Tuesday, February 10, 2015

484. मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे

मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे  

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अक्स मेरा मन       
मुझसे उलझता है    
कहता है कि वो सारे सच    
जिसे मन की तलहटी में  
जाने कब से छुपाया है मैंने    
जगज़ाहिर कर दूँ
चैन से सो नहीं पाता है वो  
सारी चीख़ें
हर रात उसे रुलाती हैं
सारी पीड़ा भरभराकर  
हर रात उसके सीने पर गिर जाती हैं  
सारे रहस्य हर रात कुलबुलाते हैं
और बाहर आने को धक्का मारतें हैं  
इन जद्दोजहद में गुज़रती हर रात  
यूँ लगता है  
मानो अाज आख़िरी है
लेकिन सहर की धुन जब बजती है  
मेरा मन ख़ुद को ढाढ़स देता है
बस ज़रा-सा सब्र और कर लो
मुमकिन है
एक रोज़ जीवन से शब बिदा हो जाएगी  
उस आखिरी सहर में  
मन ! तुम आज़ाद हो जाओगे ।  

- जेन्नी शबनम (10. 2. 2015)

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