Monday, June 29, 2009

66. आख़िर क्यों ?...

आख़िर क्यों ?...

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बेअख्तियार दौड़ी थी
जाने क्यों ?
कुछ पाने या खोने
जाने क्यों ?
कुछ लम्हों की सौगात मिली
साथ दर्द इक इनाम मिला,
अंहकार की घोर टकराहट थी
और भय की अखंडित दीवार थी,
पाट सकी न अपना संशय
जता सकी न अपना आशय,
पाप-पुण्य से परे प्यासे तन
सत्य-असत्य से विचलित मन,
बाँट सकी न अपनी निराशा
दिला सकी न कोई आशा,
थम सकी न मेरी राहें
थाम सकी न कोई बाहें,
बेतहाशा भागी थी
आख़िर क्यों ?
क्या पाया क्या खो आई
आख़िर क्यों ?

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 2008)

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Friday, June 26, 2009

65. सपनों के उपले...

सपनों के उपले...

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अपने सपनों से
कुछ उपले बनाई हूँ,
उपलों को सुलगाकर
जीवन सेंक रही हूँ,
कहीं मेरी ज़िन्दगी
जम न जाए । 

मन को भूख़ जब सताती है
उपलों को दहकाकर
ख़्वाहिशों का खाना पकाती हूँ,
कहीं आत्मा
भूखी मर न जाए । 

अकेलेपन की व्याकुलता
जब तड़पाती है
उपलों को धधकाकर
जीवन का सन्देश तलाशती हूँ,
कहीं ज़िन्दगी
और बोझिल न हो जाए । 

जीवन का अँधियारा
जब डराता है
उपलों को जलाकर
उजाला तलाशती हूँ,
कहीं भटक कर
मंज़िल खो न जाए । 

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 2005)

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Wednesday, June 24, 2009

64. कृष्ण ! एक नई गीता लिखो...

कृष्ण ! एक नई गीता लिखो...

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फ़र्क नहीं पड़ता तुम्हें, जब निरीह मानवता, बेगुनाह मरती है,
फ़र्क पड़ता है तुम्हें, जब कोई तुम्हारे आगे, सिर नहीं नवाता है । 
जाने कितना कच्चा धर्म है तुम्हारा, किसी की अवहेलना से उबल जाता है,
निरपराधों की आहुति से मन नहीं भरता, अबोधों का बलिदान चाहता है । 

जो कलंक हैं मानवता के, उनपर ही अपनी कृपा दिखाते हो,
जो इंसानी धर्म निभाते, उन्हें जीते जी तुम नरक दिखाते हो । 
तुमने कहा था, जो तुम चाहो वही होता, इशारे से तुम्हारे चलती है दुनिया,
तुम्हारी इच्छा के विपरीत, कोई क्षण भी न गुजरता, न ही दुनिया की रीत है बदलता । 

फिर क्या समझूँ, ये तुम्हारी लीला है ?
हिंसा और अत्याचार का, ये तुम्हें कैसा नशा है ?
विपदाओं के पहाड़ तले, दिलासा का झूठा भ्रम, क्यों देते हो ?
पाखंडी धर्म-गुरुओं का ऐसा कौम क्यों उपजाते हो ?

कैसे कहते हो तुम, कि कलियुग में ऐसा ही घोर अनर्थ होगा,
क्या तुम्हारे युग में आतंक और अत्यचार न हुआ था ?
तुम तो ईश्वर हो, फिर क्यों जन्म लेना पड़ा था तुम्हें सलाखों के अंदर ?
कहाँ थी तुम्हारी शक्ति, जब तुम्हारी नवजात बहनों की निर्मम हत्या होती रही ?

औरत को उस युग में भी, एक वस्तु बना कर पाँच मर्दों में बाँट दिया,
अर्धनग्न नारी को जग के सामने शर्मसार कर, ये कैसा खेल दिखाया ?
कौरव-पांडव का युद्ध करा कर, रिश्तों को दुश्मनी का पाठ सिखाया,
अपनों की हत्या करने का, संसार का ये कैसा अजब रूप दिखाया ?

क्या और कोई तरीका नहीं था ?
रिश्तों की परिभाषा का ?
जीवन के दर्शन का ?
समाज के उद्धार का ?
विश्व के विघटन का ?
तुम्हारी शक्ति का ?
उस युग के अंत का ?

