भी चाँद के संग
घुल जाना चाहता है मन

- जेन्नी शबनम (23. 4. 2011)
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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

233. हथेली ख़ाली है

हथेली ख़ाली है

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मेरी मुट्ठी से आज फिर कुछ गिर पड़ा 
लगता है शायद यह अन्तिम बार है   
अब कुछ नहीं बचा है गिरने को 
मेरी हथेली ख़ाली पड़ चुकी है

अचरज नहीं पर कसक है 
कहीं गहरे में काँटों की चुभन है  
क़तरा-क़तरा वक़्त है, जो गिर पड़ा 
या कोई अल्फ़ाज़, जो दबे थे मेरे सीने में 
और मैंने जतन से छुपा लिए थे मुट्ठी में 
कभी तुम दिखो, तो तुमको सौंप दूँ  

पर अब यह मुमकिन नहीं 
वक़्त के बदलाव ने बहुत कुछ बदल दिया है 
अच्छा ही हुआ, जो मेरी हथेली ख़ाली हो चुकी है 
अब खोने को कुछ नहीं रहा  

- जेन्नी शबनम (18.4.2011)
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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

232. ज़िद्दी हूँ

ज़िद्दी हूँ

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जाने किस सफ़र पर ज़िन्दगी चल पड़ी है
न मक़सद का पता न मंज़िल का ठिकाना है
अब तो रास्ते भी याद नहीं
किधर से आई थी किधर जाना है
बहुत दूर निकल गए तुम भी
इतना कि मेरी पुकार भी नहीं पहुँचती 
इस सच से वाक़िफ़ हूँ और समझती भी हूँ
साथ चलने के लिए तुम साथ चले ही कब थे
मान रखा मेरी ज़िद का तुमने
और कुछ दूर चल दिए थे साथ मेरे
क्या मानूँ?
तुम्हारा एहसान या फिर
महज़ मेरे लिए ज़रा-सी पीड़ा
नहीं-नहीं, कुछ नहीं
ऐसा कुछ न समझना
तुम्हारा एहसान मुझे दर्द देता है
प्रेम के बिना सफ़र नहीं गुज़रता है
तुम भी जानते हो और मैं भी
मेरे रास्ते तुमसे होकर ही गुज़रेंगे
भले रास्ते न मिले
या तुम अपना रास्ता बदल लो
पर मेरे इंतज़ार की इंतिहा देखना
मेरी ज़िद भी और मेरा जुनून भी
इंतज़ार रहेगा
एक बार फिर से
पूरे होशो हवास में तुम साथ चलो
सिर्फ़ मेरे साथ चलो 
जानती हूँ
वक़्त के साथ मैं भी अतीत हो जाऊँगी
या फिर वह
जिसे याद करना कोई मज़बूरी हो
धूल जमी तो होगी 
पर उन्हीं नज़रों से तुमको देखती रहूँगी
जिससे बचने के लिए
तुम्हारे सारे प्रयास अकसर विफल हो जाते रहे हैं 
उस एक पल में
जाने कितने सवाल उठेंगे तुममें
जब अतीत की यादें
तुम्हें कटघरे में खड़ा कर देंगी
कुसूर पूछेगी मेरा
और तुम बेशब्द ख़ुद से ही उलझते हुए
सूनी निगाहों से सोचोगे -
काश! वो वक़्त वापस आ जाता
एक बार फिर से सफ़र में मेरे साथ होती तुम
और हम एक ही सफ़र पर चलते
मंज़िल भी एक और रास्ते भी एक
जानते हो न
बीता वक़्त वापस नहीं आता
मुझे नहीं मालूम मेरी वापसी होगी या नहीं
या तुमसे कभी मिलूँगी या नहीं
पर इतना जानती हूँ
मैं बहुत ज़िद्दी हूँ!

- जेन्नी शबनम (13. 4. 2011)
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

231. ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है (तुकांत)

ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है

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पहली साँस से अंतिम साँस तक का, सफ़र जारी है
कौन मिला कौन बिछड़ा, ज़ेहन में तस्वीर सारी है

सपनों का पलना और फिर टूटना, ज़ख़्म तो है बहुत
किससे करूँ गिला शिकवा, सच मेरी तक़दीर हारी है

एक रोज़ मिला था कोई मुसाफ़िर, राहों में तन्हा-तन्हा
साथ चले कुछ रोज़ फिर कह गया, मेरी हर शय ख़ारी है 

नहीं इस मर्ज़ का इलाज़, बेकार गई दुआ तीमारदारी
थक गए सभी, अब कहते कि अल्लाह की वो प्यारी है 

ख़ुद से एक जंग छिड़ी, तय है कि फ़ैसला क्या होना
लहूलुहान फिर भी, ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है 

नहीं रुकती दुनिया वास्ते किसी के, सच मालूम है मुझे
शायद तक़दीर के खेल में हारना, मेरी ही सभी पारी है

जीने की ख़्वाहिश मिटती नहीं, नए ख्व़ाब हूँ सजाती
ज़ाहिर ही है हर पल होती, ज़िन्दगी से मारा-मारी है

इस जहाँ को कभी हुआ नहीं, उस जहाँ को हो दरकार
हर नाते तोड़ रही 'शब', यहाँ से जाने की पूरी तैयारी है

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2010)
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रविवार, 10 अप्रैल 2011

230. सपने (तुकांत)

सपने

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उम्मीद के सपने बार-बार आते हैं
न चाहें फिर भी आस जगाते हैं

चाह वही अभिलाषा भी वही
सपने हर बार बिखर जाते हैं

उल्लसित होता है मन हर सुबह
साँझ ढले टूटे सपने डराते हैं

आओ देखें कुछ ऐसे सपने
जागती आँखों को जो सुहाते हैं

'शब' कैसे रोके रोज़ आने से
सपने आँखों को बहुत भाते हैं

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2011)
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