Thursday, June 21, 2012

353. कासे कहे...

कासे कहे...

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मद्धिम लौ 
जुगनू ज्यों
वही सूरज
वही जीवन
सब रीता
पर बीता !
जीवन यही
रीत  यही
पीर पराई
भान नहीं
सब खोया 
मन रोया !
कठिन घड़ी
कैसे कटी
मन तड़पे  
कासे कहे
नहीं अपना 
सब पराया !
तनिक पूछो
क्यों चाहे
मूक पाखी
कोई साथी
एक बसेरा
कोई सहारा !

- जेन्नी शबनम (जून 21, 2012)

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Sunday, June 17, 2012

352. ओ मेरे बाबा (पितृ-दिवस पर 5 हाइकु)

ओ मेरे बाबा 
(पितृ-दिवस पर 5 हाइकु)

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1.
ओ मेरे बाबा !
तुम हो गए स्वप्न 
छोड़ जो गए |

2.
बेटी का बाबा
गर साथ न छूटे  
देता हौसला |

3.
तोतली बोली 
जो बिटिया ने बोली 
निहाल बाबा | 

4.
बाबा तो गए 
अब किससे रूठूँ
कौन मनाए?

5.
सिर पे छाँव
कोई भी हो मौसम  
बाबा आकाश |

- जेन्नी शबनम (जून 17, 2012)

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Friday, June 15, 2012

351. मैं कहीं नहीं...

मैं कहीं नहीं...

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हर बार की तरह
निष्ठुर बन 
फिर चले गए तुम
मुझे मेरे प्रश्नों में जलने के लिए छोड़ गए  
वो प्रश्न 
जिसके उत्तर तलाशती हुई मैं
एक बार जैसे नदी बन गई थी 
और बिरहा के आँसू 
बरखा की बूंदों में लपेट-लपेट कर 
नदी में प्रवाहित कर रही थी
और खुद से पूछती रही 
क्या सिर्फ मैं दोषी हूँ?

क्या उस दिन मैंने कहा था कि चलो
चलकर चखें उस झील के पानी को
जिसमें सुना है 
कभी किसी राजा ने 
अपनी प्रेमिका के संग 
ठिठुरते ठण्ड में स्नान किया था 
ताकि काया कंचन सी हो जाए
और अनन्त काल तक वे चिर युवा रहें 

वो पहला इशारा भी तुमने ही किया 
कि चलो चांदनी को मुट्ठी में भर लें
क्या मालूम मुफलिसी के अंधेरों का 
जाने कब जिन्दगी में अँधियारा भर जाए
मुट्ठी खोल एक दूसरे के मुँह पर झोंक देंगे 
होंठ खामोश भी हो 
मगर 
आँखें तो देख सकेंगी एक झलक

और उस दिन भी तो तुम ही थे न
जिसने चुपके से कानों में कहा था
''मैं हूँ न, मुझसे बाँट लिया करो अपना दर्द''
अपना दर्द भला कैसे बाँटती तुमसे
तुमने कभी खुशी को भी सुनना नहीं चाहा
क्योंकि मालूम था तुम्हें 
मेरे जीवन का अमावस
जानती थी  
तुमने कहने के लिए सिर्फ कहा था 
''मैं हूँ न'' 
मानने के लिए नहीं

एक दिन कहा था तुमने  
''वक्त के साथ चलो''
मन में बहुत रंजिश है
तुम्हारे लिए भी और वक्त के लिए भी 
फिर भी चल रही हूँ वक्त के साथ 
रोज रोज प्रतीक्षा की मियाद बढाते रहे तुम
मेरे संवाद और सन्देश फ़िज़ूल होते गए 
वक्त के साथ चलने का मेरा वादा 
अब भी कायम है  
करना सवाल खुद से कभी  
कोई वादा कब तोड़ा मैंने?
वक्त से बाहर कब गयी भला?
क्या उस वक्त मैं वक्त के साथ नहीं चली थी?

