Sunday, July 10, 2011

गौरैया (स्त्री) की आत्मकथा...

गौरैया (स्त्री) की आत्मकथा...

*******

एक सदी तक
चहकती फिरी
घर आँगन गलियों में,
थी कथा परियों की
और जीवन
फुदकती गौरैया-सी 

दूसरी सदी में
आ बसी
हर कोने चौखट चौबारे में,
कण-कण में
बिछती रही
बगिया में ख़ुशबू-सी । 

तीसरी सदी तक
आ पहुँची,
घर की गौरैया
अब उड़ जाएगी,
घर आँगन होगा सूना
याद बहुत आएगी,
कोई गौरैया है आने को
अपनी दूसरी सदी में
जीने को,
कण-कण में समाएगी
घर आँगन वो खिलाएगी । 

ख़ुद को अब समेट रही
बिखरे निशाँ पोंछ रही
यादों में कुछ दिन जीना है
चौथी सदी बिताना है
फिर तस्वीर में सिमट जाना है । 

जाने कैसी ये आत्मकथा
मेरी उसकी सबकी
एक जैसी है,
खिलना बिछना सिमटना
ख़त्म होती यूँ
गौरैया की कहानी है । 

- जेन्नी शबनम ( मई 30, 2011)

___________________________