मंगलवार, 28 अगस्त 2018

584. कम्फर्ट ज़ोन

कम्फर्ट ज़ोन...   

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कम्फर्ट ज़ोन के अंदर   
तमाम सुविधाओं के बीच   
तमाम विडम्बनाओं के बीच   
सुख का मुखौटा ओढ़े   
शनै-शनै   
बीत जाता है   
रसहीन जीवन   
हासिल होता है   
महज   
रोटी, कपड़ा, मकान   
बेरंग मौसम   
और रिश्तों की भरमार   
कम्फर्ट जोन के अंदर   
नहीं होती है कोई मंजिल   
अगर है भी तो   
पराई है मंजिल।   
कम्फर्ट जोन से बाहर   
अथाह परेशानियाँ   
मगर असीम संभावनाएँ   
अनेक पराजय   
मगर स्व-अनुभव   
अबूझ डगर   
मगर रंगीन मौसम   
असह्य संग्राम   
मगर अक्षुण्ण आशाएँ   
अपरिचित दुनिया   
मगर बेपनाह मुहब्बत   
अँधेरी राहें   
मगर स्पष्ट मंजिल।   
बेहद कठिन है   
फैसला लेना   
क्या उचित है -   
अपनी मंज़िल या   
कम्फर्ट ज़ोन !   

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2018)   

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