कितनी लंबी प्रतीक्षा
और फिर जब सुना
''मैं हूँ न'' 
उसके बाद ये सब कैसे
क्या सारी तहजीब भूल गए?
मेरे सँभलने तक रुक तो सकते थे 
या इतना कह कर जाते 
''मैं कहीं नहीं''
कमसे कम प्रतीक्षा का अंत तो होता 

तुम बेहतर जानते हो 
मेरी जिन्दगी तो तब भी थी तुम्हारे ही साथ
अब भी है तुम्हारे ही साथ
फर्क ये है कि तुम अब भी नहीं जानते मुझे  
और मैं तुम्हें 
कतरा-कतरा जीने में 
सर्वस्व पी चुकी हूँ.

- जेन्नी शबनम (जून 10, 2012)

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Thursday, June 7, 2012

350. पाप-पुण्य...

पाप-पुण्य...

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पाप-पुण्य के फैसले का भार 
क्यों नहीं परमात्मा पर छोड़ते हो  
क्यों पाप-पुण्य की मान्य परिभाषाओं में उलझ
क्षण-क्षण जीवन व्यर्थ गँवाते हो
जबकि परमात्मा की सत्ता पर पूर्ण भरोसा करते हो 

हर बार एक द्वन्द में उलझ जाते हो
और फिर अपने पक्ष की सत्यता को प्रमाणित करने 
कभी सतयुग कभी त्रेता कभी द्वापर तक पहुँच जाते हो 
जबकि कलयुगी प्रश्न भी तुम्हारे ही होते हैं  
और अपने मुताबिक़ पूर्व निर्धारित उत्तर देते हो

एक भटकती ज़िन्दगी बार-बार पुकारती है
बेबुनियाद संदेहों और पूर्व नियोजित तर्क के साथ 
बहुत चतुराई से बच निकालना चाहते हो  
कभी सोचा कि पाप की परिधि में क्या-क्या हो सकते हैं
जिन्हें त्याग कर पुण्य कमा सकते हो

इतना सहज नहीं होता 
पाप-पुण्य का मूल्यांकन स्वयं करना 
किसी का पाप किसी और का पुण्य भी हो सकता है 
निश्चित ही पाप-पुण्य की कसौटी कर्त्तव्य पर टिकी है 
और जिसे पाप माना वास्तव में उससे पुण्य कमा सकते हो !

- जेन्नी शबनम (जून 7, 2012)

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Wednesday, June 6, 2012

349. पंचों का फैसला...

पंचों का फैसला...

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कुछ शब्द उन पंचों के समान
उच्च आसन पर बैठे हैं
जिनके फैसले सदैव निष्पक्ष होने चाहिए
ऐसी मान्यता है, 
सामने 
कुछ अनसुलझे प्रश्न पड़े हैं
विचारार्थ,
वादी प्रतिवादी 
कुछ सबूत 
कुछ गवाह
सैकड़ों की संख्या में 
उद्वेलित भीड़, 
अंततः पंचों का फैसला
निर्विवाद 
निर्विरोध 
उन सबके विरुद्ध 
जिनके पास पैदा करने की शक्ति है
चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो 
बाँट दो
काट दो 
लूट लो...!

- जेन्नी शबनम (जून 6, 2012)

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Friday, June 1, 2012

348. आईने का भरोसा क्यों...

आईने का भरोसा क्यों...

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प्रतिबिम्ब अपना-सा दिखता नहीं 
फिर बार-बार क्यों देखना,
आईने को तोड़ 
निकल आओ बाहर 
किसी भी मौसम को 
आईने के शिनाख्त की ज़रूरत नहीं,
कौन जानना चाहता है 
क्या-क्या बदलाव हुए?
क्यों हुए? 
वक्त की मार थी 
या अपना ही साया साथ छोड़ गया
किसने मन को तोड़ा 
या सपनों को रौंद दिया,
आईने की गुलामी 
किसने सिखाई?
क्यों सिखाई?
जैसे-जैसे वक़्त ने मिजाज़ बदले 
तन बदलता रहा 
मौसम की अफरातफरी 
मन की गुज़ारिश नहीं थी,
फिर 
आईने का भरोसा क्यों?

- जेन्नी शबनम (जून 1, 2012)

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