Monday, January 10, 2011

तुममें अपनी ज़िन्दगी...

तुममें अपनी ज़िन्दगी...

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सोचती हूँ
कैसे तय किया होगा तुमने
ज़िन्दगी का वो सफ़र
जब तन्हा ख़ुद में जी रहे थे तुम
और ख़ुद से हीं एक लड़ाई लड़ रहे थे !

जानती हूँ मैं
उस सफ़र की पीड़ा
और वाकिफ़ भी हूँ उस दर्द से
जब भीड़ में कोई तन्हा रह जाता है
और नहीं होता कोई अपना
जिससे बाँट सके ख़ुद को !

तुम्हारी हार
मैं नहीं सह सकती
और तुम
मेरी आँखों में आंसू,
चलो कोई नयी राह तलाशते हैं
साथ न सही दूर दूर हीं चलते हैं,
बीती बातें
मैं भी छोड़ देती हूँ
और तुम भी ख़ुद से
अलग कर दो अपना अतीत,
तुम मेरी आँखों में हँसी भरना
और मैं तुममें अपनी ज़िन्दगी...

__ जेन्नी शबनम __ ७. १. २०११

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