Wednesday, April 13, 2011

मैं बहुत जिद्दी हूँ...

मैं बहुत जिद्दी हूँ...

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जाने कौन से सफ़र पर ज़िन्दगी चल पड़ी है
न मकसद का पता न मंज़िल का ठिकाना है,
अब तो रास्ते भी याद नहीं
किधर से आई
किधर जाना है,
बहुत दूर निकल गए तुम भी
इतना कि मेरी पुकार भी नहीं पहुँचती|
इस सच से वाकिफ़ हूँ
और समझती भी हूँ,
साथ चलने केलिए
तुम साथ चले हीं कब थे,
मान रखा मेरी जिद्द का तुमने
और कुछ दूर चल दिए थे साथ मेरे|
क्या मानूँ?
तुम्हारा एहसान या फिर
महज़ मेरे लिए ज़रा सी पीड़ा!
नहीं नहीं
कुछ नहीं
ऐसा कुछ न समझना
तुम्हारा एहसान मुझे दर्द देता है,
प्रेम के बिना सफ़र नहीं गुज़रता
तुम भी जानते हो और
मैं भी|
मेरे रास्ते तुमसे होकर हीं गुजरेंगे
इतना तो मैं जानती हूँ,
भले रास्ते न मिले
या तुम अपना रास्ता बदल लो,
पर मेरे इंतज़ार की इन्तेहाँ
देखना
मेरी जिद्द भी और
मेरा जुनून भी,
इंतज़ार रहेगा
एक बार फिर से
पूरे होशो हवास में
तुम साथ चलो
सिर्फ मेरे साथ चलो|
जानती हूँ
वक़्त के साथ मैं भी अतीत हो जाऊँगी
या फिर वो
जिसे याद करना कोई मजबूरी हो,
धूल जमी तो होगी
फिर भी
उन्हीं नज़रों से तुमको देखती हूँगी
जिससे बचने केलिए
तुम्हारे सारे प्रयास अक्सर विफल हो जाते रहे हैं|
उस एक पल में
जाने कितने सवाल उठेंगे तुममें,
जब अतीत की यादें
तुम्हें कटघरे में खड़ा कर देंगी
कसूर पूछेगी मेरा,
और तुम बेशब्द
ख़ुद से हीं उलझते हुए
सूनी निगाहों से
सोचोगे
काश!
वो वक़्त वापस आ जाता
एक बार फिर से सफ़र में मेरे साथ होती तुम
और हम एक हीं सफ़र पर चलते
मंज़िल भी एक और रास्ते भी एक|
जानते हो न
बीता वक़्त वापस नहीं आता
मुझे नहीं मालूम मेरी वापसी होगी या नहीं
या तुमसे कभी मिलूंगी की नहीं
पर इतना जानती हूँ
मैं बहुत जिद्दी हूँ...

__ जेन्नी शबनम __ 13. 4. 2011

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