Monday, June 29, 2009

66. आख़िर क्यों ?...

आख़िर क्यों ?...

*******

बेअख्तियार दौड़ी थी
जाने क्यों ?
कुछ पाने या खोने
जाने क्यों ?
कुछ लम्हों की सौगात मिली
साथ दर्द इक इनाम मिला,
अंहकार की घोर टकराहट थी
और भय की अखंडित दीवार थी,
पाट सकी न अपना संशय
जता सकी न अपना आशय,
पाप-पुण्य से परे प्यासे तन
सत्य-असत्य से विचलित मन,
बाँट सकी न अपनी निराशा
दिला सकी न कोई आशा,
थम सकी न मेरी राहें
थाम सकी न कोई बाहें,
बेतहाशा भागी थी
आख़िर क्यों ?
क्या पाया क्या खो आई
आख़िर क्यों ?

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 2008)

________________________________________