Sunday, March 8, 2009

36. एक गीत तुम गाओ न...

एक गीत तुम गाओ न...

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एक गीत तुम गाओ न
एक ऐसा गीत गाओ कि -

मेरे पाँव उठ चल पड़े, घायल पड़े हैं कब से
हाथों में ताकत आ जाए, छीन लिए गए हैं बल से
पंख फिर उग जाए, क़तर दिए गए हैं छल से
सपनों को ज़मीं मिल जाए, उजाड़े गए हैं सदियों से
आत्मा जी जाए, मारी गई है युगों से । 

तुम ऐसा गीत गाओगे न ?
एक ऐसा गीत ज़रूर गाना !

मैं रहूँ न रहूँ
पर तुम्हारे गीत से जब भी कोई जी उठे -

मैं उसके मन में जन्मूँगी
तुम्हारे गीत गुनगुनाऊँगी
स्वछंद आकाश में उडूँगी
प्रेम का जहां बसाऊँगी
युगों से बेजान थी, सदियों तक जीऊँगी । 

तुम गाओगे न ऐसा एक गीत ?
मेरे लिए गा दो न एक गीत ! 

- जेन्नी शबनम (मार्च 8, 2009)
(महिला दिवस पर)

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35. कल रात...

कल रात...

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कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

तुम सुनो कि न सुनो, ये मैंने सोचा नहीं
तुम जवाब न दोगे, ये भी मैंने सोचा नहीं,
तुम मेरे पास न थे, तुम मेरे साथ तो थे । 

कल हमारे साथ, रात भी जागी थी
वक़्त भी जागा, और रूह भी जागी थी,
कल तमाम रात, मैंने तुमसे बातें की थी । 

कितना खुशगवार मौसम था
रात की स्याह चादर में
चाँदनी लिपट आई थी
और तारे खिल गए थे । 

हमारी रूहों के बीच
ख़्यालों का काफ़िला था
सवालों जवाबों की, लम्बी फ़ेहरिस्त थी
चाहतों की, लम्बी कतार थी । 

तुम्हारे शब्द ख़ामोश थे
तुम सुन रहे थे न
जो मैंने तुमसे कहा था !

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

तुम्हें हो कि न हो याद
पर, मेरे तसव्वुर में बस गई
कल की हमारी हर बात
कल की हमारी रात । 

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 1, 2009)

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34. कुछ पता नहीं...

कुछ पता नहीं...

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बेइंतेहा जीने के जुनून में
ज़िन्दगी कब कहाँ छूट गई
कुछ होश नहीं । 

कारवाँ आता रहा, जाता रहा
कोई अपना, कब बिछुड़ा
कुछ ख़बर नहीं । 

न मेरी ज़िद की बात थी, न तुम्हारी ज़िद की
ज़िन्दगी कब, ज़िल्लत बन गई
कुछ समझ नहीं । 

सागर के दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी बँट गई
रोक सकूँ, दम नहीं । 

तूफ़ानों की गर्द
हमारे दिलों में, कब बस गई
हमें एहसास भी नहीं । 

हम भटक गए, कब, क्यों, भटक गए
कोई अंदाजा नहीं
कुछ पता नहीं । 

ज़िन्दगी रूठ गई, बस रूठ गई
दर्द है, शिकवा है, खुद से है
कुछ तुमसे नहीं । 

तुम्हें हो कि न हो, मुझे है
गिला है, शिकायत है,
क्या तुम्हें कुछ नहीं ?

- जेन्नी शबनम (मार्च 7, 2009)

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