शनिवार, 5 मार्च 2011

215. और कर ली पूरी मुराद...

और कर ली पूरी मुराद...

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वक़्त से माँग लायी
अपने लिए
कुछ चोरी के लम्हात,
मन किया जी लूँ
ज़रा बेफ़िक्र
पा लूँ कुछ
अनोखे एहसास !

कम नहीं होता
किसी का साथ
प्यारी बातें
एक खुशनुमा शाम,
जो बन जाए
तमाम उम्र केलिए
एक हसीन याद !

हाथों में हाथ और
तीन क़दमों में
नाप ली दुनिया हमने,
और कर ली पूरी
मुराद !

जानती हूँ
यह कोई नयी बात नहीं
न होती है परखने की बात,
पर पहली बार
दुनिया ने नहीं
मैंने परखा है दुनिया को !

अपनी आँखों से
देखी थी
पर आज देखी
किसी और की नज़रों से
अपनी ज़िन्दगी !

पहले भी क्या ऐसी ही थी दुनिया ?
फूल तो खिले होते थे
पहले भी,
पर मुरझाए ही
मैं क्यों बटोरती थी ?

क्या ये गैर वाज़िब था?
कैसे मानूँ?
कह कर तो लाई थी वक़्त को,
परवाह क्यों?
जब वक़्त को
रंज नहीं !

- जेन्नी शबनम (27. 02. 2011)

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