धर्म-जाति सब बँट चुके, रिश्तों का भी कत्ल हुआ,
तुम्हारी सत्ता में था अँधियारा फैला, फिर मानव से कैसे उम्मीद करें?
द्वापर का जो धर्म था, वो तुम्हारे समय का सत्य था,
अब अपनी गीता में, इस कलियुग की बात कहो ! 

कृष्ण ! आओ, इस युग में आकर इंसानी धर्म सिखाओ,
अवतरित होकर, एक बार फिर जगत का उद्धार करो !
प्रेम-सद्भाव का संसार रचा कर, एक नया युग बसाओ,
आज के युग के लिए, समकालीन एक नयी गीता लिखो ! 

- जेन्नी शबनम (जून 24, 2009)

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Friday, June 12, 2009

63. बारिश... / Baarish...

बारिश...

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बारिश में भीगने से, हुई जो मेरी मनाही
क्या करूँ, मदमस्त घनघोर घटा छा गयी,
जाऊँ कहाँ, अब किस-किस घर में लूँ पनाह
कहीं जाने से पहले, मेरे घर की छत चू पड़ी । 

ठंडी फुहारों संग, हर ग़म है उघड़ता
बरसती बूँदों में, आँसू भी तो है छुपता,
रिमझिम-रिमझिम बादल, यूँ है गरजता बरसता
जैसे तड़प के रो दिया हो, आसमान बेसाख्ता । 

बरखा की बूँदों संग, मन यूँ है लरजता
छुप जाऊँ जैसे, हो सीना महबूब का,
बरखा में भीगता है तन, मन यूँ है मचलता
आगोश में जैसे, पिघलता है बदन, महबूब का । 

वो तो कहते हैं, ये तमाम उम्र की है, मेरी सज़ा
अब कैसे कहूँ कि बारिश से, मुझे प्यार है कितना,
भीगूँगी तो फिर भी, जैसे भीगती रही हूँ सदा
अब उनसे न कहूँगी, मन में क्या-क्या है बसा । 

- जेन्नी शबनम (अगस्त, 2008)

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Baarish...

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Baarish mein bhigne se, hui jo meri manaahi
Kya karoon, madmast ghanghore ghata chha gai,
Jaaoon kahaan, ab kis-kis ghar mein lun panaah
Kahin jaane se pahle, mere ghar kee chhat choo padi.

Thandee fuhaaron sang, har gam hai ughadta
Barasti boondon mein, aansoo bhi to hai chhupta,
Rimjhim-rimjhim baadal, yun hai garajta barasta
Jaise tadap ke ro diya ho, aasmaan besaakhta.

Barkha kee boondon sang, man yun hai larajta
Chhup jaaoon jaise, ho seena mahboob ka,
Barkha mein bheegta hai tan, man yun hai machalta
Aagosh mein jaise pighalta hai, badan mahboob ka.

Wo to kahte hain, ye tamam umrr ki hai, meri saza
Ab kaise kahoon ki baarish se, mujhe pyar hai kitna,
Bhigoongi to phir bhi, jaise bhigti rahi hoon sada
Ab unse na kahoogi, man mein kya-kya hai basa.

- Jenny Shabnam (August, 2008)

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Thursday, June 4, 2009

62. ख़त...

ख़त...

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इबारत लिख प्रेम की
लिफ़ाफ़े में रख, छुपा देती हूँ,
भेजूँगी ख़त महबूब को । 

पन्नों से फिसल जाते हैं हर्फ़
और प्रेम की जगह छप जाता है दर्द,
जाने कौन बदल देता है ?

कभी न चाहा कि बाँटूँ अपना दर्द
अमानत है, जो ख़ुदा ने दी कि रखूँ सहेजकर,
उसके लिए मुझसा भरोसे मंद, शायद कोई नहीं । 

हैरान हूँ, परेशान हूँ
पैगाम न भेज पाने से, उदास हूँ,
कैसे भेजूँ, दर्द में लिपटा कोई ख़त ?

या खुदा ! हर्फ़ मेरा बदल जाता जो
तक़दीर मेरी क्यों न बदल पाता वो ?
ख़तों के ढ़ेर में, रोज़ इज़ाफा होता है । 

सारे ख़त, अपनी रूह में छुपाती हूँ,
क्यों लिखती हूँ वो ख़त ?
जिन्हें कभी कहीं पहुँचना ही नहीं है । 

अब सारे ख़त, प्रेम या दर्द
मेरे ज़ेहन में रोज़ छपते हैं,
और मेरे साथ ज़िन्दगी जीते हैं । 

- जेन्नी शबनम (दिसंबर, 2008)

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