Sunday, May 26, 2013

406. गुलमोहर (16 हाइकु)

गुलमोहर (16 हाइकु)

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1.
उनका आना 
जैसे मन में खिला  
गुलमोहर !

2.
खिलता रहा  
गुलमोहर फूल  
पतझर में ! 

3.
तुम्हारी छवि 
जैसे दोपहरी में  
गुलमोहर !

4.
झरी पत्तियाँ
गुलमोहर हँसा 
आई बहार !

5.
झूमती हवा 
गुलमोहर झूमा 
रुत सुहानी !

6.
उसकी हँसी -
झरे गुलमोहर 
सुर्ख गुलाबी !

7.
गुलमोहर !
तुमसे ही है सीखा 
खिले रहना !

8.
खिलता रहा    
गुलमोहर गाछ
शेष मुर्झाए !

9.
सजा के पथ  
रहता है बेफिक्र 
गुलमोहर !

10.
हवा ने कहा -
गुलमोहर सुन
साथ में उड़ !

11.
उड़ता आया 
गुलमोहर फूल 
मेरे अँगना ! 

12.
पसरा रंग 
गुलमोहर गंध    
बैसाख खुश !

13.
आम्र-मंजरी 
फूल गुलमोहर 
दोनों चहके !

14.
सुर्ख फूलों-सा 
तेरा रंग खिला, ज्यों
गुलमोहर !

15.
गुलमोहर 
कतारबद्ध खड़े 
प्रहरी बड़े !

16.
पलाश फूल 
गुलमोहर फूल 
दोनों आओ न !

- जेन्नी शबनम (2. 5. 2013)

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Monday, May 13, 2013

405. माँ (मातृ दिवस पर 11 हाइकु)

 माँ 
(मातृ दिवस पर 11 हाइकु)

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1.
जिससे सीखा 
सहनशील होना, 
वो है मेरी माँ ! 

2.
माँ-सी है छवि 
माँ मुझमें है बसी,  
माँ देती रूप ! 

3.
स्त्री है जननी 
रच दिया संसार 
पर लाचार ! 

4.
हर नारी माँ 
हर बेटी होती माँ 
मुझमें भी माँ ! 

5.
हर माँ देती 
सूरज-सी रोशनी 
निःस्वार्थ भाव ! 

6.
रचा संसार 
मानी गई बेकार 
जाने क्यों नारी ? 

7.
धरा-सी धीर 
बन कोख की ढ़ाल 
प्रेम लुटाती !

8.
माँ की ममता 
ब्रह्मांड है समाया 
ओर न छोर ! 

9.
प्यार लुटाती  
प्यार को तरसती  
पीर लिए माँ ! 

10.
उसने छला 
जिसके लिए मिटी
उसकी वो माँ ! 

11.
एक ही दिन 
क्यों याद आती है वो ?
जो जन्म देती ! 

(मातृ दिवस पर )
- जेन्नी शबनम (12. 5. 2013)

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Sunday, May 5, 2013

404. तुम्हारा 'कहा'...

तुम्हारा 'कहा'...

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जानती हूँ 
तुम्हारा 'कहा' 
मुझसे शुरू होकर 
मुझ पर ही ख़त्म होता है, 
उस कहा में 
क्या कुछ शामिल नहीं होता 
प्यार 
मनुहार 
जिरह 
आरोप 
सरोकार 
संदेह 
शब्दों के डंक,
तुम जानते हो 
तुम्हारी इस सोच ने 
मुझे तोड़ दिया है 
खुद से भी नफरत करने लगी हूँ
और  
सिर्फ इस लिए मर जाना चाहती हूँ 
ताकि 
मेरे न होने पर 
तुम्हारा ये 'कहा'
तुम किसी से कह न पाओ 
और  
तुमको घुटन हो  
तुम्हारी सोच 
तुमको ही बर्बाद करे 
तुम रोओ  
किसी 'उस' के लिए 
जिसे अपना 'कहा' सुना सको 
जानती हूँ 
मेरी जगह कोई न लेगा 
तुम्हारा 'कहा' 
अनकहा बनकर तुमको दर्द देगा 
और तब आएगा मुझे सुकून,
जब भी मैंने तुमसे कहा कि
तुम्हारा ये 'कहा' मुझे चुभता है 
न बोलो 
न सोचो ऐसे 
हमेशा तुम कहते हो - 
तुम्हें न कहूँ तो भला किससे 
एक तुम ही तो हो 
जिस पर मेरा अधिकार है 
मेरा मन 
प्रेम करूँ 
या जो मर्जी 
कहा करूँ !

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2013)

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Wednesday, May 1, 2013

403. औकात देखो...


औकात देखो...

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पिछला जन्म  
पाप की गठरी   
धरती पर बोझ  
समाज के लिए पैबंद   
यह सब सुन कर भी  
मुँह उठाए  
तुम्हें ही अगोरा 
मन टूटा  
पर तुम्हें ही देखा  
असाध्य तुम  
पर जीने की सहूलियत तुमसे 
मालूम है मुझे    
मेरी पैदाइश हुई ही है 
उन कामों को करने के लिए   
जो निकृष्ट हैं  
जिसे करना  
तुम अपनी शान के ख़िलाफ़ मानते हो  
या तुम्हारी औकात से परे हैं  
काम करना मेरा स्वभाव है  
मेरी पूँजी भी है  
और मेरा धर्म भी  
फिर भी  
मैं भाग्यहीन 
मैं बेगैरत 
मैं कृतघ्न 
मैं फ़िज़ूल 
जान लो तुम   
मैंने अपना सारा वक़्त दिया है तुम्हें 
ताकि तुम चैन से आँखें मूँद सो सको  
हर प्रहार को अपने सीने पर झेला है 
ताकि तुम सुरक्षित रह सको   
पसीने से लिजबिज मेरा बदन 
चौबीसों पहर  
सिर्फ तुम्हारे लिए खटा है  
ताकि तुम मनचाही ज़िंदगी जी सको     
कभी चैन के पल नहीं ढूँढ़े मैंने  
कभी नहीं कहा कि 
ज़रा देर को रुकने दो 
होश संभालने से लेकर  
जिस्म की ताकत खोने तक 
दुनिया का बोझ उठाया है मैंने  
अट्टालिकएँ मुझे जानती हैं  
मेरे बदन का खून चखा है उसने  
लहलहाती फसलें मेरी सखा है  
मुझसे ही पानी पीती हैं   
फुलवारी के फूल  
अपनी सुगंध की उत्कृष्टता  
मुझसे ही पूछते हैं  
मेरे बिना तुम सब  
अपाहिज हो 
तुम बेहतर जानते हो   
एक पल को अगर रुक जाऊँ 
दुनिया थम जाएगी      
चंद मुट्ठी भर तुम सब  
मेरे ही बल पर शासन करते हो  
फिर भी कहते - 
''अपनी औकात देखो...!'' 

- जेन्नी शबनम (मई 1, 2013) 
(मजदूर दिवस पर) 

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