शनिवार, 16 नवंबर 2019

639. धरोहर

धरोहर   

*******   

मेरी धरोहरों में कई ऐसी चीज़ें हैं   
जो मुझे बयान करती हैं   
मेरी पहचान करती हैं   
कुछ पुस्तकें जिनमें लेखकों के हस्ताक्षर   
और मेरे लिए कुछ संदेश है   
कुछ यादगार कपड़े जिसे मैंने   
किसी ख़ास वक़्त पर लिए या पहने हैं   
कुछ छोटी-छोटी परची जिनपर   
मेरे बच्चों की आड़ी तिरछी लकीरों में   
मेरा बचपन छुपा हुआ है   
अनलिखे में गुज़रा कल लिखा हुआ है   
कुछ नाते जिसे किस्मत ने छीने   
उनकी यादों का दिल में ठिकाना है   
कुछ अपनों का छल भी है   
जिससे मेरा सीना छलनी है   
कुछ रिश्ते जो मेरे साथ तब भी होते हैं   
जब हार कर मेरा दम टूटने को होता है   
साँसों से हाथ छूटने को होता है   
कुछ वक़्त जब मैंने जीभर कर जिया है   
बहुत शिद्दत से प्रेम किया है   
यूँ तब भी अँधेरों का राज था   
पर ख़ुद पर यक़ीन किया था   
ये धरोहरें मेरे साथ विदा होंगी जब कजा आएगी   
मेरे बाद न इनका संरक्षक होगा   
न कोई इनका ख़्वाहिशमंद होगा   
मेरे सिवा किसी को इन से मुहब्बत नहीं होगी   
मेरी किसी धरोहर की वसीयत नहीं होगी   
मेरी धरोहरें मेरी हैं बस मेरी   
मेरे साथ ही विदा होंगी।   

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2019)   

___________________________________

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

638. महज़ नाम

महज़ नाम 

*******   

कभी लगता था कि किसी के आँचल में   
हर वेदना मिट जाती है   
मगर भाव बदल जाते हैं   
जब संवेदना मिट जाती है   
न किसी प्यार का ना अधिकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं   
महज पुकार का एक नाम है   
तासीर खो चुका है   
बेकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं   
महज पुकार का एक नाम है!   

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2019)   

____________________________________   

बुधवार, 6 नवंबर 2019

637. रेगिस्तान

रेगिस्तान 

*******   

आँखें अब रेगिस्तान बन गई हैं 
यहाँ अब न सपने उगते हैं न बारिश होती है 
धूलभरी आँधियाँ चल रही हैं 
रेत पे गढ़े वे सारे हर्फ मिट गए हैं 
जिन्हें सदियों पहले 
किसी ऋषि ने लिख दिया था कि 
कभी कोई दुष्यंत सब विस्मृत कर दे तो 
शंकुतला यहाँ आकर सारा अतीत याद दिलाए 
पर अब कोई स्रोत शेष न रहा 
जो जीवन को वापस बुलाए 
कौन किसे अब क्या याद दिलाए ! 

- जेन्नी शबनम (6. 11. 2019)
___________________________________