Friday, September 9, 2016

528. देर कर दी...

देर कर दी...   

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हाँ ! देर कर दी मैंने   
हर उस काम में जो मैं कर सकती थी   
दूसरों की नज़रों में  
ख़ुद को ढालते-ढालते  
सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने सारे हुनर   
दराज में बटोर कर रख दी   
दुनियादारी से फ़ुर्सत पाकर   
करूँगी कभी मन का।  

अंतत: अब   
मैं फिजुल साबित हो गई  
रिश्ते सहेजते-सहेजते  
ख़ुद बिखर गई  
साबुत कुछ नहीं बचा  
न रिश्ते न मैं न मेरे हुनर।  

मेरे सारे हुनर   
चीख़ते-चीख़ते दम तोड़ गए  
बस एक दो जो बचे हैं   
उखड़ी-उखड़ी साँसें ले रहे हैं   
मर गए सारे हुनर के क़त्ल का  
इल्ज़ाम मुझको दे रहे है  
मेरे क़ातिल बन जाने का सबब  
वे मुझसे पूछ रहे हैं।  

हाँ ! बहुत देर कर दी मैंने  
दुनिया को समझने में  
ख़ुद को बटोरने में  
अर्धजीवित हुनर को  
बचाने में।   

हाँ ! देर तो हो गई  
पर सुबह का सूरज  
अपनी आँच मुझे दे रहा है  
अंधेरों की भीड़ से  
खींच कर मुझे  
उजाला दे रहा है।  

हाँ ! देर तो हो गई मुझसे  
पर अब न होगी   
नहीं बचा वक़्त  
मेरे पास अब  
जो भी बच सका है  
रिश्ते या हुनर   
सबको एक नई उम्र दूँगी   
हाँ ! अब देर न करूँगी।   

- जेन्नी शबनम (9. 9. 2016)

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