Wednesday, May 4, 2011

हवा खून-खून कहती है...

हवा खून-खून कहती है...

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जाने कैसी हवा चल रही है
न ठंडक देती है न साँसें देती है
बदन को छूती है तो जैसे
सीने में बर्छी सी चुभती है । 

हवा अब बदल गई है
यूँ चीखती चिल्लाती है मानो
किसी नवजात शिशु का दम अभी-अभी टूटा हो
किसी नव ब्याहता का सुहाग अभी-अभी उजड़ा हो
भूख़ से कुलबुलाता बच्चा भूख़-भूख़ चिल्लाता हो
बीच चौराहे किसी का अस्तित्व लुट रहा हो और
उसकी गुहार पर अट्टहास गूँजता हो । 

हवा अब बदल गई है
ऐसे वीभत्स दृश्य दिखाती है मानो
विस्फोट की तेज लपटों के साथ बेगुनाह इंसानी चिथड़े जल रहे हों
ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए लोग घर में कैदी हो गए हों
पलायन की विवशता से आहत कोई परिवार अंतिम साँसें ले रहा हो
खेत-खलिहान जंगल-पहाड़ निर्वस्त्र झुलस रहे हों । 

जाने कैसी हवा है
न नाचती है न गीत गाती है
तड़पती, कराहती, खून उगलती है । 

हवा अब बदल गई है
लाल लहू से खेलती है
बिखेरती है इंसानी बदन का लहू गाँव शहर में
और छिड़क देती है मंदिर-मस्ज़िद की दीवारों पर
फिर आयतें और श्लोक सुनती है । 

हवा अब बदल गई है
अब सांय-सांय नहीं कहती
अपनी प्रकृति के विरुद्ध
खून-खून कहती है,
हवा बदल गई है
खून-खून कहती है । 

- जेन्नी शबनम (20. 4. 2011)

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