Wednesday, January 26, 2011

पिघलती शब...

पिघलती शब...

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उन कुछ पलों में जब अग्नि के साथ
मैं भी दहक रही थी,
और तुम कह बैठे
क्यों उदास रहती हो?
मुझसे बाँट लिया करो न
अपना अकेलापन,
और ये भी कहे थे तुम कि
एक कविता
मुझपर भी लिखो न !

चाह कर भी तुम्हारी आँखों में
देख न पायी थी,
शायद ख़ुद से हीं डर रही थी
कहीं ख़ुद को तुमसे बांटने की
चाह न पाल लूँ,
या फिर तुम्हारे सामने
कमज़ोर न पड़ जाऊं,
कैसे बांटू अपनी तन्हाई तुमसे
कहीं मेरी आरज़ू
कोई तूफ़ान न ला दे,
मैं कैसे लड़ पाऊँगी
तन्हा इन सब से !

उस अग्नि से पूछना जब
मैं सुलग रही थी,
वो तपिश अग्नि की नहीं थी
तुम थे जो धीरे धीरे
मुझे पिघला रहे थे,
मैं चाहती थी उस वक़्त
तुम बादल बन जाओ
और मुझमें ठंडक भर दो,
मैं नशे में नहीं थी
नशा नस में पसरता है
मेरे ज़ेहन में तो सिर्फ तुम थे,
उस वक़्त मैं पिघल रही थी
और तुम मुझे समेट रहे थे,
शायद कर्तव्य मान
अपना पल मुझे दे रहे थे,
या फिर मेरे झंझावत ने
तुम्हें रोक रखा था
कहीं मैं बहक न जाऊं
और... !

जानती हूँ वो सब भूल जाओगे तुम
याद रखना मुनासिब भी नहीं,
पर मेरे हमदर्द
ये भी जान लो
वो सभी पल मुझपर क़र्ज़ से हैं,
जिन्हें मैं उतारना नहीं चाहती
न कभी भूलना चाहती हूँ,
जानती हूँ अब मुझमें
कुछ और ख्वाहिशें जन्म लेंगी
लेकिन ये भी जानती हूँ
उन्हें मुझे हीं मिटाना भी होगा !

मेरे उन कमज़ोर पलों को विस्मृत न कर देना
भले याद न करना कि कोई ''शब'' जल रही थी,
तुम्हारी तपिश से कुछ पिघल रहा था मुझमें
और तुम उसे समेटने का फ़र्ज़ निभा रहे थे,
ओ मेरे हमदर्द...
तुम समझ रहे हो न मेरी पीड़ा
और जो कुछ मेरे मन में जन्म ले रहा है,
जानती हूँ मैं नाकामयाब रही थी
ख़ुद को ज़ाहिर होने देने में,
पर जाने क्यों अच्छा लगा कि
कुछ पल हीं सही
तुम मेरे साथ थे,
जो महज़ फ़र्ज़ से बंधा
मुझे समझ रहा था !

__ जेन्नी शबनम __ 13. 1. 2011

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