Monday, March 28, 2011

फ़ासला बना लिया...

फ़ासला बना लिया...

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खड़ी थी सागर किनारे
मगर लहरों ने डुबो दिया,
दरकिनार नहीं होती ज़िन्दगी
हर जतन करके देख लिया !

उड़ी थी तब आसमान में
जब सीने से तुमने लगाया,
जाने तब तुम कहाँ थे खोये
जब धड़कनों ने तुम्हें बसा लिया !

सबब जीने का मुझे मिला
मगर जुर्माना भी अदा किया,
मुनासिब है हर राज़ बना रहे
ख़ुद मैंने फ़ासला बना लिया !

बदल ही गई मन की फ़िज़ा
जाने ख़ुदा ने ये क्यों किया,
तुमपे न आये कभी कोई आँच
इश्क में मिटना मैंने सीख लिया !

एक नज़र देख लूँ आख़िरी ख़्वाहिश मेरी
बरस पड़ी आँखें जब हुई तुमसे जुदा,
तुम क्या जानो दिल मेरा कितना तड़पा
शायद हो अंतिम मिलन सोच दिल भी रो लिया !

बेकरारी बढ़ती रही मगर कदम को रुकना पड़ा
मालूम है कि न मिलेंगे पर इंतज़ार हर पल रहा,
तुम आओ कि न आओ ये तुम्हारा फ़ैसला
'शब' हुई बेवफा और होंठों को उसने सी लिया !

- जेन्नी शबनम (22 . 3 . 2011)

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