Friday, 27 July 2018

580. गुमसुम प्रकृति (प्रकृति पर 10 सेदोका)

गुमसुम प्रकृति
(प्रकृति पर 10 सेदोका)   

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1.   
अपनी व्यथा   
गुमसुम प्रकृति   
किससे वो कहती   
बेपरवाह   
कौन समझे दर्द   
सब स्वयं में व्यस्त।   

2.   
वन, पर्वत   
सूरज, नदी, पवन   
सब हुए बेहाल   
लड़खड़ाती   
साँसें सबकी डरी   
प्रकृति है लाचार।   

3.   
कौन है दोषी?   
काट दिए हैं वन   
उगा कंक्रीट-वन   
मानव दोषी   
मगर है कहता -   
प्रकृति अपराधी।   

4.   
दोषारोपण   
जग की यही रीत   
कोई न जाने प्रीत   
प्रकृति तन्हा   
किस-किस से लड़े   
कैसे ज़खम सिले।   

5.   
नदियाँ प्यासी   
दुनिया ने छीनी है   
उसका मीठा पानी,   
करो विचार   
प्रकृति है लाचार   
कैसे बुझाए प्यास।   

6.   
बाँझ निगोड़ी   
कुम्हलाई धरती   
नि:संतान मरती   
सूखा व बाढ़   
प्रकृति का प्रकोप   
धरा बेचारी।   

7.   
सब रोएँगे   
साँसें जब घुटेंगी   
प्रकृति भी रोएगी,   
वक्त है अभी   
प्रकृति को बचा लो   
दुनिया को बसा लो।   

8.   
विषैले नाग   
ये कल कारखाना   
ज़हर उगलते   
साँसें उखड़ी   
ज़हर पी-पी कर   
प्रकृति है मरती।   

9.   
लहूलुहान   
खेत व खलिहान   
माँगता बलिदान   
रक्त पिपासु   
खुद मानव बना   
धरा का खून पिया।   

10.   
प्यासी नदियाँ   
प्यासी तड़पे धरा   
प्रकृति भी है प्यासी,   
छाई उदासी,   
अभिमानी मानव   
विध्वंस को आतूर।   

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2018)

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Sunday, 22 July 2018

579. तपता ये जीवन (10 ताँका)

तपता ये जीवन 
(10 ताँका)   

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1.   
अँजुरी भर   
सुख की छाँव मिली   
वह भी छूटी   
बच गया है अब   
तपता ये जीवन।   

2.   
किसे पुकारूँ   
सुनसान जीवन   
फैला सन्नाटा,   
आवाज घुट गई   
मन की मौत हुई।   

3.   
घरौंदा बसा   
एक-एक तिनका   
मुश्किल जुड़ा,   
हर रिश्ता विफल   
ये मन असफल।   

4.   
क्यों नहीं बनी   
किस्मत की लकीरें   
मन है रोता,   
पग-पग पे काँटे   
आजीवन चुभते।   

5.   
सावन आया   
पतझर-सा मन   
नहीं हर्षाया,   
काश! जीवन होता   
गुलमोहर-गाछ।   

6.   
नहीं विवाद   
मालूम है, जीवन   
क्षणभंगूर   
कैसे न दिखे स्वप्न   
मन नहीं विपन्न।   

7.   
हवा के संग   
उड़ता ही रहता   
मन-तितली   
मुर्झाए सभी फूल   
कहीं मिला न ठौर।   

8.   
तड़प रहा   
प्रेम की चाहत में   
मीन-सा मन,   
प्रेम लुप्त हुआ, ज्यों   
अमावस का चाँद।   

9.   
जो न मिलता   
सिरफिरा ये मन   
वही चाहता   
हाथ पैर मारता   
अंतत: हार जाता।   

10.   
स्वप्न-संसार   
मन पहरेदार   
टोकता रहा,   
जीवन से खेलता 
दिमाग अलबेला।   

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2018) 
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Wednesday, 18 July 2018

578. उनकी निशानी...

उनकी निशानी...  

