Tuesday, September 27, 2011

अपशगुन...

अपशगुन...

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उस दिन तुम जा रहे थे
कई बार आवाज़ दी
कि तुम मुड़ो और
मैं हाथ हिला कर तुम्हें विदा करूँ,
लौटने पर तुम कितना नाराज़ हुए
जाते हुए को आवाज़ नहीं देते
अपशगुन होता है,
कितना भी ज़रूरी हो
न पुकारा करूँ तुम्हें !
देखो न
सच में अपशगुन हो गया
पर तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए,
सोचती हूँ
मेरे लिए अपशगुन क्यों हुआ?
तुमने तो कभी भी आवाज़ नहीं दी मुझे !
तुम उस दिन आये थे
अंतिम बार मिलने,
अलविदा कहने के बाद मुड़े नहीं
ज़रा देर को भी रुके नहीं,
जैसे हमेशा जाते हो
चले गए
जैसे कुछ हुआ हीं नहीं!
मैं जानती थी कि
तुम्हारे पास
मेरे लिए
कोई जगह नहीं,
फिर भी एक कोशिश थी
कि शायद...
जानती थी कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी...
तुम मेरी ज़िन्दगी से जा रहे थे
कहीं और ज़िन्दगी बसाने,
मन किया कि तुमको आवाज़ दूँ
तुम रूक जाओ
शायद वापस आ जाओ,
पर
आवाज़ नहीं दे सकती थी
तुम्हारा अपशगुन हो जाता !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 27, 2011)

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