रविवार, 26 जुलाई 2020

680. पहचाना जाएगा

पहचाना जाएगा

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वक़्त मुट्ठी से फिसलता, जीवन कैसे पहचाना जाएगा   
कौन किसको देखे यहाँ, कोई कैसे पहचाना जाएगा!   

ज़मीर कब कहाँ मरा, ये अब दिखाएगा कौन भला   
हर शीशे में कालिख पुता, चेहरा कैसे पहचाना जाएगा!   

कौन किसका है सगा, भला यह कौन किसको बताएगा   
आईने में अक्स जब, ख़ुद का ही न पहचाना जाएगा!   

टुकड़ों-टुकड़ों में ज़िन्दगी बीती, किस्त-किस्त में साँसें   
पुरसुकून जीवन भला, अब कैसे ये पहचाना जाएगा!   

रूठ गए सब अपने-पराए, हर ठोकर याद दिलाएगी   
अपने पराए का भेद अब, 'शब' से न पहचाना जाएगा! 

- जेन्नी शबनम (26. 7. 2020) 
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सोमवार, 20 जुलाई 2020

679. चिड़िया फूल या तितली होती (चोका - 13)

चिड़िया फूल या तितली होती 

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अक्सर पूछा   
खुद से ही सवाल   
जिसका हल   
नहीं किसी के पास,   
मैं ऐसी क्यों हूँ ?   
मैं चिड़िया क्यों नहीं   
या कोई फूल   
या तितली ही होती,   
यदि होती तो   
रंग-बिरंगे होते   
मेरे भी रूप   
सबको मैं लुभाती   
हवा के संग   
डाली-डाली फिरती   
खूब खिलती   
उड़ती औ नाचती,   
मन में द्वेष   
खुद पे अहंकार   
कड़वी बोली   
इन सबसे दूर   
सदा रहती   
प्रकृति का सानिध्य   
मिलता मुझे   
बेख़ौफ़ मैं भी जीती   
कभी न रोती   
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी   
खूब जीती   
हँसती ही रहती   
कभी न मुरझाती !

- जेन्नी शबनम (20. 7. 2020)
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बुधवार, 8 जुलाई 2020

678. इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

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दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
मिले गर कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अंत है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट है या संत है   
बस इंसान नहीं है, प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना   
मत सोचो देस परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसा कर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना तुम   
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढ कर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी जरूरतें   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बीताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तकदीर की यही पुकार है   
कोई उम्मीद नहीं कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जनम का इतना ही इंतजाम है   
बाकी सब अगले जन्म का ख्वाब है   
निपट जाए जीवन-भँवर   
बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन   
दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर   
फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2020) 
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बुधवार, 1 जुलाई 2020

677. सँवरने नहीं देती

सँवरने नहीं देती

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दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !   

मसला तो हल न हुआ बस चलते ही रहे   
थक गए पर ये ज़िन्दगी थमने नहीं देती !   

वक़्त के ताखे पे रखी रही उम्र की बाती   
किस्मत गुनहगार ज़िन्दगी जलने नहीं देती !   

अब रूसवाई क्या और भला किससे करना   
चाक-चाक दिल मगर आँसू बहने नहीं देती !   

मेरे वास्ते अपनों की भीड़ ने कजा को पुकारा   
शब से रूठी है कजा उसको मरने नहीं देती !   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2020) 
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