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आज भी रखी हैं  
बहुत सहेज कर  
अतीत की कुछ यादें  
कुछ निशानियाँ  
कुछ सामान  
टेबल, कुर्सी, पलंग, बक्सा  
फूल पैंट, बुशर्ट और घड़ी  
टीन की पेटी   
एक पुराना बैग  
जिसमें कई जगह मरम्मत है  
और एक डायरी  
जिसमें काफ़ी कुछ है  
हस्तलिखित  
जिसे लिखते हुए  
उन्होंने सोचा भी न होगा कि  
यह निशानी बन जाएगी  
हमलोगों के लिए बच जाएगा  
बहुत कुछ थोड़ा-थोड़ा  
जिसमें पिता हैं पूरे के पूरे  
और हमारी यादों में आधे-अधूरे  
कुछ चिट्ठियाँ भी हैं  
जिनमें रिश्तों की लड़ी है  
जीवन-मृत्यु की छटपटाहट है  
संवेदनशीलता है  
रूदन है  
क्रंदन है  
जीवन का बंधन है  
उस काले बैग में  
उनके सुनहरे सपने हैं  
उनके मिज़ाज हैं  
उनकी बुद्धिमता है  
उनके बोये हुए फूल हैं  
जो अब बोन्जाई बन गए  
सब स्थिर है  
कोई कोहराम नहीं  
बहुत कुछ अनकहा है  
जिसे अब हमने पूरा-पूरा जाना है  
उनकी निशानियों में  
उनको तलाशते-तलाशते  
अब समझ आया  
मैं ही उनकी यादें हूँ  
मैं ही उनके सपने हूँ  
मेरा पूरा का पूरा वजूद  
उनकी ही तो निशानी है  
मैं उनकी निशानी हूँ।  

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2018)  
(पापा की 40 वीं पुण्यतिथि पर)
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Tuesday, 10 July 2018

577. रंगरेज हमारा (चोका - 2)

रंगरेज हमारा   

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सुहानी संध्या   
डूबने को सूरज   
देखो नभ को 
नारंगी रंग फैला   
मानो सूरज   
एक बड़ा संतरा   
साँझ की वेला   
दीया-बाती जलाओ   
गोधूली-वेला 
देवता को जगाओ,   
ऋचा सुनाओ,   
अपनी संस्कृति को   
मत बिसराओ,   
शाम होते ही जब   
लौटते घर   
विचरते परिंदे   
गलियाँ सूनी   
जगमग रोशनी   
वो देखो चन्दा   
हौले-हौले मुस्काए   
साँझ ढले तो   
सूरज सोने जाए   
तारे चमके   
टिम-टिम झलके   
काली स्याही से   
गगन रंग देता   
बड़ा सयाना   
रंगरेज हमारा   
सबका प्यारा   
अनोखी ये दुनिया   
किसने रची!   
हर्षित हुआ मन   
घर-आँगन   
देख सुन्दर रूप   
चकित निहारते !   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2012)

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Thursday, 5 July 2018

576. भाव और भाषा (चोका - 4)

भाव और भाषा   

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भाषा-भाव का   
आपसी नाता ऐसे   
शरीर-आत्मा   
पूरक होते जैसे,   
भाषा व भाव   
ज्यों धरती-गगन   
चाँद-चाँदनी   
सूरज की किरणें   
फूल-खूशबू   
दीया और बाती   
तन व आत्मा   
एक दूजे के बिना   
सब अधूरे,   
भाव का ज्ञान   
भाव की अभिव्यक्ति   
दूरी मिटाता   
निकटता बढ़ाता,   
भाव के बिना   
सम्बन्ध हैं अधूरे   
बोझिल रिश्ते   
सदा कसक देते   
फिर भी जीते   
शब्द होते पत्थर   
लगती चोट   
घुटते ही रहते,   
भाषा के भाव   
हृदय का स्पंदन   
होते हैं प्राण   
बिन भाषा भी जीता   
मधुर रिश्ता   
हों भावप्रवण तो   
बिन कहे ही   
सब कह सकता   
गुन सकता,   
भाव-भाषा संग जो   
प्रेम पगता   
हृदय भी जुड़ता   
गरिमा पाता   
नज़दीकी बढ़ती   
अनकहा भी   
मन समझ जाता   
रिश्ता अटूट होता !  

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 18, 2012)

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