Thursday, August 4, 2016

522. चलो चलते हैं...

चलो चलते हैं...

*******  

सुनो साथी  
चलो चलते हैं
नदी के किनारे
ठंडी रेत पर
पाँव को ज़रा ताज़गी दे
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे
अपने-अपने हिस्से का
अबोला दर्द  
रेत से बाँटेंगे  
न तुम कुछ कहना  
न हम कुछ पूछेंगे  
अपने-अपने मन की गिरह  
ज़रा-सी खोलेंगे  
मन की गाथा  
जो हम रचते हैं  
काग़ज़ के सीने पर  
सारी की सारी पोथियाँ  
वहीं आज बहा आएँगे  
अँजुरी में जल ले  
संकल्प दोहराएँगे  
और अपने-अपने रास्ते पर  
बढ़ जाएँगे  
सुनो साथी  
चलते हैं  
नदी के किनारे  
ठंडी रेत पर  
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे !  

- जेन्नी शबनम (4. 8. 2016)  

________________________