Thursday, December 15, 2011

जाने कहाँ गई वो लड़की...

जाने कहाँ गई वो लड़की...

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सफ़ेद झालर वाली फ्राक पहने
जिसपे लाल लाल फूल सजे,
उछलती-कूदती
जाने कहाँ गई वो लड़की !
बकरी का पगहा थामे
खेतों के डरेर पर भागती,
जाने क्या-क्या सपने बुनती
एक अलग दुनिया उसकी !
भक्तराज को भकराज कहती
क्योंकि क-त संयुक्त में 'क' दीखता है,
उसके अपने तर्क
अज़ब जिद्दी लड़की !
बात बनाती खूब
पालथी लगा कर बैठती,
कलम दवात से लिखती रहती
निराली दुनिया उसकी !
एक रोज़ सुना शहर चली गई
गाँव की ख़ुशबू साथ ले गई,
उसके सपने उसकी दुनिया
कहीं खो गई लड़की !
साँकल की आवाज़
किवाड़ी की चरचराहट,
जानती हूँ वो नहीं
पर इंतज़ार रहता अब भी !
शायद किसी रोज़ धमक पड़े
रस्सी कूदती-कूदती,
दही-भात खाने को मचल पड़े
वो चुलबुली लड़की !
जाने कहाँ गई
वो मानिनी मतवाली,
शायद शहर के पत्थरों में चुन दी गई
उछलती-कूदती वो लड़की !
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पगहा- गले में बँधी रस्सी
दरेर - मेंड़
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- जेन्नी शबनम (नवम्बर 14, 2011)

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