Wednesday, May 20, 2009

58. कविता ख़ामोश हो गई है...

कविता ख़ामोश हो गई है...

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कविता तो पल-पल बनती है
मन पर शाया होती है,
उतार सकूँ कागज़ पर
रोशनाई की पहचान, अब मुझसे नहीं होती !
मन की दशा का अब कैसा ज़िक्र
कविता ख़ामोश हो गई है !

कविता कैसे लिखूँ ?
सफ़ेद रंगों से, सफ़ेद कागज़ पर, शब्द नहीं उतार पाती,
रंगों की भाषा कोई कैसे पहचाने
जब कागज़ रंगहीन दिखता हो !
किसी के मन तक पहुँचा सकूँ
जाने क्यों, कभी-कभी मुमकिन नहीं होता !

एक अनोखी दुनिया में
वक़्त को दफ़न कर आई हूँ,
खो आई हूँ कुछ अपना
जाने क्यों, अब ख़ुद को दगा देती हूँ !
मन की उपज, वक़्त की कोख में दम तोड़ देती है
ज़िन्दगी और वक़्त का बही-खाता भी वहीं छोड़ आई हूँ !

- जेन्नी शबनम (मई 19, 2009)

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