Saturday, March 5, 2011

और कर ली पूरी मुराद...

और कर ली पूरी मुराद...

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वक़्त से मांग लायी
अपने लिए
कुछ चोरी के लम्हात,
मन किया
जी लूँ
ज़रा बेफ़िक्र,
पा लूँ कुछ
अनोखे
एहसास !

कम नहीं होता
किसी का साथ
प्यारी बातें
एक खुशनुमा शाम,
जो बन जाए
तमाम उम्र केलिए
एक हसीन याद !

हाथों में हाथ और
तीन क़दमों में
नाप ली
दुनिया हमने,
और कर ली पूरी
मुराद !

जानती हूँ
ये कोई नयी बात नहीं
न होती है
परखने की बात,
पर पहली बार
दुनिया ने नहीं
मैंने परखा दुनिया को !

अपनी आँखों से
देखी थी
पर आज देखी
किसी और की
नज़रों से
अपनी ज़िन्दगी !

पहले भी क्या ऐसी हीं थी
दुनिया ?
फूल तो खिले होते थे
पहले भी,
मुरझाये हीं
मैं क्यों बटोरती थी ?

क्या ये
गैर वाज़िब था?
कैसे मानूँ?
कह कर तो लाई थी
वक़्त को,
परवाह क्यों?
जब वक़्त को
रंज नहीं !

__ जेन्नी शबनम __ 27. 02. 2011

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