Thursday, May 24, 2012

346. कभी न मानूँ...

कभी न मानूँ...

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जी चाहता है 
विद्रोह कर दूँ 
अबकी जो रूठूँ  
कभी न मानूँ
मनाता तो यूँ भी नहीं कोई 
फिर भी बार बार रूठती हूँ 
हर बार स्वयं ही मान जाती हूँ
जानती हूँ कि मेरा रूठना 
कोई भूचाल नहीं लाता 
न तो पर्वत को पिघलाता है 
न प्रकृति कर जोड़ती है 
न जीवन आह भरता है 
देह की सभी भंगिमाएँ
यथावत रहती है
दुनिया सहज चलती है
मन रूठता है
मन टूटता है 
मन मनाता है 
मन मानता है 
और ये सिर्फ मेरा मन जानता है 
हर बार रूठ कर 
खुद को ढाढस देती हूँ 
कि शायद इस बार  
किसी को फर्क पड़े 
और कोई आकार मनाये 
और मैं जानूं कि 
मैं भी महत्वपूर्ण हूँ
पर अब नहीं 
अब तो यम से ही मानूंगी 
विद्रोह का बिगुल 
बज उठा है !

- जेन्नी शबनम (मई 24, 2012)

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