Monday, May 30, 2011

न मंज़िल न ठिकाना है

न मंज़िल न ठिकाना है

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बड़ा अज़ब अफ़साना है, ज़माने से छुपाना है
है बेनाम सा कोई नाता, यूँ ही अनाम निभाना है !

सफ़र है बहुत कठिन, रस्ता भी अनजाना है
चलती रही तन्हा तन्हा, न मंज़िल न ठिकाना है !

धुँधला है अक्स पर, उसे आँखों में बसाना है
जो भी कह दे ये दुनिया, अब नहीं घबराना है !

शमा से लिपटकर अब, बिगड़ा नसीब बनाना है
पलभर जल के शिद्दत से, परवाने सा मर जाना है !

इश्क में गुमनाम होकर, नया इतिहास रचाना है
रोज़ जन्म लेती है 'शब', किस्मत का खेल पुराना है !

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)

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